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1980 में बिजनौर मुरादाबाद मंडल में शामिल हुआ

 14 सितंबर 1980 मुरादाबाद मंडल की स्थापना हुई। बिजनौर इसमें शामिल हुआ। पहले चार बिंदुओं की पुष्टि भारत की जनगणना के बिजनौर जिला जनगणना पुस्तिका के ऐतिहासिक विवरण से होती है।  अंतिम दो बिंदुओं की पुष्टि मुरादाबाद मंडल की आधिकारिक वेबसाइट करती है।  आपके प्रश्न का सीधा उत्तर: बिजनौर जिला मेरठ मंडल से अलग होकर मुरादाबाद मंडल में 14 सितंबर 1980 को शामिल हुआ। इस तारीख को मुरादाबाद मंडल के आयुक्त कार्यालय की स्थापना हुई थी।  आधिकारिक स्रोत: मुरादाबाद मंडल का इतिहास बिजनौर जिला गजेटियर एवं इतिहास ध्यान देने योग्य बात यह है कि 1817 में बिजनौर का अलग जिला बनना और 1980 में उसका मेरठ मंडल से मुरादाबाद मंडल में जाना दो अलग प्रशासनिक घटनाएँ थीं

डा खालिद अलवी

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 डॉ. खालिद अलवी का जन्म 20 जून 1962 को उत्तर प्रदेश के बिजनौर जिले के चाँदपुर में हुआ था। उनका पूरा नाम खालिद मुस्तफ़ा अलवी बताया जाता है। उनकी प्रारंभिक शिक्षा अपने गृह नगर चाँदपुर में हुई। इसके बाद वे उच्च शिक्षा के लिए दिल्ली पहुँचे और दिल्ली विश्वविद्यालय से जुड़े। उन्होंने उर्दू साहित्य में शोध किया और आगे चलकर अध्यापन तथा साहित्यिक आलोचना को अपने कार्यक्षेत्र के रूप में चुना। डॉ. अलवी की पहचान केवल एक शिक्षक के रूप में नहीं है। वे उर्दू के ऐसे आलोचक हैं जिन्होंने साहित्यिक रचनाओं को उनके ऐतिहासिक और वैचारिक संदर्भों में समझने का प्रयास किया है। उनकी रुचि विशेष रूप से ग़ज़ल, आधुनिक उर्दू साहित्य और प्रगतिशील साहित्यिक आंदोलन में रही है। उनकी रचनाओं में साहित्य के बदलते रूप, विचारधाराओं के प्रभाव और रचनाकारों की भूमिका पर विचार मिलता है। उनकी चर्चित पुस्तकों में ग़ज़ल के जदीद रुजहानात विशेष महत्त्व रखती है। यह पुस्तक 1996 में दिल्ली के एजुकेशनल पब्लिशिंग हाउस से प्रकाशित हुई थी। इसमें उर्दू ग़ज़ल के आधुनिक रुझानों, उसकी विषयवस्तु, शैली और अभिव्यक्ति में आए बदलावों का विश्लेषण क...

भादो दूज और बूढ़े बाबा का मेला

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 भादो दूज और बूढ़े बाबा का मेला भारतीय संस्कृति लोकमेलों और लोकपर्वो की समृद्ध विरासत है ।हमारे यहाँ मेले केवल धार्मिक आस्था के आयोजन नहीं होते हैं बल्कि ये लोकजीवन के खुले मंच होते हैं । इनमें आस्था, परंपरा, व्यापार, मनोरंजन, रिश्ते और सामुदायिक स्मृति एक साथ दिखाई देते हैं। किसी देवता या लोकनायक की मान्यता से जुड़े मेले जब-जब भी लगते हैं तो उनके साथ आसपास के गाँवों की पूरी जीवन-लय वहाँ आ जुटती है। लोक मेलों में लोक की सहजता और आत्मीयता देखते ही बनती है। यहाँ दूर-दराज़ से आए लोग आपस में मिलते हैं। मेल-जोल रिश्तों में बदलते हैं।कारीगर अपनी वस्तुएँ लेकर आते हैं। लोककलाकार अपनी कला प्रस्तुत करते हैं और बच्चे मेले की रंगीन दुनिया में अपना अलग आनंद खोजते हैं।मेले सामूहिक रूप से जीने का अनुभव है। ऐसे ही यूपी के जनपद बिजनौर में भाद्रपद शुक्ल पक्ष की द्वितीया तिथि पर तीन दिवसीय एक मेला लगता है ।जिसे लोक भाषा में दूज , दोज , दोयज और बूढ़े बाबा का मेला नाम से जाना जाता है ।इस ऋतु में जब बरसाती बादलों की आवाजाही लगी रहती है । तब दूज के दिन बिजनौर जनपद के कई क्षेत्रों में चहल-पहल बढ़ने लगती ह...

सम्भल के सूबेदार हाकिम मिर्ज़ा का मकबरा

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  कस्बा नहटोर के इस बदहाल मकबरे में मुगलकालीन सम्भल के सूबेदार हाकिम मिर्ज़ा मुबारकुल्ला सो रहे हैं इन् ‍ होंने नहटोर में एक मस्जिद भी बनवाई थी. पढि़ए मिर्जा साहब के बदहाल मकबराा .......... मुगल शासक अकबर के शासनकाल में संभल को सुबे का दर्जा प्राप्त हुआ करता था और मिर्ज़ा सुबे संभल के अधीन थे उस समय के सूबेदार, प्रान्तीय दीवान एवं चुंगी-अफसर कभी-कभी सरकार की आज्ञा के विरुद्ध काम किया करते थे और अधिकतर स्वार्थपूर्ण उद्देश्यों से ही ऐसा होता था। सूबे के प्रत्येक सूबेदार को एक मनसब मिला हुआ था। यह श्रेणी एवं लाभ से युक्त सरकारी नियुक्ति होती थी। अतएव सिद्धान्त रूप में प्रत्येक मनसब-प्राप्त सुबेदार को राज्य की सैनिक सेवा के लिए कुछ सिपाही भेजना आवश्यक होता था। इस प्रकार सुबे के अधिकतर सुबेदार थे तथा यह प्रबन्ध सेना, कुलीन वर्ग और असैनिक शासन सब-कुछ मिलकर एक था।मुगलो ने सम्भल के पदाधिका रियों को तेंतीस वगों में बाँटा, जिनमें दस सुबेदार से लेकर दस हजार के सेनापति तक थे। उस समय के हकीम मिर्जा मुबारकुल्लाह का यह मकबरा तकरीबन 1556 में बना था यह ऊंचे टीले पर बना हुआ था इसके 4 दरवाजे हैं...

नगीना_के_सेठ_साहू_विशेश्वर

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  बिजनौर #नगीना_के_सेठ_साहू_विशेश्वर का वैभव आज भी इस आलीशान हवेली में जीवंत हैं साहू साहब के वंशजो ने आज भी अच्छा रखरखाव कायम रखा है यह लेख इस हवेली को देखने को लालायित करेगा #एकबार_जरूर_पढ़े ----------- मोहल्ला साहूवान निवासी साहू विशेश्वर नाथ का जन्म 29 नवंबर सन 1875 को हुआ था ब्रिटिश सरकार ने उन्हें ऑनरेरी मजिस्ट्रेट सन 1902 मे नियुक्त किया गया था वर्ष 1914 में प्रथम विश्व युद्ध के दौरान ब्रिटिश सरकार ने साहू विशेश्वर नाथ से सहयोग मांगा था जवाब मे साहू विशेश्वर नाथ ने लाखो रुपयो की सरकार को मदद की थी इसी से खुश होकर अंग्रेज अधिकारियों ने साहू विशेश्वर नाथ को राय साहब की उपाधि दी थी सेठ साहू विशेश्वर नाथ नगीना क्षेत्र के बड़े जमींदार भी थे बाद में उन्हें न्यायिक मजिस्ट्रेट भी बना दिया गया था साहू विशेश्वर नाथ और परिवार वालों की हवेलियां है इ‌स हवेली के नीचे बडे बडे तहखाने व नगीना शहर से सुरंग के जरिये शहर से बाहर निकलने के लिए बडी बडी सुरंगे आज भी मौजूद है साहू विशेश्वर नाथ की हवेली के भीतर दीवानखाने में न्यायालय स्थापित किया गया था जहां क्षेत्र के मुकदमों की सुनवाई की जाती थी ह...