Tuesday, December 30, 2014

गजलकार व साहित्यकार दुष्यंत त्यागी

सुप्रसिद्ध गजलकार  व साहित्यकार दुष्यंत त्यागी की पुण्यतिथि पर विशेष
हाथों में अंगारों के लिए सोच रहा था,
कोई मुझे अंगारों की तासीर बताए।।
आम आदमी के दु:ख सुख को शिद्दत से महसूस जब किसी शायर और लेखक की कलम करती है तो कालजयी कृतियां जन्म लेने लगती हैं। बड़ी मुश्किल से होता है चमन में दीदावर पैदा। सदियों के बाद ही कोई व्यक्तित्व वक्त का सांचा बदलने आता है। डॉ.इकबाल ने जो कहा था वो कितना बड़ा सच था। आम आदमी के हाथों में अंगारे एवं सीने में पीड़ा की गंगा अविरल रूप से बहती रहती है। जब पीड़ा हिमालय का रूप ले लेती है तो कह उठती है :
हो गई है पीर पर्वत सी पिघलनी चाहिए,
इस हिमालय से कोई गंगा निकलनी चाहिए।
जी हां, ये दुष्यन्त कुमार ही थे, जिन पर आज जनपद बिजनौर ही नहीं, जहां राजपुर नवादा गांव में उनका जन्म १ सितंबर १९३३ को हुआ था, बल्कि पूरा देश गर्व करता है। और करे भी क्यों न, ये वो लाडला गजलकार है, जिसने गजल के मानी ही बदल दिए, नहीं तो गजल का शाब्दिक अर्थ महबूब से बातें करना था। दुष्यंत ने गजल को महबूब के गेसू एवं रुखसारों से निकालकर यथार्थ की जमीं पर उतार दिया।
मैं जिसे ओढ़ता बिछाता हूं,
वो गजल आपको सुनाता हूं।
तू किसी रेल सी गुजरती है,
मैं किसी पुल सा थर थराता हूं।
तभी तो उन्होंने कहा था कि मेरे शेर उस भाषा की तर्जुमानी करते हैं, जिसे मैं बोलता हूं।
और इसलिए जो ख्याति और लोकप्रियता दुष्यंत को प्राप्त हुई, वो अद्वितीय है।
मां का नाम श्रीमती रामकिशोरी देवी एवं पिता का नाम चौधरी भगवत सहाय था। शिक्षा गांव की प्राइमरी पाठशाला से प्रारंभ होकर नहटौर, चंदौसी और अंत में उच्च शिक्षा इलाहाबाद विश्वविद्यालय में संपन्न हुई। यहीं पर दोस्ती कमलेश्वर एवं मार्कण्डेय से हुई। उन दिनों की प्रसिद्ध तिकड़ी। कक्षा १० से ही परदेशी उपनाम से विधिवत लेखन सुमित्रानंदन पंत को अपना गुरू एवं स्वयं को एकलव्य मानकर                                                                               प्रारंभ कर दिया।
१९५५ में कल्पना पत्रिका में नई कहानी परंपरा और प्रयोग शीर्षक से ऐतिहासिक आलोचना का प्रकाशन, १९५६ में सूर्य का स्वागत नामक शीर्षक से कविताओं का संचयन हुआ। काव्य संग्रह आवाजों के घेरे, काव्य नाटक एक कंठ विषपाई, छोटे-छोटे सवाल और उपन्यास आंगन में एक वृक्ष प्रकाशित हुए। सर्वाधिक लोकप्रियता उन्हें गजल संग्रह साये में धूप से मिली, जो आज भी अनवरत रूप से जारी है।
दुष्यंत कुमार ने सामाजिक एवं राजनीतिक विषयों को गजल का विषय बनाया और भरपूर अभिव्यक्ति दीं। ये केवल दस्तावेज ही बनकर नहीं रहे, बल्कि गजल की कलात्मकता के उदाहरण बन गए।
गूंगे निकल पड़े हैं जुबां की तलाश में,
सरकार के खिलाफ ये साजिश तो देखिए।
उनकी अपील है कि उन्हें हम मदद करें,
चाकू की पसलियों से गुजारिश तो देखिए।
दुष्यंत कुमार की गजलें आज ४० वर्ष अंतराल के बाद भी उतनी ही प्रासंगकि हैं जितनी तब थीं। तभी तो शंकराचार्य से लेकर अन्ना हजारे तक संसद से लेकर यूएनओ तक उनकी गजलों के शेर कोड किए जाते हैं।
सिर्फ हंगामा खड़ा करना मेरा मकसद नहीं,
मेरी कोशिश है कि ये सूरत बदलनी चाहिए।
मेरे सीने में नहीं तेरे सीने में सही,
हो कहीं भी आग लेकिन आग जलनी चाहिए।
गांव की रामलीला में लक्ष्मण की भूमिका से लेकर गंगा स्नान मेले में बैलगाड़ी में बैठकर जाना और चाव से खिचड़ी खाना और फिर शाम को गंगा में तैरते दीयों को देखकर कालजयी गजल कह जाना आज भी यादों को झकझोर देता है।
हौले-हौले पांव हिलाओ, जल सोया है छेड़ो मत।
हम सब अपने अपने दीपक यहीं सिराने आएंगे।
लेकिन उनका ऐतिहासिक घर रामजानकी भवन आज भी उनकी राह देखता है। वर्षों से बंद वो महल अब खंडहर में तब्दील होता जा रहा है। उन्हें शायद इसका एहसास था।
आज विरान अपना घर देखा,
तो कई बार झांककर देखा,
होश में आ गए कई सपने,
आज हमपने वो खण्डहर देखा।
दुष्यंत कुमार ने सभी को आशांवित होने का महामंत्र दिया।
कैसे आकाश में सूराख नहीं हो सकता,
एक पत्थर तो तबियत से उछालो यारों।

प्रस्तुति - मनोज त्यागी, आलोक त्यागी

३० दिसम्बर के अमरउजाला में प्रकाशित लेख

अफजलगढ़ पर चिंगारी का स्पेशल इशू


अफजलगढ़ पर चिंगारी का स्पेशल इशू

१८ दिसंबर पर चिंगारी सांध्य  ने जनपद के प्राचीन शहर अफजलगढ़ पर विशेष सामग्री छपी । मदीना न्यूज़ पेपर पर भी विस्तार से छापा है 










Tuesday, December 23, 2014

चिंगारी संध्या दैनिक का नहटौर पर विशेष परिशिष्ठ

पूर्व पूर्व प्रधानमंत्री चौधरी चरण सिंह और बिजनौर

पूर्व पूर्व प्रधानमंत्री चौधरी चरण सिंह और बिजनौर 

२३ दिसम्बर २०१४ अमरउजाला 

२३ दिसंबर २०१४ दैनिक जागरण 


पूर्व प्रधानमंत्री चौधरी चरण सिंह की दो बेटिओं की बिजनौर में हुई थी शादी



। २३ दिसम्बर १९०२ को जन्में देश के पूर्व प्रधानमंत्री चौधरी चरण सिंह ने किसानों के हक की लड़ाई लड़कर किसानों के मसीहा के रूप में अपनी पहचान बनाई है। चौधरी चरण सिंह को जनपद बिजनौर से काफी लगाव रहा है। उन्होंनें चांदपुर में भी अनेक बार जनसभाओं को सम्बोधित कर क्षेत्रवासियों से रूबेरू हुए हैं। चौधरी साहब की दो लड़कियों की शादी जनपद में ही हुई है। चांदपुर विधान सभा क्षेत्र के गांव शादीपुर मिलक में पुत्री शारदा की इंजीनियर वासदेव सिंह के साथ जो वर्तमान में अमेरिका मे हैं तथा नजीबाबाद विधान सभा क्षेत्र के गांव हाजीपुर में एसपी सिंह के साथ शादी हुई है। जो पुलिस कमिश्रर हैं। चौधरी चरण सिंह ने हमेशा से ही किसानों की लड़ाई लड़ी है। बताते हैं कि चांदपुर शुगर मिल भी चौधरी चरण सिंह के प्रयासों की ही देन है। किसानों की लड़ाई लड़ते हुए चौधरी साहब ने अपने मुख्यमंत्री काल में मंडी समिति की स्थापना कराई। नलकूप की नाली के बराबर से निकली चकरोड पर पहले नलकूप कर्मचारियों को ही चलने का अधिकार था लेकिन चौधरी साहब ने किसानों को उस चकरोड पर चलने का अधिकार दिलाया। चौधरी साहब ने कभी जातपात का भेदभाव नहीं रखा। उनका रसोई भी एक दलित समास से था। चौधरी साहब की एक विशेष यह भी थी जब वे किसी प्रोग्राम में जाते थे तो पहले जहां का कार्यक्रम तय होता था वहीं जाते थे। समाजसेवी व पूर्व लोकदल के चांदपुर विधान सभा अध्यक्ष डा.सतेंद्र कुमार शर्मा ने बताया कि सन १९८४ में हुए विधान सभा चुनाव में चौधरी साहब ने लोकदल प्रत्याशी अमीरूद्दीन बादशाह की रामलीला मैदान में हुई चुनाव सभा को सम्बोधित करते हुए सभी समाज के लोगों से लोकदल के लिए मतदान करने का आव्हान किया था। उस समय चौधरीसाहब ने कांग्रेस से दूर रहने की बात की थी। उन्होंनें कहा था धनवान अच्छे नहीं होते लेकिन धनवानों से अभिप्राय चांदपुर के १०-२० लाख वाले धनवानों से नहीं है देश के बड़े धनवानों से है। 

राजीव अग्रवाल 

Sunday, December 14, 2014

नहटौर

 नहटौर पर  ११ दिसम्बर २०१४  के चिंगारी  सांध्य दैनिक में  छापा एक लेख 





Wednesday, December 3, 2014

- भोलानाथ त्‍यागी

पत्रकारिता एवं साहित्‍य में समान रूप से चर्चित- भोलानाथ त्‍यागी का जन्‍म 4 नवंबर, 1953 में बिजनौर के सीकरी बुजुर्ग गांव में हुआ। भोलानाथ त्‍यागी - हिंदी एवं राजनीतिशास्‍त्र से एमए, एलएलबी, पीएचडी हैं। श्री त्‍यागी सात वर्ष की अल्‍पायु में ही पिता के साए से वंचित हो गए । लालनपालन और शिक्षा दीक्षा - पैजनियां (बिजनौर) में हुई। इनके नाना शिवचरण सिंह विख्‍यात स्‍वतंत्रता सेनानी एवं साहित्‍यप्रेमी थे - 
काकोरीकांड के अमर शहीदों का प्रसिद्ध स्वतंत्रता संग्राम सेनानी स्वर्गीय शिवचरण सिंह त्यागी के गांव पैजनियां (बिजनौर) से गहरा रिश्ता रहा है। राम प्रसाद बिस्मिल, अशफाक उल्ला खान, राजेंद्र लाहिड़ी , रोशन सिंह, चंद्रशेखर आजाद, जैसे अमर शहीदों ने शिवचरण सिंह त्यागी के यहां , गांव पैजनियां में अज्ञात वास किया था। स्वर्गीय त्यागी एक ऐसे स्वतंत्रता सेनानी थे, जिन्होंने कभी सरकार से न पेंशन ली और न ही कोई अन्य लाभ। पैजनियां गांव को स्वतंत्रता आंदोलनकारियों का तीर्थ भी कहा जाता है। 
जिसके चलते, गणेश शंकर विद्यार्थी, मुंशी प्रेमचंद, आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी, जैनेंद्र कुमार जैन और बनारसी दास चतुवेर्दी जैसे लोगों का शिवचरण सिंह त्यागी के घर आना जाना लगा रहा।
भोलानाथ त्‍यागी को साहित्‍यिक अभिरूचि इसी परिवेश से मिली। कहानी, कविता, गीत, गजल, नाटक, लघुकथा, व्‍यंग्‍य, रिपोर्ताज आदि कई विधाओं में-श्री त्‍यागी समान रूप से लिखते आ रहे हैं। कई रचनाओं का रेडियो एवं दूरदर्शन पर भी प्रसारण किया जा चुका है। उनके ‘चंदनवन की राख’ एवं ‘द्रोणाचार्य का क्‍लोन’ नामक कथा संग्रह ने खासी प्रशंसा बटोरी।
- भोलानाथ त्‍यागी , 49 / ‘विनायकम’, इमलिया कैंपस, सिविल लाइन, बिजनौर (उत्‍तर प्रदेश)
फोन: 09456873005 / 09412567848 ईमेल:bholanathtyagi@gmail.coM

भोलानाथ त्यागी की फेसवाल से साभार 

Saturday, November 29, 2014

पी के साहिल


29 नवंबर के अमर उजाला के बिजनौर संस्करण में छापा डॉ वीरेन्द्र का आलेख 



Monday, November 10, 2014

सुशील वत्स


सुशील वत्स बहुत बड़े चित्रकार हैं ! बिजनौर जनपद के रहने वाले ८४ वर्षीय वत्स से पिछले दिनों मिलने का अवसर मिला!श्री वत्स बहुत सरल हैं ! बहुत . देर तक मैं   उनसे बतियाता रहा ! उनपर अमर उजाला में २० अक्टूबर में छपा मेरा लेख 

Thursday, November 6, 2014

गंगा मेला विदुरकुटी

६ नवंबर में अमरउजाला बिजनौर में विदुर  कुटी के गंगा मेले पर छापा शैलेन्द्र गौड  का एक लेख



गंगा मेला

पांच नवंबर २०१४ के अमर उजाला मेरठ में गंगा मेले पर छपा एक लेख



Thursday, July 24, 2014

सावन की कांवड और ‌बिजनौर


सावन की शिवरात्रि से पूर्व कांवड‌‌ियों का भारी रेला रास्तों पर होता है।गंगा की दूसरी साइड मुजफ्फरनगर ,मेरठ ‌,दिल्ली व ह‌रियाणा राज्य के लाखों श्रद्धालु कांवड़ लेकर ह‌रिद्वार से ‌निकलतें हैं। इनका रास्ता मुजफरनगर मेरठ होकर होता है।हाला‌कि व्यवस्था के ‌लिए ये सब कुछ साल से ‌कांवड लेने बिजनौर होकर ह‌रिद्वार जातें हैं।
 सावन में ही मुरादाबाद, बुलंदशहर के भारी तादाद में कांव‌‌ड‌िए ‌बिजनौर से होकर वापस अपने घर जातें हैं। आश्चर्य की बात ये है ‌कि ‌बिजनौर जनपद में सावन में कावंड  लाने का प्रचलन नहीं है।यहां फरवरी में पड़ने वाली शिवरात्रि पर कांवड लाने का प्रचलन है। कुछ समय से अब कांवड आने लगी। वरन इस शिवरात्रि पर ‌बिजनौर जनपद में भगवान शिव का पूजन भी बहुत ही कम होता था।
हाला‌कि ‌बिजनौर जनपद में भगवान राम और कृष्ण के प्राचीन  मं‌दिर नही हैं। जो मं‌दिर हैं  वे ज्यादा पुराने नहीं। पुराने मं‌दिर भगवान शिव के ही हैं। ‌जिला गजे‌टियर कहता है ‌कि ‌बिजनौर भार शिवों का क्षेत्र रहा हैं। यहां के शिव उपासक कंधे पर शिव ‌लिंग लेकर चलते थे। जनपद में पुराने शिवालय गंज में ‌निगमागम ‌विद्यालय में और शेरकोट में रानी फुलकुंमारी कन्या इंटर कालेज के गेट पर स्‌थ‌ति हैं। इन दोनों में प‌रिक्रमा के ‌लिए मं‌दिर में ही स्‌थान बना है। शिव‌लिंग बड़े हैं। उनकी ‌पिंडी काफी ऊंची उठाकर बनाई गई है।मं‌दिर की दीवारों पर मुस‌लिम काल की ‌‌चित्रकला है।
  जनपद के पुराने आदमी या ‌विद्वान सावन में कावंड न लाए जाने का  कारण नहीं बता पाए। लगता है ‌कि ‌बिजनौर ह‌रिद्वार से सटा ‌जिला तो है ‌किंतु लगभग 30- 40 साल पूर्व ‌बिजनौर ह‌रिद्वार का गंगा में उफान के कारण बरसात में संपर्क खत्म हो जाता था। इसी कारण सावन में यहां कावंड  लाने का प्रचलन नहीं हैं। यहां फरवरी में अाने वाले सावन में कावंड लाने की परम्परा है।आपमें से ‌किसी की जानकारी में बिजनौर  में सावन में कांवड लाने का कोई कारण हो तो कृपया मेरी ज्ञान वृ‌द्ध‌ि करें । 

Thursday, July 17, 2014

सुशांत सिंह बिजनौरी

जागरण के बिजनौर जिला प्रभारी  प्रवीण वशिस्ट का १५ जुलाई में दैनिक जागरण में प्रकाशित लेख 

Saturday, July 12, 2014

बिजनौरी थी जोहरा बेग़म

12  जुलाई के दैनिक जागरण में प्रकाशित प्रवीण वशिषठ  का लेख 


Wednesday, May 28, 2014

दरगाहे नजफ़े हिन्द

 दरगाहे नजफ़े हिन्द पर २६  मई के  जागरण में प्रकाशित एक लेख 

Saturday, May 24, 2014

बिजनौर के स्वतन्त्रता संग्राम सेनानी बाबू रतनलाल जैन

 कवि हुक्का का लेख  २४ मई २०१४ को चिंगारी सां ध्या में प्रकाशित

डॉ रामस्वरूप आर्य का हिंदी गजलकार दुष्यंत पर लिखा एक लेख

Monday, April 28, 2014

भनेडा के नक्काल

भनेडा बिजनौर जानपद का एक प्रसिद्ध गॉंव है ।  इसके नक्काल दूर -दूर तक अपनी कला के लिये प्रसिद्ध रहें हैं ।  भनेडा के  प्रसिद्ध लेखक पत्रकार  के एस तूफान का नक्कालों पर लिखा  ले ख प्रस्तुत है 


Monday, April 21, 2014

श्री भोलानाथ त्यागी के फेसबुक पेज पर डॉ उषा त्यागी का चित्रकार हरिपाल त्यागी पर लेख

हरिपाल त्यागी;कला की नशीली महक
हरिपाल त्यागी जी का जन्म, 20 अप्रैल सन् 1934 ई0 को जनपद बिजनौर के ग्राम महुवा में हुआ।आपके पिता का नाम श्री शेर सिंह त्यागी तथा माता का नाम श्रीमती दयावती देवी था। महुवा गाँव के नाम में एक नशीली महक है।ऐसी ही महक गाँव के लोगों की जिन्दगी में भी है। छोटा किसान परिवार, घर में गरीबी तो थी ही उससे भी कहीं ज्यादा कंजूसी थी। इस तरसाव ने हरिपाल के मन में चीजों के प्रति, गहरी ललक पैदा कर दी। उन्हें सहज ढंग से पाने में जो रस है, उससे कहीं ज्यादा रस घोल दिया।
हरिपाल जी के ,ताऊ जी के बेटे रविंद्रनाथ त्यागी पढ़ाई में कुछ साल आगे थे ,कमरे में तीन तस्वीरें-स्वामी दयानन्द, गा्रमोफोन और ताला। उन्हें देख, हरिपाल त्यागी जी को ललक उठी, कहीं से रंग मिल जाये तो वह भी अपनी तस्वीरोें में रंग भर सके। हरिपाल, परिवार में इकलौता बेटा। पिता की उससे बेहद प्यार। लेकिन प्यार प्रकट करने का अपना अंदाज। पढ़ाई में हरिपाल की बहुत कम दिलचस्पी थी। समय मिलतेे ही तस्वीरें और माटी की मूंरतें बनाते ।
बचपन में मुशीराम की नौटंकी पार्टी गाँव में आयी। नौटंकी की कमलाबाई ने हरिपाल के बालमन को आन्दोलित किया। कमलाबाई के कहने पर ‘सरवर नीर‘ नाटक के कलाकार के बीमार हो जाने के कारण, हरिपाल ने ‘नीर‘ का पात्र निभाया। कमलाबाई और मुंशीराम ने कमर थपथपाई थी। लेकिन सुबह किसी ने पिताजी को यह जानकारी दे दी-घर में कोहराम मच गया। हरिपाल की पिटाई हुई ओर साथ ही चेतावनी भी मिली-‘खबरदार, आज के बाद नौटंकी की तरफ नजर उठाकर देखा तो............।‘तीसरे दिन, कमलाबाई मुंशीराम के साथ् गाड़ी में बैठकर चली गई..
1948 में गाँव में साम्प्रदायिक दंगा हो गया। हरिपाल के पिताजी को भी गम्भीर चोटें आई। वह गाँव छोड़कर परिवार को बिजनौर ले आये। चार भैसें खरीद कर दूध बेचने का धंधा शुरू किया। हरिपाल स्कूल जाता, भैंसों को चराता, सुबह-शाम ग्राहको के घर दूध पहुँचाने जाता। भैसों के साथ, दोस्ती के इस समय की हरिपाल ने अपनी कहानी ‘दँरी‘ में बहुत करीने से उभारा है। चित्रकला में भी, भैसों की तीखी मुद्राओं के अंकन में उन्हें महारत हासिल है।हरिपाल त्यागी लब्ध प्रतिष्ठित चित्रकार होने के साथ ही साथ विख्यात साहित्य सेवी भी हैं। बाबा नागार्जुन ने इस सन्दर्भ में लिखा हैं-
सादी कागद हो भले, सादी हो दीवाल।
रेखन सौ जादूँ भरै, कलाकार हरिपाल।।
इत-उत दीखें गंगजल, नाहीं जहाँ अकाल।
धरा धन्य बिजनौर की, जंह प्रगटे हरिपाल।।
हरिपाल को काम करते देखना एक चैकाने वाला अनुभव है। पेंटिग शुरू करने से पहले उसे हल्की-हल्की सी हरारत हो जाती है। आँखें चढ़ जाती हैं। चेहरे और हाथों में तनाव आ जाता है.....संवेदना उसकी आधारभूत पुंजी है। वह अपने बारे में बड़ी मा sमियत से कहता है-पता नहीं इस काया में हाड़मास है या नहीं। ऊपर से नीचे तक तो संवेदना ही संवेदना है। हरिपाल लाजिम तौर पर देहाती आदमी है।
जीवन में मेरा जितने भी त्यागियों से पाला पड़ा है, उनमें ऐसा कुछ खास जरूर रहा है, जो मेरे लिये आत्मीयता के नए आयाम जोड़ता गया है। कलाकार और कवि हरिपाल त्यागी मेरी जिदंगी की ऐसी ही हलचलों में एक है।हरिपाल भाई का सानिध्य, हँसी चुटकुले, कहकहे सुनकर पिता जी (स्व0 महावीर त्यागी), की बहुत याद आती है, वह कहा करते थे-‘हर व्यक्ति के जीवन में किसी न किसी कला से लगाव रखना चाहिए.............।
‘आज मैं अपने कलाकार भाई को ऐसा व्यक्ति पाती हँँ, जो कलाकार होने के साथ, हँसमुख प्रसन्न और लोकसेवी हैं।हरिपाल त्यागी के व्यक्तित्व का एक और पहलँ है, उनकी गहन साहित्यिक रूचि ओर समझ। वह न केवल मंजे हुऐ चित्रकार है, अपितु एक सजग कवि और कथाकार भी हैं।
चित्रकार के रूप में हरिपाल त्यागी ने भरपँर ख्याति अर्जित की है, लेकिन उनके अन्दर एक कलाकार के साथ-साथ संवेदनशील साहित्यकार भी सांस लेता है। उनके चित्रों के स्वप्निल संसार जैसा ही आकर्षक एवं इन्द्रधनुषी है, उनके शब्दों का शिल्प।
बचपन में उनके गाँव महुवा में झाड़ी चमार द्वारा पहना गया त्यागी जी का निकर और उसके तेल चुपडे़ बाल एवं बचपन में त्यागी जी का प्रिय टोप, बाद में जिसे होली के मौके पर स्वाँग भरते समय मथुरा बढ़ई मुँह पर खड़िया पोत कर वह टोप लगाकर ‘इंगरेज‘ बना करता था-कि स्मृति आज भी उन्हें ज्योंकि त्यों बनी है।आत्मकथा के रूप में हरिपाल त्यागी ने ‘महानगर की अधूरी इबारत‘ शीर्षक से पाठकों को चमत्कृत किया।
कहानी ‘खुशी, डाइनिंग टेबिल‘ तथा कविता ‘हूँ तो एवं गुजरता हुआ दिन‘ में त्यागी जी का काव्य सोष्ठव देखते ही बनता है। उनकी कविताऐं उनके चित्रों के करीब हैं और एब्सट्रेक्ट भी होती हैं।कुल मिलाकर, हरिपाल त्यागी जी कूँची और कलम के ऐसे अद्वितीय कलाकार हैं, जिन पर जनपद बिजनौर सहज ही गर्व करता है, उन्होंने इस जनपद की पहचान, कला और साहित्य के मणिकांचन संयोग द्वारा-विशिष्ट बनाकर ,राष्ट्रीय स्तर पर अपनी उल्लेखनीय उपस्थिति दर्ज की है।
20 अप्रैल 2014 ,को हरिपाल जी के 80 वें जन्मदिन पर ,अभिनंदन
सहित ,शतायु होने की प्रभु से कामना है।
-- डॉ उषा त्यागी ,
हरिपाल त्यागी;कला की नशीली महक

 हरिपाल त्यागी जी का जन्म, 20 अप्रैल सन् 1934 ई0 को जनपद बिजनौर के ग्राम महुवा में हुआ।आपके पिता का नाम श्री शेर सिंह त्यागी तथा माता का नाम श्रीमती दयावती देवी था। महुवा गाँव के नाम में एक नशीली महक है।ऐसी ही महक गाँव के लोगों की जिन्दगी में भी है। छोटा किसान परिवार, घर में गरीबी तो थी ही उससे भी कहीं ज्यादा कंजूसी  थी। इस तरसाव ने हरिपाल के मन में चीजों के प्रति, गहरी ललक पैदा कर दी। उन्हें सहज ढंग से पाने में जो रस है, उससे कहीं ज्यादा रस घोल दिया।
हरिपाल जी के ,ताऊ जी के बेटे रविंद्रनाथ त्यागी पढ़ाई में कुछ साल आगे थे ,कमरे में तीन तस्वीरें-स्वामी दयानन्द, गा्रमोफोन और ताला। उन्हें देख, हरिपाल त्यागी जी को ललक उठी, कहीं से रंग मिल जाये तो वह भी अपनी तस्वीरोें में रंग भर सके। हरिपाल, परिवार में इकलौता बेटा। पिता की उससे बेहद प्यार। लेकिन प्यार प्रकट करने का अपना अंदाज। पढ़ाई में हरिपाल की बहुत कम दिलचस्पी थी। समय मिलतेे ही तस्वीरें और माटी की मूंरतें बनाते ।
 बचपन में मुशीराम की नौटंकी पार्टी गाँव में आयी। नौटंकी की कमलाबाई ने हरिपाल के बालमन को आन्दोलित किया। कमलाबाई के कहने पर ‘सरवर नीर‘ नाटक के कलाकार के बीमार हो जाने के कारण, हरिपाल ने ‘नीर‘ का पात्र निभाया। कमलाबाई और मुंशीराम ने कमर थपथपाई थी। लेकिन सुबह किसी ने पिताजी को यह जानकारी दे दी-घर में कोहराम मच गया। हरिपाल की पिटाई हुई ओर साथ ही चेतावनी भी मिली-‘खबरदार, आज के बाद नौटंकी की तरफ नजर उठाकर देखा तो............।‘तीसरे दिन, कमलाबाई मुंशीराम के साथ् गाड़ी में बैठकर चली गई..
 1948 में गाँव में साम्प्रदायिक दंगा हो गया। हरिपाल के पिताजी को भी गम्भीर चोटें आई। वह गाँव छोड़कर परिवार को बिजनौर ले आये। चार भैसें खरीद कर दूध बेचने का धंधा शुरू किया। हरिपाल स्कूल  जाता, भैंसों को चराता, सुबह-शाम ग्राहको के घर दूध पहुँचाने जाता। भैसों के साथ, दोस्ती के इस समय की हरिपाल ने अपनी कहानी ‘दँरी‘ में बहुत करीने से उभारा है। चित्रकला में भी, भैसों की तीखी मुद्राओं के अंकन में उन्हें महारत हासिल है।हरिपाल त्यागी लब्ध प्रतिष्ठित चित्रकार होने के साथ ही साथ विख्यात साहित्य सेवी भी हैं। बाबा नागार्जुन ने इस सन्दर्भ में लिखा हैं-
सादी कागद हो भले, सादी हो दीवाल।
रेखन सौ जादूँ  भरै, कलाकार हरिपाल।।
इत-उत दीखें गंगजल, नाहीं जहाँ अकाल।
धरा धन्य बिजनौर की, जंह प्रगटे हरिपाल।।
 हरिपाल को काम करते देखना एक चैकाने वाला अनुभव है। पेंटिग शुरू करने से पहले उसे हल्की-हल्की सी हरारत हो जाती है। आँखें चढ़ जाती हैं। चेहरे और हाथों में तनाव आ जाता है.....संवेदना उसकी आधारभूत पुंजी है। वह अपने बारे में बड़ी मा sमियत से कहता है-पता नहीं इस काया में हाड़मास है या नहीं। ऊपर से नीचे तक तो संवेदना ही संवेदना है। हरिपाल लाजिम तौर पर देहाती आदमी है।
        जीवन में मेरा जितने भी त्यागियों से पाला पड़ा है, उनमें ऐसा कुछ खास जरूर रहा है, जो मेरे लिये आत्मीयता के नए आयाम जोड़ता गया है। कलाकार और कवि हरिपाल त्यागी मेरी जिदंगी की ऐसी ही हलचलों में एक है।हरिपाल भाई का सानिध्य, हँसी चुटकुले, कहकहे सुनकर पिता जी (स्व0 महावीर त्यागी), की बहुत याद आती है, वह कहा करते थे-‘हर व्यक्ति के जीवन में किसी न किसी कला से लगाव रखना चाहिए.............।
‘आज मैं अपने कलाकार भाई को ऐसा व्यक्ति पाती हँँ, जो कलाकार होने के साथ, हँसमुख प्रसन्न और लोकसेवी हैं।हरिपाल त्यागी के व्यक्तित्व का एक और पहलँ है, उनकी गहन साहित्यिक रूचि ओर समझ। वह न केवल मंजे हुऐ चित्रकार है, अपितु एक सजग कवि और कथाकार भी हैं।
 चित्रकार के रूप में हरिपाल त्यागी ने भरपँर ख्याति अर्जित की है, लेकिन उनके अन्दर एक कलाकार के साथ-साथ संवेदनशील साहित्यकार भी सांस लेता है। उनके चित्रों के स्वप्निल संसार जैसा ही आकर्षक एवं इन्द्रधनुषी है, उनके शब्दों का शिल्प।
        बचपन में उनके गाँव महुवा में झाड़ी चमार द्वारा पहना गया त्यागी जी का निकर और उसके तेल चुपडे़ बाल एवं बचपन में त्यागी जी का प्रिय टोप, बाद में जिसे होली के मौके पर स्वाँग भरते समय मथुरा बढ़ई मुँह पर खड़िया पोत कर वह टोप लगाकर ‘इंगरेज‘ बना करता था-कि स्मृति आज भी उन्हें ज्योंकि त्यों बनी है।आत्मकथा के रूप में हरिपाल त्यागी ने ‘महानगर की अधूरी इबारत‘ शीर्षक से पाठकों को चमत्कृत किया।
     कहानी ‘खुशी, डाइनिंग टेबिल‘ तथा कविता ‘हूँ  तो एवं गुजरता हुआ दिन‘ में त्यागी जी का काव्य सोष्ठव देखते ही बनता है। उनकी कविताऐं उनके चित्रों के करीब हैं और एब्सट्रेक्ट भी होती हैं।कुल मिलाकर, हरिपाल त्यागी जी कूँची और कलम के ऐसे अद्वितीय कलाकार हैं, जिन पर जनपद बिजनौर सहज ही गर्व करता है, उन्होंने इस जनपद की पहचान, कला और साहित्य के मणिकांचन संयोग द्वारा-विशिष्ट बनाकर ,राष्ट्रीय स्तर पर अपनी उल्लेखनीय उपस्थिति दर्ज की है।
20 अप्रैल 2014 ,को हरिपाल जी के 80 वें जन्मदिन पर ,अभिनंदन 
सहित  ,शतायु होने की प्रभु से कामना है। 
  -- डॉ उषा त्यागी ,
The art of smelling intoxicating hepler Solitaire Solitaire hepler; g born April 20th, in 1934 he was the village of bijnor district in mahuva. your father's name Shri Sher Singh Tyagi, and mother's name was Mrs. dayawati mahuva in the name of the village is a divine drug. smelling smelling similar to village people's lives. too. small farmer familyOnly poverty at home, even more than was the tarsav who skimp hepler chasing things in mind, has created deep. get them comfortable manner which is more juice than juice slurry. hepler g, Tau Ji's son was a few years ahead, kabuliwala Solitaire studies room three photos-Swami dayanand, Garmophon and lock to see them chasing hepler Solitaire. arose, should find it somewhere in your tasviroen color colour. hepler, the only son in the family, but her father's extremely loving love. manifest your style very little interest in studying. hepler. create the same pictures and came time miltee mountaineer.
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DrUsha Tyagi's photo.

Sunday, April 13, 2014

कवि राजगोपाल




कवि राजगोपाल पर डॉ उषा त्यागी का बिजनौर टाइम्स में १३   अप्रैल २०१४ में छपा  लेख  

Monday, April 7, 2014

राज गोपाल सिंह बिजनौरी नही रहें

राज गोपाल सिंह नही रहें

राजगोपाल सिंह नहीं रहे। राजगोपाल  बिजनौरी कवि, गीतकार के साथ साथ एक बहुत अच्छे मित्र थे। मेरे कॉलेज के सखा। बी.ए में अध्ययन के दौरान उनसे परिचय हुआ। कई साल साथ रहा। उनका गला बहुत अच्छा था। बहुत शानदार गीत  गाते , रतजगे करते कब गीत लिखने लगे पता नहीं चला।
 दिल्ली  पुलिस में नौकरी मिलने के बाद फिर कभी संपर्क  नहीं हुआ। जीवन की व्यसतता में  बिजनौर आने पर वे कभी मिले नहीं। दिल्ली मैं   जाते बहुत बचता हूं। कभी इस सुदामा को जरूरत भी नहीं हुई।
हां गाहे -बगाहे उनकी कवितांए  दोहे पढ़ने को मिलते रहे। टीवी पर एक बार लालकिले से उन्हें कविता पाठ करते देख बहुत सुखद लगा। प्रत्येक कवि का सपना होता है  वह लाल किले में होने वाले कवि सम्मेलन में कविता पाठ करे। यह सपना उनका कई बार पूर्ण  हुआ।
आज सवेरे डा अजय जनमेजय के फोन से उनके निधन का पता चला। यह भी पता चला कि कई  माह से बीमार थे।  उनके परिवार जनों से उनकी खूब सेवा की।
बिजनौर के भाटान स्कूल से  राजकीय इंटर कॉलेज  के जाने वाले रास्ते पर उनका घर है। यहीं  उनका एक जुलाई  १९४७ में जन्म हुआ। बिजनौर की गलियों में खेलकूद कर बड़े हुए राजगोपाल सिंह बिजनौरी अब हमारे बीच नही रहे।
श्रद्धांजलि स्वरूप उनके कुछ दोहे  प्रस्तुत हैं-

बाबुल अब न होएगी,भाई बहन में जंग।
डोर  तोड़ अनजान पथ, उड़कर चली पतंग।
.........
बाबुल हमसे हो गई आखिर कैसी भूल,
क्रेता की हर शर्त जो, तूने करी कबूल।
.......
रोटी  रोजी में हुई  सारी उम्र तमाम,
कस्तूरी लम्हे हुए बिना मोल नीलाम।

धरती या किसान से,हुई किसी से चूक,
फसलों के बदले खेत में लहके है  बंदूक
..
 अदभुत है,  अनमोल है  महानगर की भोर,
रोज जगाए है  हमें कान फोड़ता शोर।
..
  राजगोपाल कि कुछ गजल

मैं रहूँ या न रहूँ, मेरा पता रह जाएगा
शाख़ पर यदि एक भी पत्ता हरा रह जाएगा

बो रहा हूँ बीज कुछ सम्वेदनाओं के यहाँ
ख़ुश्बुओं का इक अनोखा सिलसिला रह जाएगा

अपने गीतों को सियासत की ज़ुबां से दूर रख
पँखुरी के वक्ष में काँटा गड़ा रह जाएगा

मैं भी दरिया हूँ मगर सागर मेरी मन्ज़िल नहीं
मैं भी सागर हो गया तो मेरा क्या रह जाएगा

कल बिखर जाऊँगा हरसू, मैं भी शबनम की तरह
किरणें चुन लेंगी मुझे, जग खोजता रह जाएगा
...........

छीनकर पलकों से तेरे ख़्वाब तक ले जाएगा
एक झोंका याद के सारे वरक ले जाएगा

वक्त इक दरिया है इसके साथ बहना सीख लो
वरना ये तुमको बहाकर बेझिझक ले जाएगा

रास्ते चालाक थे देते रहे हमको फ़रेब
यह सुरग ले जाएगा और वो नरक ले जाएगा

दूल्हा बनकर हर ख़ुशी के द्वार आँसू एक दिन
आएगा और मांग भर, करके तिलक ले जाएगा

किसको था मालूम मौसम का मुसाफ़िर लूट कर
तितलियों से रंग, फूलों से महक ले जाएगा

...........
मौज-मस्ती के पल भी आएंगे
पेड़ होंगे तो फल भी आएंगे

आज की रात मुझको जी ले तू
चांद-तारे तो कल भी आएंगे

चाहतें दोस्ती की पैदा कर
रास्ते तो निकल भी आएंगे

आइने लाए जाएंगे जब तक
लोग चेहरे बदल भी आएंगे

अजनबी बादलों से क्या उम्मीद
आए तो ले के जल भी आएंगे

........
हमसे करते रहे दिल्लगी रात भर
नींद भी, ख़्वाब भी, आप भी रात भर

रात भर बादलों ने उड़ाई हँसी
छटपटाती रही इक नदी रात भर

ऐसा लगता है मौसम का रुख़ देखकर
बफ़र् शायद कहीं पर गिरी रात भर

फूल बनते ही कल जो बिखर जाएगी
याद आती रही वो कली रात भर

चांदनी पर ही सबने कहे शेÓर क्यों
सोचती ही रही तीरगी रात भर

......


राजगोपाल सिंह

चुप की बाँह मरोड़े कौन
सन्नाटे को तोड़े कौन

माना रेत में जल भी है
रेत की देह निचोड़े कौन

सागर सब हो जाएँ मगर
साथ नदी के दौड़े कौन

मुझको अपना बतलाकर
ग़म से रिश्ता जोड़े कौन

भ्रम हैं, ख़्वाब सलोने पर
नींद से नाता तोड़े कौन

...............
चढ़ते सूरज को लोग जल देंगे
जब ढलेगा तो मुड़ के चल देंगे

मोह के वृक्ष मत उगा ये तुझे
छाँव देंगे न मीठे फल देंगे

गंदले-गंदले ये ताल ही तो तुम्हें
मुस्कुराते हुए कँवल देंगे

तुम हमें नित नई व्यथा देना
हम तुम्हें रोज़ इक ग़ज़ल देंगे

चूम कर आपकी हथेली को
हस्त-रेखाएँ हम बदल देंगे
राजगोपाल के काव्य संग्रह चिराग से ली गई  रचनांए
अशोक मधुप






Friday, March 28, 2014

तीन जिलों के उम्मीदवारों की तकदीर भी लिखता था बिजनौर


Mon, 24 Mar 2014 11:16 PM (IST jagran ki story

प्रवीण वशिष्ठ, बिजनौर।
लोकतन्त्र के महापर्व में आहुति देने जा रहे इस दौर के अधिकांश लोग इस तथ्य से अनजान हैं कि 1952 में हुए पहले लोकसभा चुनावों में बिजनौर जिले के मतदाताओं का एक हिस्सा वर्तमान उत्तराखंड राज्य और सहारनपुर जिले से जुड़कर वहां की दो सीटों के उम्मीदवारों की तकदीर भी लिखता था। इनमें से एक सीट पर जनपद निवासी स्वतन्त्रता सेनानी महावीर त्यागी चुने गए थे।
वर्ष 2009 में नए परिसीमन के बाद बिजनौर लोकसभा क्षेत्र बिजनौर के साथ-साथ मुजफ्फरनगर और मेरठ जिलों तक फैल गया है। इतने अधिक क्षेत्र में फैले लोकसभा क्षेत्र में पहुंचना सांसद के लिए किसी चुनौती से कम नहीं है, लेकिन पहले लोकसभा चुनाव में स्थिति और भी अधिक परेशानी भरी थी। बिजनौर जिले का अधिकांश हिस्सा बिजनौर (दक्षिण) नाम की सीट में शामिल था और इस सीट से नेमीशरण जैन ने गोविंद सहाय को हराकर विजय प्राप्त की थी। इसके अलावा जिला दो दूरस्थ सीटों में भी बंटा था। देहरादून-बिजनौर (उत्तर-पश्चिम)
-सहारनपुर (पश्चिम)सीट में नजीबाबाद और गढ़वाल (पश्चिम)-टिहरी गढ़वाल-बिजनौर (उत्तर) सीट में जिले का अफजलगढ़ क्षेत्र आता था। देहरादून-बिजनौर (उत्तर-पश्चिम)-सहारनपुर (पश्चिम)सीट से कांग्रेस ने स्वतन्त्रता सेनानी महावीर त्यागी को मैदान में उतारा था। वह जिले की चांदपुर तहसील के गांव रतनगढ़ निवासी थे। उन्होंने 122141 मत प्राप्त कर भारतीय जनसंघ के जेआर गोयल 26472 को हराया था। निर्दलीय आरडी बनर्जी तीसरे और सोशलिस्ट पार्टी के रामकिशन वर्मा चौथे स्थान पर रहे थे।
गढ़वाल (पश्चिम)-टिहरी गढ़वाल-बिजनौर (उत्तर) सीट पर निर्दलीय प्रत्याशी टिहरी की महारानी कमलेंदुमति शाह ने 68811 मत पाकर कांग्रेस की कृष्णा सिंह 54829 को हरा था। किसान मजदूर प्रजा पक्ष के श्याम चंद नेगी तीसरे स्थान पर रहे थे। वर्ष 1957 में हुए चुनाव से बिजनौर जिले के नजीबाबाद और अफजलगढ़ क्षेत्र का पहाड़ की दोनों सीटों से संबंध खत्म हो गया। यहां की मुख्य सीट का नाम भी बिजनौर (दक्षिण) से बदलकर बिजनौर हो गया।

Wednesday, March 12, 2014


Tuesday, January 28, 2014

दुनिया के जूनियर आर्टिस्ट पी.के. साईल

28 जनवरी। पुण्यतिथि है दुनिया के जूनियर आर्टिस्ट पी.के. साईल डा. वीरेंद्र स्योहारा। फिल्म इंडस्ट्रीज के ट्रेजिडी किंग दिलीप कुमार की फिल्म मेला में ये जिंदगी के मेले दुनिया में कम न होंगे, अफसोस हम न होंगे-गाना जिस फकीर पर फिल्माया गया वो आज भी लोगो की याद में जिंदा है। लेकिन शायद ही किसी को मालूम हो कि इस फकीर की एङ्क्षक्टग करने वाला कलाकार स्योहारा का था। नाम था महमूद। बचपन में मां -बाप का साया सर से हट जाने के बाद महमूद ११ वर्ष की उम्र में पूना चले गये ।यहां पेट की आग रंगमंच तक ले आई। कुछ वर्षों तक उस समय के प्रसिद्ध कव्वाल बाबू भाई की कम्पनी में सहायक कव्वाल के रूप में काम कर अलग पहचान बनाई। कम्पनी का मुम्बई में प्रोग्राम होने पर महमूद को मुम्बई इतनी पसंद आई की ये वहीं रम गये। उस समय बन रही साईलैंस फिल्मों में काम किया। जब बोलती फिल्म आनी शुरू हुई। पहली बोलती फिल्म आलम आरा में महमूद ने काम किया। उसी समय उन्होंने अपना नाम पी.के. साईल रख लिया था। जूनियर आर्टिस्ट एसोसिएशन के सदस्य बन चुके थे। उन्होंने मुम्बई में ही एक मुस्लिम महाराष्टन से शादी कर ली। उनके एक बेटी और एक बेटा पैदा हुआ। मेला फिल्म में उस फकीर का रोल मिला जिसपर ये जिंदगी के मेले दुनिया में कम न होंगे, अफसोस हम न होंगे फिल्माया गया। उसके बाद उन्होंने ५० वर्षों तक ७३ से भी अधिक फिल्मों में अभिनय किया। पी.के. साईल को सोहराब मोदी से लेकर दिलीप कुमार जैसे कलाकारों के साथ काम करने का मौका मिला। उन्होंने पुकार, मुगलेआजम, गंगाजमना, उड़नखटोला, मेला, पाकीजा, संगम, आजाद, लुटेरा, आंखे, संघर्ष, मिर्जा गालिब, पालकी, मेरे महबूब, कोहिनूर, बरसात, जिस देश में गंगा बहती है, फौलाद, वक्त, गूंज उठी शहनाई, सुसराल, दीवाना, पिंजरे के पंछी, हरियाली और रास्ता, शहीद आदि फिल्मो में काम किया। पी.के. साईल की बेटी की मौत के बाद उनका मन मुम्बई से उखड़ गया, और वे १९६७ में सपरिवार अपने वतन स्योहारा वापस आ गये। जहां २८ जनवरी २००१ को उनका निधन हो गया। उनके पुत्र मुहम्मद आरिफ पेंटर ने बताया कि उनके पिता मुम्बई से वापस तो आगये लेकिन फिल्मों में आज भी वो जिंदा हैं। वो कहा करते थे, हमतो मर जाएंगे यही नियति है, तुम हमे याद करो एक तमन्ना है यही। डा. वीरेंद्र