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मेमन सादात
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बिजनौर की शान मेमन सादात आज का मेमन कब बसा और उसका नाम मेमन सादात क्यों पड़ा? इसके लिए हमें इतिहास के उन पन्नों को पलटने की जरूरत है, जो आज की युवा पीढ़ी से कोसों दूर है। आज के मेमन सादात की नींव रखी थी, मुरिसे आला जनाब सैयद शाह अशरफ अली बिन सैयद आरिफ शाह बरखुरदार ने। उन्होंने इस गांव की संगे बुनियाद रखी थी। आपका मजार आज भी मेमन सादात में स्थित जामा मस्जिद के पास तालाब के किनारे मौजूद है। इस जामा मस्जिद की तामीर भी सैयद शाह अशरफ अली ने ही की थी। जो आज भी तालाब के किनारे मेमन सादात की शान बनकर खड़ी है। अपने पाठकों को आज हम मेमन सादात के आबाद करने वाले सैयद शाह अशरफ अली के सफर की तमाम बातें साझा करेंगे ताकि इतिहास की यह पन्नें हमारी युवा पीढ़ी के लिए भी ज्ञान का सागर बन सके। सैयद शाह अशरफ अली के वालिद सैयद आरिफ शाह बरखुद्दार दिल्ली के बादशाह मोहम्मद तुगलक के क्षेत्र की रियासत धर्सो नवाजपुर निकट पटियाला, पूर्वी पंजाब के मालिक थें। सैयद आरिफ शाह बहुत ही बड़े दरवेश, कामिल, मुत्तक़ी, परहेज़गार और मकबूल खास व आम थें। क्योंकि धर्सो नवाजपुर और समा...
बिजनौर में है वेश्या का बनवाया मंदिर
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बिजनौर में है वेश्या का बनवाया मदिंर आज की पीढ़ी को पता नही कभीबिजनौर जैसे छोटे शहर में कभी वेश्याओं का पूरा मुहल्ला था। इस मुहल्ले में एक वेश्या बनवाया मंदिर आज भी है। शहर में पुरानी तहसील से आगे रामू हलवाई का चौराहा है। कभी यहां रम्मू हलवाई की दुकान थी । उसीके नाम पर चौराहे का नाम पड़ गया। रम्मू के चौराहे से पूरब की साइड में कभी सड़क के दोनों ओर वेश्याओं की बस्ती थी । इस चौराहे से अगले चौक तक उनके ही घर थे । अधिकतर छोटी-छोटी कोठरियां थीं। संपन्न वेश्यों के मकान कुछ बड़े थे। मुस्लिम काल तक ये मकान में रहकर गाना −बजाना कर ये लोगो का मनोरंजन करती थीं। कुछ पेशा कर अपना जीवन यापन करते हैं। यह यहां कब आकर बसी यह कोई नही जानता। प्राचीन ग्रंथों में 'गणिका' और 'नगरवधू' (जैसे वैशाली की आम्रपाली) का उल्लेख मिलता है। मुगल काल के दौरान यह 'तवायफ' संस्कृति और कोठों के रूप में अधिक संस्थागत हो गई। हालांकि शुरुआत में ये कला, संगीत और नृत्य के केंद्र थे, लेकिन धीरे-धीरे ये शारीरिक शोषण और ...