Wednesday, November 15, 2017

हास्य व्यंग के इंटरनेशनल शायर हिलाल स्योहारवी


जिनकी आज पंचवीं पुण्य तिथि है

हास्य व्यंग के इंटरनेशनल शायर हिलाल स्योहारवी

अपनी शायरी से कहकहे लगवाते हुए नेताओं और व्यवस्था पर चोट करने वाले हिलाल स्योहारवी की आज पुण्यतिथि है। उनहोंने हिंदुस्तान ही नहीं पूरी दुनिया में अपनी शायरी की छाप छोड़ी।

न तुम संभले तो फिर नया तूफान आयेगा। मदद को राम आएंगे न फिर रहमान आएगा। जैसे शेर ने माध्यम से समाज को आगाह करने वाले अंतर्राष्ट्रीय ख्याति प्राप्त शायर हिलाल स्योहारवी का वास्तविक नाम हबीबुर्रहमान था। शायरी में आने के बाद उन्होंने अपना उपनाम हिलाल जिसका अर्थ होता है चांद रख लिया। १५ नवंबर २०१२ को उनकी मृत्यु हुई थी। अपनी धमाकेदार नज्मों और कतात के लिए लोग उन्हें आज भी उन्हें याद करते हैं। पूर्व प्रधानमंत्री राजीव गांधी की मौत पर इनके इस कता ने बहुत ख्याति पाई -

बजा कहा जो शहीदाने वतन कहा तुझको,

ये हैसीयत तुझे दुनिया में नाम करके मिली।

अब इससे बढ़के तेरा एहतराम क्या होगा,

मिली जो मौत भी तुझको सलाम करके मिली।

हिलाल स्योहरवी को गालिब इंस्टीट्यूट नई दिल्ली में उपराष्ट्रपति डा. शंकरदयाल शर्मा द्वारा उर्दू अदब की सेवा के लिए वर्ष १९८७-८८ का तंजोमिजहा एवार्ड देकर सम्मानित किया गया। हिलाल ने अपनी शायरी से जहां महफिलों में कहकहे लगवाये वहीं नेताओं, व्यवस्था, राजनीति, सांप्रदायिकता, पूंजीवाद पर चोट करने से कभी नहीं चूके।

उनका कता यह कता ऐ बानगी है

- गरीबी को मिटा देने की बातें सिर्फ बातें हैं,

जो खुद दौलत के भूखें हो गरीबी क्या मिटाएंगे,

गरीबों का लहू तो आपकी कारों का डीजल है

गरीबी मिट गई तो आप क्या रिक्क्षा चलाऐंगे।

उनकी शायरी की बात ही कुछ ऐसी थी कि चीन से जंग के समय खून की मांग हो या संसद में जूते चलने की घटना, प्रधानमंत्री राजीव गांधी का २१वीं सदी में जाने का सपना हो या बेनजीर भुट्टो का पाकिस्तान का प्रधानमंत्री बनने का अवसर, राजीव गांधी की मौत हो राकेश शर्मा का अंतरिक्ष में जाना हर घटना पर मीडिया की सुर्खी हिलाल स्योहरवी की शायरी में से ही आती रही हैै।

राजीव गांधी के प्रधान मंत्री बनने पर उन्होंने यह कता पढ़ा-

रक्स होता है तेरी किस्मत पर,

क्या तेरे हाथ को लकीर मिली।

और तो सब नियामतें मिली थी तुझे

अब पड़ौसन भी बेनजीर मिली।

राकेश शर्मा के चांद पर जाने के बाद उन्होंने कहा-

फिर कोई समझा ही नहीं इस खूबसूरत तंज को,

मुझको तो राकेश शर्मा का बयां अच्छा लगा।

उन से जब पूछा गया कैसा लगा हिंदोस्तां,

हंस के बोले दूर से हिंदोस्तां अच्छा लगा।

एक मजदूर के रूप में अपना जीवन शुरू करने वाले हिलाल स्योहरवी ने मजदूरों के दुख दर्द और तकलीफों को बड़े नजदीक से देखा। फिर उसे शायरी का रूप देकर तंजोमिजहा की चाशनी में डुबो कर दुनिया के सामने इस ढ़ंग से प्रस्तुत किया कि कड़वी बातें भी मिठास के साथ दिल की गहराईयों में उतर जाऐं। उन्होंने कहा कि सभी कहते हैं पूंजीपति हैं मगरूर, काम आते हैं एलेक्षन में यही लोग हजूर। दोस्ती आज के जरदार से रखनी है जरूर, अब रहे वो जो हैं भारत में परेशां मजदूर। चाहते उनका भला हम भी नहीं तुम भी नहीं, आओ मिल जाऐं खफा हम भी नहीं तुम भी नहीं। हिलाल स्योहारवी शायर तो थे ही वे एक विचारक और एक दार्शनिक भी थे। उन्होने अपनी शायरी से सोई हुई व्यवस्था को झकझोरा, उसकी खामियों को उजागर किया। उन्होने कहा कि तुम अपनी गरीबी को मिटाते नहीं खुद ही, क्या -क्या न मिला तुम को सहारा नहीं समझे। हर शहर में मुद्दत से है रातों को अंधेरा, तुम लोग सियासत का इशारा नहीं समझे।

हिलाल स्योहारवी की एक नजम

मेरा हिंदोस्तां

यहां मौसम सलौने और सुहाने,

हिमालय बर्फ की चादर है ताने,

नदी नाले सुनाते हैं तराने,

जमां अपनी उगलती है खजाने,

इसी धरती पे जन्नत का गुमां है।

ये भारत है मेरा हिंदोस्तां है।।

पदक सोने का कोई मुल्क पाले,

कोई फुटबॉल कितना ही उछाले,

कोई तैराक सौ तमगे लगाले,

यहां के खेल भी सबसे निराले,

एलेक्षन में जो जीते पहलवां है।

ये भारत है मेरा हिंदोस्तां है।।

यहां नाचो विदेशी साजिशों पर,

कहीं दो जाके धरना दफ्तरों पर,

करो पथराव सरकारी बसों पर,

सफर करो ट्रेनों की छतों पर,

हिफाजत के लिए अल्लाहमियां है।

ये भारत है मेरा हिंदोस्तां है।।

यहां फरसूदा रस्मों को हवा दो,

चिता की गोद में अबला बिठा दो,

कहीं आईन सड़कों पर जला दो,

किसी नेता पे कुछ तौहमत लगा दो,

कलम अपना है अपनी जुबां हैं।

ये भारत है मेरा हिंदोस्तां है।।

कोई जाकर कहीं फितना जगा दे,

मुहब्बत के जो रिश्तें हैं मिटा दे,

कोई इतिहास के पन्ने उड़ा दे,

कोई मंदिर को मस्जिद से लड़ा दे,

सियासत में मजहब दरमियां है।

ये भारत है मेरा हिंदोस्तां है।।

डोनेशन हो तो बच्चों को पढ़ा लो,

जो रिश्वत हो फांसी से छुड़ा लो,

जो पैसे हों तो परमीट घर मंगालो,

मिले दौलत वतन को बेच डालो,

मगर छोड़ो ये लम्बी दास्तां है।

ये भारत है मेरा हिंदोस्तां है।।

न इसको देख पायी कम निगाही,

उजालों के जो पीछे है सियाही,

यहां एक जुर्म भी है बेगुनाही,

मिसेज गांधी के खूं से लो गवाही,

वो ही कातिल है वो ही पासबां है।

ये भारत है मेरा हिंदोस्तां है।।डा. वीरेंद्र

Tuesday, September 12, 2017

चिंगारी सांध्य दैनिक में छपा चाहर बेत आयोजन के समाचार





अमर उजाला के 11 सितंबर के अकं में प्रकाशित मेरा लेख


अमर उजाला में 13 सितंबर 1017 में चहेरबेत कार्यक्रम पर छपा
समाचार

Monday, August 14, 2017

डा. ज्ञान चंद जैन


11 अगस्त जिनकी पुण्य तिथि है
उर्दू सहित्य के पुरोधा डा. ज्ञान चंद जैन
स्योहारा। जनपद के साहित्यकारो का विश्व में बड़ा नाम है। जनपद के सकलेन हैदर, सज्जाद हैदर, अख्तरउल इस्लाम, हिलाल स्योहारवी, डा. ज्ञानचंद जैन आदि वे साहित्यकार हैं जिन्हे पूरी दुनिया में जाना जाता है। भारतीय लेखक और उर्दू साहित्य के स्कालर तथा भारत के उर्दू एर्वाड पदमश्री से सम्मानित डा. ज्ञान चंद जैन का जन्म १९ सितंबर १९२२ में स्योहारा में हुआ था। उनकी मृत्यू ११ अगस्त २००७ में पोर्ट विलेयर कैलिफोर्निया अमरिका में हुई। अपने अंतिम समय में डा. ज्ञानचंद जैन अपनी सरजमी को बेहद याद करते थे। उनकी गजल का एक शेर इस बात की ताईद करता है। मैं बरगद हूं उखड़ कर आ गिरा मशरिक से मगरिब में, किसी मैदान का टूकड़ा ही अपना है ना वन अपना। स्योहारा के लाला बहालचंद जैन के तीन पुत्रो में छोटे पुत्र डा. ज्ञान चंद जैन को उनके गालिब साहित्य पर स्कालरशिप तथा उनकी उर्दू में लिखी गई अनेक किताबों जिनमें एक भाषा दो लिखाबट दो अदब, उर्दू की नर्सरी दास्तानें, निशानयात, कच्चे बोल, दास्तानगोई, अंजूमन तरक्की ए उर्दू, आदि के लिए उर्दू जगत में जाना जाता रहेगा। वे जम्मू, इलाहबाद, हैदराबाद तथा लखनऊ विश्व विद्यालयों में उर्दू के विभागीय अध्यक्ष रहे। इनकी पुस्तक तस्वीर ए गालिब को तत्कालीन प्रधानमंत्री इंद्रा गांधी द्वारा पुरस्कृत किया गया था। बज्मे अदब स्योहारा के सदर सुजाउद्दीन कमर बताते हैं कि मानवतावादी डा. ज्ञानचंद जैन सभी धर्मों का समान रूप से सम्मान करते थे। वे सादा जीवन उच्च विचार की टेग लाईन पर विश्वास रखते थे। वे बताते हैं कि उन्हें उर्दू एकडमी एवार्ड १९८२ से सम्मानित किया गया था। उनकी उर्दू सेवाओं के लिए पाकिस्तान में १९९६ में उन्हें डा. ऑफ लिट्रेचर की उपाधि से सम्मानित किया गया। अलीगढ़ के उर्दू स्कॉलर डा. एम असलम बताते हैं कि उनकी लिखी उनके पुस्तकें पाकिस्तान में पाठयक्रम में पढ़ाई जाती हैं। उन्होने अपनी उर्दू रिर्सच विधि पर लिखी पुस्तक तहकीक में लिखा है कि रिर्सच का हमारा मकसद नौकरी पाना नहीं ज्ञान में वृद्धि होना चाहिए। ये ऐसी पुस्तक है जिसका हिंदी अनुवाद होना चाहिए। ये पुस्तक रिर्सच करने वालों के लिए सच्ची मार्गदशक होगी। वे बताते हैं कि डा. ज्ञानचंद जैन की प्रमुख रचनाएं इब्लीस और हूर, इंतजार, चकोर, अलिफ लैला,उमर ख्यााम की रूबाईयों का अनुवाद आदि रहीं हैं।
ज्ञानचंद जैन के दो बेटे मनोज और आाशू १९८३ में ही अमेरिका चले गये थे। ज्ञानचंद जैन भी १९९३ में अमेरिका चले गये। जबसे वे अमेरिका में ही रहे। २००२ में उन्होने अपनी लाचारगी तथा वतन की याद का इजहार करते हुए अपनी एक रचना भेजी थी। वो गजल
ना हिंदूस्तान है अब अपना ना अमेरिका वतन अपना, मैं इबने राह हूं बेचारगी है पराहन अपना। मैं बरगद रहूं उखड़ के आ गिरा मशरिक से मगरिब में, किसी मैदान का टूकड़ा ही अपना है ना वन अपना। किसी दहकान लड़की की जो कैफियत हो डिस्को में, वही कुछ हाल अमेरिका में अपना होगा गालेबन अपना। मैं हिंदोस्तान का एक बेहुनर बनियाए कस्बाती, कहां तर्रार ये मगरिब कहां खस्ता बदन अपना। यहां खुशियां ही खुशियां हैं समझता था दिल ए सादा, यहां आकर तबियत रहती है उक्तादा उक्तादा।
डा. वीरेंद्र स्योहारा

Monday, August 7, 2017


amar ujala 8 aug 2017 me prakashit

नगीना का जलियांवाला बाग

नगीना का जलियांवाला बाग
नगीना का 'जलियावाला बाग' है पाईबाग
नौशाद अंसारी, नगीना, बिजनौर :

पंजाब के जलियावाला बाग में 1919 में हुए नरसंहार के जैसी घटना को ब्रिटिश हुकूमत ने बिजनौर में काफी पहले अंजाम दिया था। 1858 में नगीना में पाईबाग में अंग्रेजी हुकूमत ने अनेक लोगों पर गोलियां बरसाकर उन्हें मौत के घाट उतार दिया था। इस घटना की एकमात्र निशानी के रूप में बचे एतिहासिक कुएं का आज तक संरक्षण नहीं किया जा सका है।

इतिहास के जानकारों के अनुसार प्रथम स्वतन्त्रता संग्राम लड़ रहे शेरकोट निवासी माढ़े खां ने अपने साथियों के साथ नगीना में मोर्चा कायम करने का फैसला किया। 21 अप्रैल 1858 को जब अंग्रेजों की फौज पाईबाग के निकट पहुंची तो घात लगाकर बैठे आजादी के दीवाने इनामत रसूल व जान मुहम्मद महमूद ने फौज पर बंदूक से फायर कर दिया। इस पर सरकारी फौज ने गोलियां बरसाकर अनेक को मौत के घाट उतार दिया। इनायत रसूल अपने साथी सहित शहीद हो ए। गोलाबारी में घायल अनेक व्यक्ति पाईबाग में स्थित कुंए में जान बचाने को कूद गए, लेकिन अधिकांश की मौत हो गई।

एक अनुमान के अनुसार इस घटनाक्रम में करीब डेढ़ सौ लोगों को जान गंवानी पड़ी थी। उस दौरान जनपद में सदर अमीन रहे सर सैय्यद अहमद खां ने भी अपनी किताब सरकश-ए-बिजनौर में इस घटना का जिक्र किया है।

जलिया वाला बाग कुएं के नाम से जानते हैं लोग

नगर की पंजाबी कालोनी से सटे मोहल्ला लाल सराय में स्थित एतिहासिक जलिया वाला बाग कुएं का असली नाम पाई बाग है, लेकिन लोग जलिया वाला बाग के नाम से ही इसे जानते हैं। इस घटना की एकमात्र निशानी के रूप में बचे एतिहासिक कुएं का संरक्षण नहीं किया गया है। यह पूरी तरह उपेक्षा का शिकार है। नगीना व जनपद के प्रतिनिधियों ने इस कुएं की सुध नहीं ली। इसे लेकर नागरिकों में रोष है।

'तारीखे अदब जिला बिजनौर' और ऐतिहासिक झांकियां जिला बिजनौर ' के लेखक शकील बिजनौरी ने कहते हैं कि जलियावालां बाग हत्याकांड से डेढ़ सदी पूर्व जिले में ऐसी घटना घटित हुई थी। जलियावाला बाग में जहां स्मारक बना है और लोग शहीदों को याद करते हैं, लेकिन यहां ऐसे स्थल को भुला दिया गया है। ऐसे ही हालत रहे तो एक दिन इसका नामो-निशान भी नहीं रहेगा। ऐसी धरोहर का संरक्षण होना चाहिए, जिससे आने वाली पीढि़यां इसे याद रख सकें।
14 अगस्त 2013 के दैनिक जागरण से साभार