Monday, April 11, 2016

बिजनौर के प्रथम मुस्लिम स्वतंत्राता सेनानी इरफान अलवी

बिजनौर के प्रथम मुस्लिम स्वतंत्राता सेनानी इरफान अलवी
 मलिक इरफान अलवी के स्वतंत्राता संग्राम में कूदने की कहानी भी काफी विचित्र है। क्योंकि वह तो अपनी शिक्षा पूर्ण करते ही अंग्रेज़ सरकार द्वारा जयपुर में तहसीलदार मनोनीत कर दिये गए थे। स्वतंत्रता संघर्ष में सम्मिलित होने की गाथा से पूर्व उनका पारिवारिक परिद्वश्य समझना होगा।
सर सैय्यद खॉं 1857 के प्रथम स्वतंत्राता संग्राम के समय बिजनौर में मुंसिफ थे ।लेकिन उनकी अंग्रेज़ दोस्ती के कारण बिजनौर ज़िले के अधिकतर मुसलमान उनको पसन्द नहीं करते थे। उस  समय ज़िला बिजनौर में नवाब महमूद खां का डंका बज रहा था । वेअंग्रेज़ों के शब्द में 'बाग़ी और यथार्थ में देश प्रेमी थे।
 1857 मेंअंग्रेज कलेक्टर ने   नवाब महमूद को जिले की सतता सौँप ही। इसके बाद उस सयम बिजनौर में तैनात  सदर अमीन सर सैय्यद अपनी जान बचा कर चान्दपुर पहुंचे। चान्दपुर के रईस सैय्यद सादिक़ अली के घर पनाह ली । स्थानीय दबाव और स्वतंत्रता प्रेमियों के घेराव करने पर सादिक़ अली ने उनको 'बकैना गांव पहुंचा दिया। उस समय बकैना गांव  चान्दपुर के दूसरे ज़मीनदार मौलवी कलीमुल्लाह अलवी की ज़मीनदारी में था। निकट के दूसरे गांव मलेशया इत्याद‌ि तेजबहादुर सप्रू की ज़मीनदारी में थे।
सर सैय्यद बकैना गांव में लगभग दस पन्द्रह दिन रहे। कहा जाता है कि चान्दपुर के स्वतंत्राता प्रेमी मुसलमानों ने मौलवी कलीमुल्लाह अलवी के घर का घेराव कर लिया। मौलवी साहब ने समझा बुझाकर घेराव समाप्त कर दिया । कहा कि मैं ने सैय्यद अहमद को नसीहत कर दी है अब वह अंग्रेज़ों की नौकरी छोड़ दें। इसी कारण सर सैय्यद ने अपनी पुस्तक ''सर कशी-ए-ज़िला बिजनौर में चान्दपुर के मुसलमानों को ''बदमाशानान-ए-चान्दपुर लिखा है।
वर्षों  बाद जब मौलवी कलीमुल्लाह अलवी के पोत्र मलिक इरफान अलवी जयपुर में तहसीलदार नियुक्त हुए तो चान्दपुर  में उनकी बहुत आलोचना हुई और चाहर बैतवाले गाने लगे।
सैय्यद की तो जान बचाई, महमूद के मारी जूती चार।
सब को नसीहत खुद को फज़ीहत बेटा अपना तहसीलदार।
सारे फिरंगी मुल्क के दुश्मन, सारे फिरंगी है अय्यार।
सैय्यद को भी समझाया था ,मत हो उसका ताबेदार।
तहख़ाने में पड़े पड़े खा गई ज़ंग तलवार।।
सब को नसीहत खुद को फज़ीहत, बेटा तहसीलदार।।
के पिता नियाजु़ददीन ने बेटं इरफान को तुरन्त सन्देश भेजा । नौकरी से त्याग पत्र देकर वापस आ जाओ।
इरफान साहब ने पिता के आदेश मिलते ही तहसीलदार के पद से त्याग पत्रा दे दिया और जयपुर से वापस आते हुए दिल्ली में डा एमए अन्सारी के निवास पर जवाहर लाल नेहरू से मुलाक़ात की । उनको चान्दपुर आने का निमंत्रण भी दे डाला।
1935-36 के वर्ष में जवाहर लाल नेहरू ख़ान अब्दुल ग़फफार खां के साथ चान्दपुर पधारे। यह ज़िले में उनका प्रथम कार्यक्रम था।नेहरू जी के बिजनौर में पधारने से कांग्रेस पार्टी और स्वतंत्रता आन्दोलन को बेहद बल मिला। उस समय तक ज़िले के बड़े नेता  हाफिज़ इब्राहिम भी कांग्रेस में शामिल नहीं हुए थे बल्कि वह मुस्लिम लीग के टिकट पर विधायक निर्वाचित हुए थे ।उसके बाद त्याग पत्र दे कर कांग्रेस में सम्मिलित हुए।
इरफान साहब के आते ही बिजनौर में स्वतंत्रता आन्दोलन की रूप रेखा बदल गई। विशेषत: युवकों में जोश भर गया। इरफान साहब के आहवान पर जिन युवकों ने आन्दोलन में भाग लेना आरंभ किया ।उनमें जगदीश मित्तल, महेशचन्द गुप्ता, आरपी मित्तल प्रमुख थे। उस समय की यह एक चार बैत काफी समय तक गायी जाती रही।
कोयल कूके, बुल बुल गाये, तोता मारे तान,
भैंस हंसे, घोड़ा मुस्काये हाथी दिखाये आन,
जीव जन्तु खुश हैं और बस्ती के सब इन्सान,
आज तो खादी वालों की भी नियारी लगती शान,
चूंकि उनके साथ चले है आज मलिक इरफान।।
उस समय बिजनौर का कलक्टर नैदर सोल था ।इसने डिवाईड एण्ड रूल की पालिसी अपना रखी थी। उसने यह आदेश दे रखा था कि किसी मुसलमान को गिरफ्तार न किया जाये।  इरफान साहब ने एक बार जब भारत छोड़ो आन्दोलन में मण्डी कोटला में भाषण दिया । तमाम विदेशी वस्तुओं को त्यागने का आहवान किया तो स्थानीय महिलाओं ने भी रेशमी कपड़े जला दिये। जोश से भरी हुई जनता निकट के सरकारी  हास्पिटल पहुंची । वहां मौजूद एक अंग्रेज़ जो शायद डाक्टर था पर हमला कर दिश। वह अंग्रेज़ जान बचाकर पैदल बिजनौर भागा और रात के नैदरसोल को इस वारदात से आगाह किया। नैदर सोल ने आदेश दिये कि इतने सरकश और शोला बयान बागी का आजा़द रहना ब्रिटिश सरकार के लिए खतरा है ।अत: इरफान साहब को भारतीय सुरक्षा कानून के तहत गिरफतार कर लिया गया। ज़िला बिजनौर में किसी मुस्लिम स्वतंत्रता सेनानी के पहली गिरफतारी थी।
1942-1946 तक का समय इरफान साहब ने विभिन्न जेलों में गुजा़रा। बिजनौर जेल से उनको इस कारण बरेली जेल भेज दिया गया कि उन्होंने जेल के गन्दे कपड़े पहनने से इनकार कर दिया था। इरफान साहब की ज़िद थी कि मुझे साफ कपड़े दिये जांये ताकि मैं नमाज़ पढ़ सकूं।
उनकी ज़िद के कारण उनको गेहूं पीसने की मुशक़्कत भी दी गयी । आम तौर से एक दिन में एक मन (36 किलो) आटा पीसना पड़ता था । मामूली -मामूली बातों पर पिसाई का  वज़न बढ़ा दिया जाता  था। एक बार मिट्टी मिला खाना खाने से इनकार करने पर आटा पीसने की सज़ा बढ़ा दी गई। लेकिन जेल में मौजूद एक अपराधी खज़ान सिंह जब इस स्वतंत्रता सेनिानियों के साथ रहने लगा तो जेल केअधिकारी इरफान साहब को स्थानान्तरण बरेली और बरेली से नैनी जेल करने पर मजबूर हो गये।
ब्रिटिश कै़द में निरीक्षण के समय यह आदेश दिया जाता था कि कोई शिकायत न की जाये। लेकिन इरफान साहब के सामने जब भी अंग्रेज़ अधिकारी जेल आते तो यह केवल दो शब्द ही दोहराते ष्फनपज प्दकपं फनपज प्दकपंष् एक बार जेल अधीक्षक ने प्रबंध किया कि यदि निरीक्षण के समय इरफान साहब फनपज प्दकपं का नारा लगायें तो कुछ पुराने कै़दी उनपर हल्ला बोद दें। लेकिन कै़दियों ने एक स्वर में इनकार कर  दिया। और गवर्नर के प्रतिनिध‌ि के निरीक्षण के दौरान इरफान साहब ने फिर फनपज प्दकपं का  नारा लगाया तो उनको चालीस बैंतो की सज़ा दी गयी।
इसी दौरान इरफान साहब के ताऊ ती मौलवी समीउल्लाह का देहान्त हो गया । परिवार के आग्रह के बावजूद अधिकारियों ने उनको सूचना नहीं दी।इरफान साहब की जेल यात्रा से जुड़े हुए दो बहुत रोचक प्रसंग है। जब पहली बारी उनकी गिरफतारी हुई तो उन के घर के सामने रहने वाले एक बुज़ुर्ग ''जहान खां पछाड़े खा -खा के रोने लगे और चीख़ते थे ''कि इस घर में कभी पुलिस न आयी थी, इस घर में कभी ऐसी नहीं हुआ था।लोगों के लाख समझाया कि यह देश के लिये जेल जा रहे हैं कोई अपराध में नही। लेकिन उस सीधे साधे जहान खा की समझ में न आया कि देश के लिए कोई जेल कैसे जाता है? तीसरे दिन वह जहान खां इस जहान से गुज़र गया ।
दूसरी घटना आजा़दी के बाद की है। इरफान साहब अपनी बीमार बहन को रात में तांगे में लेकर नीन्दडू से चान्दपुर आ रहे थे कि किसी वीराम मुकाम पर डाकुओं ने घेर लिया। इरफान साहब ने डाकुओं से उनके सरग़ना का नाम पुछा। फिर डाकुओं से कहा कि तुम मुझे अपने सरग़ना के पास ले चलो। डाकुओं को बड़ी हैरत हुई कि यह आदमी खुद ख़तरे के गढ़ में जाना चाहता है। बहर हाल वह तांगे समेत जंगल में ले गये। उनके सरग़ना ने जो इरफान साहब को देखा तो सर पीट लिया और बढ़ कर इरफान साहब के पांव छुए। यह डाकु खज़ान सिंह था जो बिजनौर जेल में इरफान साहब की सेवा करता था।
1942 में पहली बार भारत छोड़ो आन्दोलन में गिरफतार होकर कुछ माह बाद इरफान साहब को रिहा कर दिया गया। दूसरी बार उनको रेल की पटरी उखाड़ने के इल्ज़ाम में महावीर त्यागी एवं रियाजु़ददीन के साथ गिरफ्तार किया गया। इस समय जेल यात्रा की अवध‌ि 1946 तक रही । वह बरेली जेल एवं नैनी जेलों में रहे। जहां उन्हें हसरत मोहानी जैसे नेताओं के सम्पर्क में आने का मौका़ मिला। उनको आचार्य विनोबा भावे के सम्पर्क में आने के सौभागय प्राप्त हुआ। विनोबा जी ने इरफान साहब से कुरान को समझना प्रारंभ किया और इरफान साहब को गीता पढ़ाना प्रारंभ किया। इसका परिणाम यह हुआ कि स्वतंत्राता के बाद इरफान साहब ने ''गीता का पैगा़म" के नाम से लेख लिखे जो ''अलजमियत" दिल्ली के शुक्रवार संस्करण में प्रकाशित हुए। विनाबा भावे की पुस्तक ''गीता प्रवचन" का उर्दु अनुवाद इरफान साहब ने अपने मित्र एवं विजनौर के वकील श् ज़िकरिया फय्याजी़ से करवा के प्राकशित किया।
इरफान साहब भारतीय मुसलमानों को उस विचार धारा से संबंध रखते थे जो राष्ट्रवादी थh एवं विभाजन के विरोध में थh। मौलाना हुसैन अहमद मदनी और मौलाना आजा़द उसका नेतृत्व करते थे। उन्हीं के प्रभाव में इरफान साहब ने यह भी प्र‌त‌िज्ञा की थी कि जब तक देश स्वतंत्र न होगा वह विवाह न करेंगे। उन्होंने इस प्रतिज्ञा पर अमल भी किया। उन्होंने आजा़दी प्राप्त होने के बाद ही शादी की थी।
आज़ादी के साथ इरफान साहब को विभाजन से बहुत दुख हुआ और भाषा और धार्मिक दंगों ने भी राजनीति से उनका दिल खट्टा हो गया ।उन्होंने सक्रिय राजनीत‌ि त्याग कर ''भूदान आन्दोलन" तक अपने को सीमित कर लिया। चान्दपुर और निकटवर्ती गांवों में कोई इलाका़ ऐसा नहीं था, जिसमें भूमिहीन व्यक्त‌ियों को थोड़ी बहुत ज़मीन न मिली हो।
1969 के बाद जब कांग्रेस का विभाजन हुआ तो उप्र के मुख्य मंत्री चन्द्र भानू गुप्ता विशेष रुप से चान्दपुर आये । अपनी सरकार के बिजनौर के  रहने वाले  मंत्री गिरधारी लाल के साथ इरफान साहब के निवास पर जा कर सिंडिकेट में शामिल होने की दरखा़स्त की ।इसको इरफान साहब ने गुप्ता जी से पुरानी दोस्ती के बावजूद इंकार कर दिया। कुछ समय बाद प्रधान मंत्राी इन्दिरा गांधी चान्दपुर आईं तो विशेष रूप से इरफान साहब को मुलाका़त के लिए बुलाया और सक्रिय राजनीति में आने की अपील की। उन्होंने सक्रिय राजनीति में आना स्वीकार नहीं किया।
इरफान साहब के बड़े पुत्र राशिद अलवी आजकल सक्रिय राजनीति में हैं ।जब वह प्रथम बार सांसद निर्वाचित हुए तो संसद भवन में तत्कालीन शिक्षा मंत्राी मुरली मनोहर जोशी ने कहा '' अरे अपने इरफान भाई का बेटा भी सांसद हो गया। इरफान भाई तो सदा बचते रहे मगर संसद सदस्यता तो घर में आनी ही थी। मुझे देश प्रेम का पहला पाठ तो इरफान साहब ने ही पढ़ाया था जब मैं चान्दपुर में विद्यार्थी था।"
4 जनवरी 1972 को इस महान स्वतंत्राता सेनानी का स्वर्गवास हो गया।
अशोक मधुप