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मुईन शादाब :

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 मुईन शादाब : छोटी सी बस्ती से वैश्विक क्षितिज तक का सफ़र।  डॉक्टर शेख़ नगीनवी          उर्दू साहित्य के इतिहास में कुछ नाम ऐसे होते हैं जो अपने आप में एक आंदोलन होते हैं। वे किसी बड़े शहर, किसी बड़ी यूनिवर्सिटी या किसी बड़े संस्थान के मोहताज नहीं होते, बल्कि अपनी मेहनत, लगन और ईश्वर-प्रदत्त प्रतिभा से अपना रास्ता खुद बनाते हैं। जिला बिजनौर की उपजाऊ धरती के ऐसे ही एक सपूत का नाम *मुईन शादाब* है।       10 अक्टूबर को जिला बिजनौर के गाँव रवाना के एक प्रतिष्ठित और शिक्षित परिवार में जन्मे मुईन शादाब का आज जन्मदिन है। यह सिर्फ एक शायर का जन्मदिन नहीं है, बल्कि बिजनौर से दिल्ली और दिल्ली से दुबई तक की एक सफल साहित्यिक और पत्रकारिता की यात्रा का उत्सव है। आज जब हम उनका यौम-ए-विलादत मना रहे हैं तो ये सिर्फ़ एक शायर की सालगिरह नहीं, बल्कि बिजनौर से दिल्ली, दिल्ली से दुबई तक की एक कामयाब अदबी और सहाफ़ती जद्दोजहद का जश्न है। मोईन शादाब का बचपन उसी गंगा-जमुनी तहज़ीब में गुज़रा जिसकी मिट्टी में अदब की ख़ुशबू बसी है। इब्तिदाई तालीम घर पर हुई, उसके बाद...

गाँव अकबराबाद

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 बिजनौर के नजीबाबाद तहसील का अकबराबाद: 1857 के गदर में लूटपाट, ग्रामीण संघर्ष और मकानों को जलाए जाने का ऐतिहासिक विवरण बिजनौर जनपद की नजीबाबाद तहसील के अंतर्गत स्थित अकबराबाद गाँव का वर्ष 1857 का इतिहास स्थानीय संघर्षों और ग्रामीण अशांति की उन घटनाओं से जुड़ा है, जिनका उल्लेख सर सैयद अहमद ख़ाँ ने अपनी समकालीन ऐतिहासिक पुस्तक तारीख़-ए-सरकशी-ए-जिला बिजनौर में किया है। इस पुस्तक का अंग्रेज़ी अनुवाद History of the Bijnor Rebellion के नाम से उपलब्ध है। इसमें अकबराबाद और आसपास के गाँवों में हुई लूटपाट, आपसी संघर्ष तथा मकानों में आग लगाए जाने की घटनाओं का विवरण मिलता है। 1857 के गदर के दौरान अकबराबाद की घटनाएँ (1)अकबराबाद में पटवारियों से लूटपाट 1857 के विद्रोह के दौरान जिले के ग्रामीण इलाकों में अशांति बढ़ने लगी थी। सर सैयद अहमद ख़ाँ के विवरण के अनुसार, अकबराबाद में गाँव के अधिकारियों और कसाइयों का एक समूह सक्रिय हुआ। पुस्तक में प्रयुक्त अंग्रेज़ी शब्द Village Overseers का आशय गाँव की निगरानी अथवा प्रबंधन से जुड़े व्यक्तियों से है। हालाँकि, इस शब्द को किसी निश्चित प्रशासनिक पदनाम का प्रम...

रामजी वाला

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 रामजीवाला 1857 की एक भूली-बिसरी कहानी बिजनौर के मंडावर क्षेत्र का रामजीवाला गांव 1857 के विद्रोह के दौर की घटनाओं का साक्षी रहा है सर सैयद अहमद खान द्वारा प्रमाणित पुस्तक History of the Bijnor Rebellion के लेख में रामजीवाला का उल्लेख मिलता है  1857 के गदर की चर्चा जब बिजनौर में होती है तो मेरठ बिजनौर शहर और नजीबाबाद रावली घाट जैसे बड़े नाम सामने आते हैं लेकिन रामजी वाला जैसे गांव भी उस उथल-पुथल के मूक गवाह रहे हैं मंडावर क्षेत्र का यह गांव उस दौर के सामाजिक तनाव और संघर्ष से जुड़ी घटनाओं का साक्षी बना 1857 मे गदर के दौरान इस गांव में फैली अशांति आपसी संघर्ष और सत्ता के कमजोर पड़ने ने पूरे इलाके की सामाजिक व्यवस्था को प्रभावित किया था। रामजीवाला में लोगों का जुटना और उसके बाद आसपास के गांवों में हुए संघर्ष इस बात की याद दिलाते हैं कि 1857 केवल सैनिक विद्रोह नहीं था बल्कि क्रांति की लपटें गांवों और आम लोगों के जीवन तक भी पहुंची थीं आज रामजीवाला सामान्य गांव दिखाई देता है लेकिन इसकी मिट्टी में 1857 की उस उथल-पुथल की एक भूली-बिसरी कहानी दबी हुई है जिसे इतिहास के दस्तावेजों और पुर...

सराय जीवन

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 बिजनौर-नजीबाबाद मार्ग पर जीवन सराय रोहिल्ल खण्ड की पहचान रखने वाला गांव है सरकारी अभिलेखों में इस गांव का नाम सराय जीवन दर्ज है बीबो बेगम और नवाब जहांगीर ख़ान की एक भुला दी गई प्रेम-कथा...! नजीबाबाद का इतिहास केवल नवाब नजीबुद्दौला, पत्थरगढ़ और रोहिला सत्ता तक सीमित नहीं है इतिहास में एक ऐसी स्त्री की कहानी छिपी है जिसने अपने पति की असमय मृत्यु के बाद उसकी स्मृति को पत्थरों में अमर कर बिजनौीबो बेगम को नवाब नजीबुद्दौला के नवासे नवाब जहांगीर ख़ाँ की बेगम थी नवाब जहांगीर ख़ाँ का विवाह किरतपुर के कोटला मोहल्ले में हुआ था  विवाह के लगभग दो वर्ष बाद जब नवाब जहांगीर ख़ाँलाव लश्कर के साथ गौने की रस्म के लिए अपनी बेगम को लेने गए थे वापसी के दौरान जीवन सराय के निकट उत्सव की आतिशबाजी में छोड़ा गया बारूद का गोला नवाब जहांगीर ख़ाँ को लग गया था इस हादसे में नवाब जहांगीर ख़ाँ की मृत्यु हो  गयी थी उस घटना से बीबो बेगम के जीवन में ऐसी शोक की लहर लेकर आई जिसने उनके पूरे जीवन  की दिशा बदल दी थी  नवाब जादी बीबो बेगम का एक योगदान बीबो बेगम को नजीबाबाद की शाही जामा मस्जिद के निर्माण ...

मेमन सादात

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 मेमन अर्थात मेमन सादात गांव आज भी समेटे हैं  सदियों पुरानी विरासत 🔭🔎 मेमन सादात 1168 ईस्वी से चली आ रही सैयद परंपरा और 1857 के गदर की कहानी बिजनौर जनपद का इतिहास केवल शहरों किलों और राजघरानों तक ही सीमित नहीं है बिजनौर जिले के अनेकों गांवों की गलियों मे पुराने मकानों मे मज़ारों मस्जिदों मन्दिरों मठो और इमामबाड़ों में सदियों पुरानी सामाजिक और सांस्कृतिक स्मृतियां आज भी जीवित हैं इन्हीं ऐतिहासिक बस्तियों में मेमन सादात का नाम विशेष महत्व रखता है। स्थानीय वंशपरंपरा के अनुसार मेमन सादात में सैयद परिवारों की बसावट लगभग 1168 ईस्वी से मानी जाती है दीवान शाह सैयद अशरफ पुत्र आरिफ शाह पंजाब के धारसू नवाजपुरा से यहां आकर बसे थे स्थानीय परंपरा उन्हें हजरत जैद शहीद की औलाद से जोड़ती है हालांकि इस वंशावली और तिथि की पुष्टि के लिए प्राचीन दस्तावेजों एवं अभिलेखों का अध्ययन आवश्यक है। मेमन सादात की मज़ार और जामा मस्जिद बनी पहचान दीवान शाह सैयद अशरफ की स्मृति आज भी उनके मज़ार के रूप में संरक्षित है स्थानीय मान्यता के अनुसार उनका मज़ार गांव के तालाब के किनारे स्थित है और उनकी बनाई हुई जामा मस...

बिजनौर के धर्मेंद्र त्यागी की देन है परिवार कल्याण का लाल तिकोन

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बिजनौर के धर्मेंद्र त्यागी की देन है परिवार कल्याण का लाल तिकोन बिजनौर जनपद का रतनगढ़ एक एतिहासिक गांव है। इस गांव ने देश को कई प्रतिभाएं दी । देश के परिवार कल्याण कार्यक्रम को लाल तिकोन देने वाले धर्मेंद्र त्यागी−देव त्यागी उर्फ डीके त्यागी इसी रतनगढ़ की संतान हैं। रतनगढ़ की स्थापना उन्नीसवीं शताब्दी के आरंभ में राव जोखा सिंह त्यागी ने की थी। वे मराठा संघ सेना की उत्तरी शाखा के पूर्व सेनापति (या राव ) थे । इनका नियंत्रण हिमालय की तराई घाटियों तक फैला हुआ था। दिल्ली के युद्ध में मराठों के पतन के बाद, वे एक भाड़े के साहसी सैनिक बन गए। कुछ समय तक उन्होंने मेरठ के पास स्थित सरधना रियासत के सेनापति ( सिपहसलार ) के रूप में कार्य किया । इनके परिवार वाले बताते हैं कि सरधना की बेगम समरू के नाराज होने पर इन्होंने सरधना छोड़ दिया। पहले बुलंदशहर गए। बाद में राम जोखा सिंह रतनगढ़ आ गए। उन्होंने ही रतनगढ़ की स्थापना की। नूरपुर के निवासी धर्मेंद्र त्यागी 1950 के आसपास भारत के स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण विभाग में डाइरेक्टर बने। 1950 और 1960 के दशक में लोगों को परिवार नियोजन के प्रति जागरूक करना सबसे ...

प्रकाश मेहरा नही रोकते , तो आज स्टार नही होते अमिताभ

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