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बिजनौर का सांस्कृतिक इतिहास और विरासत

  बिजनौर का सांस्कृतिक इतिहास और विरासत    प्राचीन वृत्तांतों (इतिहास) के अनुसार , बिजनौर जिला मेरठ मंडल का उत्तर-पश्चिमी हिस्सा है। किंवदंतियों के अनुसार , इस शहर की स्थापना राजा वेन (बैन/बेना) ने की थी , जो महाभारत और पुराणों के एक छोटे नायक (वीर राजा) भी थे। ऐसा माना जाता है कि वे अपनी प्रजा से कोई कर (टैक्स) नहीं वसूलते थे। वे ' बीजना ' ( स्थानीय भाषा में जिसका अर्थ पंखा होता है) बनाकर और बेचकर राजस्व (कमाई) इकट्ठा करते थे। इसलिए , यह तर्क दिया जाता है कि ' बिजनौर ' शब्द की उत्पत्ति ' बीजनगर ' ( पंखों का शहर) या ' विजयनगर ' ( जीत का शहर) से हुई है। बिजनौर सहारनपुर , मुजफ्फरनगर , मेरठ , मुरादाबाद , नैनीताल और रामपुर जिलों से घिरा हुआ है। भारतीय इतिहास के प्राचीन काल के किसी भी अन्य स्थान की तरह बिजनौर के इतिहास को संकलित करने के स्रोत बहुत सीमित (अल्प) हैं। वर्ष 1895-96 में यहाँ तांबे के कुछ प्रागैतिहासिक हथियार मिले थे , जो एक भौगोलिक इकाई के रूप में उत्तर भारत के कई अन्य स्थानों से भी खोजे गए हैं। इस जिले में इन उपकरणों के पाए जाने का पहला द...

मधुमक्खियों के हमले से झालू नही बना जिला

    राजस् थान   के झालावाड़ जनपद में मार्क ड्रिल के दौरान मधुमक्खियों ने हमलाकर दिया। मधुमक्खियों के हमले से बचने के लिए अ धि क ा री भागते नजर आए 1 उत्तर प्रदेश के ललितपुर में   25 मई को सीडीओ   और एडीएम को भी मधुमक्खियों ने हमलाकर घायल कर दिया। −−−−−−−−−−−−−−−−−−−−−−− बिजनौर जनपद में भी मधुमक्खियों के दो हमले   इतिहास में दर्ज हो गया। इनमें से एक की   वजह से झालू जिला मुख्यालय बनने से रह गया। 1817 में  बिजनौर जनपद की स्थापना हुई। सर्वप्रथम इसका मुख्यालय नगीना बनाया गया। फिर कमीशन ने मुख्यालय के लिए भूमि तलाश शुरू की। फिर झालू में मुख्यालय स्थापना की कोशिश की गई , लेकिन यह रणनीति परवान नहीं चढ़ डिस्ट्रिक्ट गजेटियर के मुताबिक इससे पहले बिजनौर मुरादाबाद का हिस्सा था। 1817 में यह मुरादाबाद से अलग हुआ। नाम मिला नार्थ प्रोविस ऑफ  मुरादाबाद।  मुख्यालय बना नगीना। इसके पहले कलक्टर बने मिस्टर  बोसाकवेट। नगीना  के बाद जनपद मुख्यालय की पहली पसंद अंग्रेजी हुकूमत के लिए कस्बा झालू था। झालू में जहां राजकीय ब...

बिजनौर की बेटियों ने बढा़या बापू का मान

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​बिजनौर में कबड्डी-कुशल पाल सिंह

 इस दस्तावेज़ के आधार पर बिजनौर में कबड्डी के इतिहास, प्रमुख खिलाड़ियों, महत्वपूर्ण प्रतियोगिताओं और जिला कबड्डी संघ के उतार-चढ़ाव की पूरी कहानी नीचे दी गई है: ​बिजनौर में कबड्डी की शुरुआत और शुरुआती दौर ​ भौगोलिक संबंध : गंगा नदी के किनारे बसे बिजनौर जिले का कबड्डी खेल से बेहद गहरा नाता रहा है। ​ शुरुआती स्वरूप : शुरुआत में इस खेल के लिए किसी विशेष सामग्री की जरूरत नहीं होती थी; जमीन पर पाला (लाइन) खींचकर खिलाड़ी दो हिस्सों में बंटकर खेल शुरू कर देते थे। ​ स्थानीय आयोजन : आरम्भ में यह खेल ग्रामीण मेलों, तीज-त्योहारों, गांवों और कस्बों में स्थानीय स्तर पर खेला जाता था। धीरे-धीरे इसने प्रतियोगिता का रूप ले लिया, जहाँ एक गांव या कस्बे की टीम दूसरे स्थान की टीम से मुकाबला करती थी। ​ चांदपुर का विशेष स्थान : जिले की कबड्डी में चांदपुर का हमेशा से विशेष स्थान रहा। इसके पास स्थित ईस्माइलपुर गांव के पुराने प्रसिद्ध खिलाड़ियों में स्वर्गीय भारत सिंह, स्वर्गीय जोरावर सिंह, स्वर्गीय हरपाल सिंह, स्वर्गीय रोहताश सिंह, स्वर्गीय गुलाब सिंह और स्वर्गीय जमीर मियां शामिल थे, जिनक...