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लालढांग क्षेत्र की कहानी

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लालढांग रोहिल्लों से अंग्रेजों तक इतिहास के एक पुराने दरवाज़े की कहानी नजीबाबाद-हरिद्वार मार्ग से कोटद्वार की ओर जाते हुए जिस लालढांग को हम एक सामान्य गांव बाजार और जंगल के रास्ते के रूप में देखते हैं वो कभी बिजनौर के मैदान और गढ़वाल की पहाड़ियों के बीच एक महत्वपूर्ण रणनीतिक पड़ाव हुआ करता था। लालढांग का इतिहास केवल सड़क जंगल सुलताना डाकू के आवागमन का क्षेत्र और आज की प्रशासनिक सीमाओं का इतिहास नहीं है इसके पीछे प्राचीन पुरातात्विक अवशेष रोहिल्ला सत्ता नजीबुद्दौला मराठों के साथ संघर्ष अवध का प्रभाव ब्रिटिश शासन और पुराने पहाड़ी मार्गों की एक लंबी कहानी छिपी हुई है। लालढांग के आसपास का इतिहास मध्यकाल से भी कहीं पुराना दिखाई देता है इसके निकट स्थित पांडुवाला एक महत्वपूर्ण पुरातात्विक स्थल माना जाता है जहां प्राचीन मंदिरों के अवशेष और मिट्टी के बर्तनों से संबंधित पुरावशेष मिलने का उल्लेख मिलता है स्थानीय परंपराओं में लालढांग के शिव मंदिर और पांडुवाला से जुड़े शिवलिंग का भी उल्लेख मिलता है। इससे संकेत मिलता है कि यह भूभाग केवल बाद के राजनीतिक संघर्षों के कारण महत्वपूर्ण नहीं हुआ होगा बल्कि...

बिजनौर में ऐसे होता हे श्राद्ध में पित्रों का स्वागत

 इन दिनों किस- किस के यहाँ इस लोक परम्परा का पालन किया जाता है  ? ☺️ बिना किसी शास्त्रीय नियम या अनुष्ठान के लोक अपने पर्व और परम्पराएँ स्वयं गढ़ता है ।अपनी अनूठी परम्पराएँ । बिजनौर के आस-पास गाँवों में आज भी जिस दिन श्राद्ध की तिथि होती है उससे पहली साँझ को घर की सबसे बड़ी-बूढ़ी स्त्री घर की दहलीज़ गाय गोबर से लीपती हैं । उस पर तुरई , टगर या कनेर के फूल और चावल छिड़कती हैं । एक सरसों के तेल का दीप और जल से भरा लौटा देहरी पर रख दिया जाता है ।  दिन छिपने पर घर के सबसे बड़े सदस्य और सबसे छोटे सदस्य उस लिपी हुई देहरी को छलाँग मारकर लाँघते हैं। क्योंकि लिपी हुई देहरी पर पैर नहीं रखे जाते हैं ।एक बार, तीन बार या पाँच बार यह क्रिया दोहराई जाती है ।  छोटे बच्चों के लिए यह उत्सवी क्रिया होती है । वे बार-बार देहरी पर कूदते हैं ।खिलखिलाते हैं ।और इस अनुष्ठान को खेल की तरह दोहराते हैं। लोक की यही सबसे सुंदर सहजता है। जहाँ बड़े जीवन और मृत्यु के रहस्य के सामने गंभीर होते हैं, वहीं बच्चे उस भय की सीमा से परे होते हैं। उनके लिए पितर कोई डरावनी अनुपस्थिति नहीं, बल्कि अपने ही घर-आँग...

जितेन्द्र मोहन सिन्हा रहबर

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    उर्दू ज़बान-ओ-अदब के मारूफ़ शायर *"जितेन्द्र मोहन सिन्हा रहबर"* बिजनौरी               *जितेन्द्र मोहन सिन्हा * और तख़ल्लुस *रहबर* । 24 सितम्बर 1911 को उत्तर प्रदेश के बिजनौर में जिया लाल जी के यहां पैदा हुए। बचपन एक पढ़े-लिखे और तरक़्क़ी पसंद मुतवस्सित तबक़े के घराने में गुज़रा। वो अपने चार भाइयों और एक बहन में सबसे बड़े थे। वो शुरू ही से एक ज़हीन तालिब-ए-इल्म थे और मुताले की तरफ़ माइल थे। बिजनौर से हाई स्कूल और डी.ए.वी. कॉलेज, देहरादून से इंटरमीडिएट का इम्तिहान पास किया। इलाहाबाद यूनिवर्सिटी से बी.ए. किया और बाद में एल.एल.बी. किया। इलाहाबाद में रहते हुए वो पंडित जवाहरलाल नेहरू और वहाँ के दानिश्वरों के साथ आज़ादी की जद्दोजहद में मसरूफ़ दीगर रहनुमाओं के नज़रिये से बहुत मुतास्सिर थे। उन्होंने खुद को गाँधी जी के फ़लसफ़े के मुताबिक ढालने की कोशिश की। एम.ए. की तालीम अधूरी छोड़ कर वो बिजनौर वापस आए और सिविल नाफ़रमानी तहरीक के पहले बैच की क़यादत करते हुए 1930 में जेल चले गए। शादी चंद साल बाद हुई। जद्दोजहद-ए-आज़ादी में जेल काटने के बाद चूँकि...

प्रोफेसर बलवंत सिंह राजपूत

स्वामी भगवतानंद्व सरस्वती

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मरगूब रहमानी

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आदित्य नारायण मिश्रा लोकतंत्र रक्षक और कवि

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