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देश का एक गुमनाम सिपाही, मनोज रंजन दीक्षित

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  मनोज रंजन दीक्षित की कहानी किसी फिल्मी जासूसी थ्रिलर से कम नहीं है। उत्तर प्रदेश के बिजनौर जिले के नजीबाबाद के रहने वाले मनोज रंजन दीक्षित का जीवन देशभक्ति, साहस, संघर्ष और फिर सिस्टम की बेरुखी की एक लंबी दास्तान है। यहाँ मनोज रंजन दीक्षित के जीवन और उनकी जासूसी यात्रा पर आधारित एक विस्तृत विवरण है: 1. साधारण शुरुआत और असाधारण लक्ष्य मनोज रंजन दीक्षित नजीबाबाद के एक मध्यमवर्गीय परिवार से ताल्लुक रखते थे। 1980 के दशक में, जब भारत और पाकिस्तान के बीच संबंध तनावपूर्ण थे, मनोज के मन में देश के लिए कुछ कर गुजरने का जज्बा था। उनकी इसी हिम्मत ने उन्हें भारतीय खुफिया एजेंसियों की नजरों में ला खड़ा किया। उन्हें प्रशिक्षित किया गया और एक कठिन मिशन के लिए तैयार किया गया: सीमा पार जाकर दुश्मन की सूचनाएं जुटाना। 2. पाकिस्तान में 'छद्म' पहचान 1985 के आसपास, मनोज रंजन दीक्षित को जासूसी के मिशन पर पाकिस्तान भेजा गया। वहाँ उन्होंने अपनी पहचान पूरी तरह बदल ली। एक जासूस का जीवन हर पल मौत के साये में होता है; उन्हें न केवल वहां की भाषा और लहजे को अपनाना था, बल्कि वहां के स्थानीय रीति-रिवाजों मे...

मधुसूदन आनंद

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 मधुसूदन आनंद (1952–2026): साहित्य और पत्रकारिता का संतुलित स्वर हिंदी पत्रकारिता के परिदृश्य में मधुसूदन आनंद का नाम एक ऐसे संपादक और रचनाकार के रूप में लिया जाता है, जिन्होंने विचार की गंभीरता और भाषा की सादगी को साथ-साथ साधा। लगभग चार दशकों तक सक्रिय रहे आनंद ने समाचार कक्ष की आपाधापी के बीच भी साहित्यिक संवेदना को जीवित रखा। उनका जीवन इस बात का उदाहरण है कि पत्रकारिता केवल सूचना का कारोबार नहीं, बल्कि समाज के विवेक को जाग्रत रखने का माध्यम भी है। मधुसूदन आनंद का जन्म 20 दिसंबर  1952 को उत्तर प्रदेश के नजीबाबाद शहर में   हुआ। छात्र जीवन से ही उन्हें पढ़ने-लिखने में गहरी रुचि थी। विश्वविद्यालय के दिनों में वे साहित्यिक गोष्ठियों और वाद-विवाद प्रतियोगिताओं में सक्रिय रहे। सत्तर के दशक की उथल-पुथल भरी राजनीतिक पृष्ठभूमि ने उनके वैचारिक गठन में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। यही कारण था कि वे विचार से प्रगतिशील माने जाते थे, किंतु लेखन में राष्ट्रहित और सामाजिक संतुलन को सर्वोपरि रखते थे। पत्रकारिता में उनका प्रवेश सत्तर के दशक के प्रारंभ में हुआ। 1974 के आसपास वे नवभारत टा...

डा. अजय जनमेजय

 डा. अजय जनमेजय का जन्म 28 नवम्बर 1955 को हस्तिनापुर, मेरठ, उत्तर प्रदेश में हुआ। वे प्रसिद्ध  बाल साहित्यकार, ग़ज़लकार, व्यंग्यकार, कहानीकार निश्तर खानकाही के शिष्य और पेशे से बिजनौर में बालरोग विशेषज्ञ हैं।  डा. अजय जनमेजय की साहित्य यात्रा ग़ज़लों से शुरू होकर दोहों से होती हुई शनै:-शनै: बाल साहित्य की ओर अग्रसर हुई है। इसका श्रेय उनकी बालसुलभ प्रवृत्ति, उनकी बाल मनोविज्ञान एवं बाल समस्याओं पर गहरी समझ ही है, आज उन्होंने बाल साहित्य की हर विधा- कहानी, दोहे, गीत, शिशुगीत, नाटक, बाल-ग़ज़ल, लोरियाँ, प्रभाती गीत, के साथ- साथ मुक्तक, कुण्डली से लेकर नवगीत, यात्रा संस्मरण आदि सभी में अपना सार्थक योगदान दिया है।  यूं तो डा.जनमेजय सामाजिक सरोकारों कन्या भ्रूण हत्या, पर्यावरण, बेटियाँ, नदियाँ आदि पर लगातार लिखते रहे हैं, किन्तु हिन्दी साहित्य में बेटियों पर लिखा एवं प्रकाशित मुक्तक संग्रह ‘बेटियाँ नदी-पीड़ा पर केन्द्रित नदी-गीत ‘नदी के जलते हुए सवाल एक अलग ही पहचान रखते हैं। इनकी पुस्तकों का अंग्रेजी, सिंधी, उड़िया, उर्दू , मराठी, पंजाबी एँव तमिल में भी अनुवाद हो चुका है तथा अनेक ...

डॉ. विनोद ‘प्रसून’

 डॉ. विनोद ‘प्रसून’ का जन्म 19 दिसम्बर 1969 में उत्तर प्रदेश के बिजनौर में हुआ। वे शिक्षक, संसाधक और साहित्यकार हैं। वे हिंदी शिक्षण में अपने नवाचारों व सहज, सरल युक्तियों के सफल प्रयोगों के कारण जाने जाते हैं। व्याकरण पर आधारित आपके अवधारणा गीत अपने सरल शब्दों व मधुर लय के कारण बहुत प्रसिद्ध हैं।  आप पिछले 3 दशकों से अध्यापन व लेखन से जुड़े हैं और हिंदी संसाधक/विषय विशेषज्ञ के रूप में सीआईईटी/ एनसीईआरटी, सीबीएसई-सीओई आदि से जुड़े हुए हैं। आप एनसीईआरटी की कक्षा-एक व दो की हिंदी पाठ्यपुस्तक सारंगी एवं शिक्षक संदर्शिका की निर्माण समिति के सदस्य भी हैं। आप सीआईईटी-एनसीईआरटी के पीएम ई-विद्या चैनल से भी जुड़े हैं और एनसीईआरटी पाठ्य पुस्तकों के पाठों पर आधारित आपका लाइव प्रसारण समय-समय पर होता है। आप वर्तमान में दिल्ली पब्लिक स्कूल, ग्रेटर नोएडा में हिंदी विभागाध्यक्ष के पद पर कार्यरत हैं। आपका अपन सूत्र (अपनत्व+प्रेरणा+नवीन प्रयोग) और ‘पढ़ो और पढ़ाओ’ के दर्शन को देश-विदेश के हज़ारों शिक्षकों ने सहर्ष अपनाया है। आप न्यू सरस्वती हाउस प्रकाशन, नई दिल्ली द्वारा प्रकाशित कक्षा-एक से आठव...

जन-जन के लाडले और स्वतंत्रता सेनानी अतीकुर्रहमान की याद में।

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 शहादत, सियासत और वो अनसुलझा सवाल *परवेज आदिल माही* 17 फरवरी  पुण्यतिथि पर विशेष।  जन-जन के लाडले और स्वतंत्रता सेनानी अतीकुर्रहमान की याद में। ​"मौत उसकी है करे जिसका जमाना अफसोस - वरना दुनिया में सभी आये हैं मरने के लिये। ​आज से ठीक 55 वर्ष पूर्व, 17 फरवरी 1971 की वो सुबह भारतीय राजनीति के आकाश पर एक काला साया लेकर आई थी। रेडियो पर प्रसारित एक खबर ने पूरे देश को स्तब्ध कर दिया— “अतीकुर्रहमान अब इस दुनिया में नहीं रहे।” बिजनौर की मिट्टी का वो लाल, जो स्वतंत्रता आंदोलन की भट्टी में तपकर कुंदन बना था, जिसका भविष्य उत्तर प्रदेश की राजनीति में सूर्य की तरह चमक रहा था, उसकी जीवन लीला मात्र 44 वर्ष की आयु में समाप्त हो गई। ​अतीकुर्रहमान की लोकप्रियता का आलम यह था कि उनकी मृत्यु की खबर मिलते ही धर्म और जाति की दीवारें ढह गईं। उस दिन पूर्व प्रधानमंत्री चौधरी चरण सिंह बिजनौर में एक चुनावी सभा को संबोधित करने पहुंचे थे। जैसे ही उन्हें अपने पुराने साथी और दोस्त के पुत्र की मृत्यु की सूचना मिली, वे स्तब्ध रह गए। 'शोक की मूर्ति' बने चौधरी साहब ने जनसभा रद्द कर दी और सीधे अस्पताल पहुं...

असद रजा़

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  श्रद्धांजलि  आह । असद रजा़  बिजनौर की एक शख्सियत का यूं चले जाने। पत्रकारिता और साहित्य का चमकता सितारा टूट गया। डॉक्टर शेख़ नगीनवी 1 फरवरी 2026 रविवार की सुबह, गुन गुनी धूप के साथ, एक बुरी खबर लेकर आई कि प्रसिद्ध पत्रकार, साहित्य अकादमी सहित दर्जनों पुरस्कारों और सम्मानों से नवाजे गए , व्यंग्य और हास्य लेखक, निबंधकार, अनुवादक, संकलनकर्ता , नामी शायर, विश्लेषक،  समीक्षक उर्दू साहित्य का चमकता और दमकता सितारा सैयद असद रज़ा नक़वी,  दिल का दौरा पड़ने से नई दिल्ली के फोर्टिस अस्पताल में इस फ़ानी दुनिया को हमेशा के लिए छोड़ कर चले गये। दो दिन पहले तबियत में अचानक नासाज़ी के कारण उन्हें फोर्टिस अस्पताल, नई दिल्ली में दाखिल कराया गया, जहां उन्होंने आखिरी सांस ली।उनकी तदफ़ीन पैतृक वतन पेदी सादात,बिजनौर में अमल में आई।   सैयद असद रज़ा नक़वी, तख़ल्लुस "असद रज़ा" , 2 जनवरी 1952 को  पेदी सादात, जिला बिजनौर में पैदा हुए थे। असद रज़ा के दादा सैयद मज़हर अली नक़वी असगराबाद राज्य के जनरल मैनेजर थे। उनके पिता सैयद ज़फ़र अली नक़वी डिप्टी इन्स्पेक्टर ऑफ स्कूल्स थे। ...