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बिजनौर में कबड्डी-कुशल पाल सिंह
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इस दस्तावेज़ के आधार पर बिजनौर में कबड्डी के इतिहास, प्रमुख खिलाड़ियों, महत्वपूर्ण प्रतियोगिताओं और जिला कबड्डी संघ के उतार-चढ़ाव की पूरी कहानी नीचे दी गई है: बिजनौर में कबड्डी की शुरुआत और शुरुआती दौर भौगोलिक संबंध : गंगा नदी के किनारे बसे बिजनौर जिले का कबड्डी खेल से बेहद गहरा नाता रहा है। शुरुआती स्वरूप : शुरुआत में इस खेल के लिए किसी विशेष सामग्री की जरूरत नहीं होती थी; जमीन पर पाला (लाइन) खींचकर खिलाड़ी दो हिस्सों में बंटकर खेल शुरू कर देते थे। स्थानीय आयोजन : आरम्भ में यह खेल ग्रामीण मेलों, तीज-त्योहारों, गांवों और कस्बों में स्थानीय स्तर पर खेला जाता था। धीरे-धीरे इसने प्रतियोगिता का रूप ले लिया, जहाँ एक गांव या कस्बे की टीम दूसरे स्थान की टीम से मुकाबला करती थी। चांदपुर का विशेष स्थान : जिले की कबड्डी में चांदपुर का हमेशा से विशेष स्थान रहा। इसके पास स्थित ईस्माइलपुर गांव के पुराने प्रसिद्ध खिलाड़ियों में स्वर्गीय भारत सिंह, स्वर्गीय जोरावर सिंह, स्वर्गीय हरपाल सिंह, स्वर्गीय रोहताश सिंह, स्वर्गीय गुलाब सिंह और स्वर्गीय जमीर मियां शामिल थे, जिनक...
मधु महेंद्र राही
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Conversation with Gemini You said टैक्स्ट करें Gemini said इमेज image_28d2e7.jpg में दिए गए समाचार पत्र के लेख का पूरा टेक्स्ट नीचे दिया गया है: ... और अनंत यात्रा पर निकल गये राही जी ● अनिल शर्मा 'अनिल' 'बोल प्रिये, तेरा देश कहां है?' 'प्रिये के देश की तलाश करने को अनंत यात्रा की राह पर 'राही' जी ऐसे चले जाएंगे लगता नहीं था। 2 नवम्बर को जब अचानक राही जी की भौतिक संसार से विदाई की खबर मिली तो विश्वास ही नहीं हुआ। श्री मधु महेन्द्र राही ने साहित्य जगत में अपनी अलग पहचान बनायी थी। साहित्य की कोई भी विधा ऐसी नहीं जिसके विपुल भण्डार में राही जी की रचनाएं न हों। नाटक, उपन्यास, कहानी, गीत, मुक्तक, गजल, दोहे, हास्य व्यंग्य, नयी कविता सभी में तो राही जी की उपस्थिति है। अनंत आकाश में आकाशवाणी के माध्यम से फैले राही जी के शब्द विचरण कर रहे हैं। राही की सादगी और स्पष्टवादिता हर दिल में जगह बनाए हुए है। उनकी रचनाओं में वे हैं और उनके व्यक्तित्व में उनकी रचनाएं थीं। राष्ट्रीय स्तर पर चर्चित होने के बाद भी गुरुजी में वह अहं भाव कहीं नहीं था जो आजकल जरा सी चर्चा मिलने प...
पौराणिक अर्गलापुरी से नांगल सोती: विकास की दरकार
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पौराणिक अर्गलापुरी से नांगल सोती: विकास की दरकार - हरिद्वार का प्राचीन प्रवेश द्वार आजादी के बाद से उपेक्षित -80 वर्ष बाद गंगा नदी पर पुल निर्माण की आस जगी -उत्तरी क्षेत्र का कार्तिक पूर्णिमा स्नान का पहला स्थान बिजनौर। नजीबाबाद विधानसभा का आज का नांगल सोती पौराणिक अर्गलापुरी कभी विश्व प्रसिद्ध तीर्थ नगरी हरिद्वार का प्रवेश द्वार हुआ करता था। बिजनौर व नजीबाबाद दिशा से श्रद्धालु पैदल मार्ग से गंगा नदी पार कर ही हरिद्वार व चारधाम के लिए यहीं से होकर आवागमन करते थे। अर्गलापुरी का शाब्दिक अर्थ "सांकल ' व कुंडी है। धार्मिक दृष्टि से "अवरोध है। जीवन में अवरोध को हटाने के लिए "अरगला स्त्रोत" देवी पूजन में महत्व बताया गया है। बताया जाता है तीर्थ नगरी हरिद्वार व चारधाम जाने के लिए पौराणिक बस्ती अर्गलापुरी की सांकल या कुंडी … पौराणिक अर्गलापुरी से नांगल सोती: विकास की दरकार - हरिद्व...
बिजनौर पर कविताएं
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मेरे शहर, बिजनौर डॉ वंदना शर्मा ए मेरे शहर 'बिजनौर' तेरे बारे में दुनिया कुछ भी कहे पर मेरे लिए तू खास है तेरी गलियों में मेरा बचपन बीता वो सुनहरे दिन, वो स्कूल की यादें तेरे संग खेलकर मैं बड़ी हुई वक्त के तूफानों को दोनों ने झेला दुःख के झमेलों को, खुशी के ठिठोलों को बदलते रिश्तों को, निरन्तर परिवर्तन को दोनों ने साथ देखा हर समय तूने मुझे पहचान दी एक नई उड़ान दी जिन्दगी के कुछ खास लम्हें भी जिए तेरी गोद में कुछ यादें अनकही कुछ खुशबुएँ अनछुई कुछ अहसास पहली बार जिए कुछ सपने तेरे साथ बुने कुछ बरसातें बड़ी खास रही वो पहली दुआन प्यार की वो मीठी यादें टकरार की तेरे संग-संग तो जाना मैंने हर रंग जिन्दगी का पहचाना मैंने ए मेरे शहर, मेरे हमसफर तुझे है सलाम मेरा मेरी यादो...
ओमदत्त आर्य
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किरतपुर के पास के ग्राम अब्दुल फजलपुर में 31 जुलाई 1940 में जन्में ओमदत्त आर्य बिजनौर की भाषा और बिजनौर की ग्रामीण भाषा के शब्द संचय का ऐसा कार्य किया , शायद ही कोई कर पाएं। वे अपने शोध के लिए गांव− गांव गए।ग्रामीण शब्द जाने । उन्हें संग्रहित किया । इसका नाम है− बिजनौर क्षेत्र की ग्रामोद्योग-संबंधी शब्दावली का अध्ययन। इसमें दुर्लभ शब्द संग्रह है। आज तो इन्में से काफी शब्द विलुप्त हो गए होंगे। एक बात और आर्य जी मेरे से दस साल बड़े है किंतु जब भी मिले मित्रवत प्यार दिया।लगभग एक साल पूर्व मेरा इनसे मिलने का मन हुआ। नई बस्ती में कर्बला के पास बने इनके घर पंहुच गया। इनके बेटे चारूदत्त ने बताया कि दो साल से इनकी स्मृति नही हैं। मेरी जानकारी मिलने पर आर्य जी आए। बात करते रहे फिर अपनी पुस्तक लेकर आए। बेटे चारू से कहने लगे कि इनका नाम लिख दो। मैंने चारू को मना कर दिया। कहाकि नाम खुद लिखो।आर्य जी ने अपनी याद से मेरा नाम लि...