Sunday, May 29, 2016

बात बिजनौर की पत्रकारिता की

तीस मई हिंदी पत्रकारिता दिवस पर

जिले के पत्रकारों ने जुल्म सहे , पर नहीं टेके घुटने
बिजनौर जनपद के पत्रकारों का भी बहुत बलिदानी इतिहास रहा है।इन्हें जेल में बंद किया गया हो या गोलीमारी गई हो किंतु जुल्म के आगे इन्होंने घुटने नहीं टेके।सच्चाई के रास्ते से मुंह नहीं मोड़ा। अपनी कलम की ताकत से समझौता नही किया।
आजादी की लड़ाई में जनपद के समाचार पत्र मदीना का क्रांतिकारी इतिहास रहा है। मौलवी मजीद हसन ने 1912 में मदीना त्रिदिवसीय की स्थापना की। स्थापना के बाद से ही यह अंग्रेजों की आंख का कांटा बना। मदीना का प्रत्येक संपादक जेल गया। मदीना प्रबधन संपादक के जेल रहने के दौरान उनका पूरा वेतन तो देता ही था, इस दौरान संपादक के परिवार का पूरा खर्च उठाता था।
साप्ताहिक रहे चिंगारी में सीएमओ के खिलाफ समाचार छापने पर संपादक मुनीश्वरानंद त्यागी के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट तक मुकदमा चला। सुप्रीम कोर्ट की बैंच के माफी मांगने का सुझाव देने पर भी त्यागी जी ने माफी नही मांगी और एक साल की जेल काटना मंजूर किया।
पर्सनाल्टी अंग्रेजी साप्ताहिक के संपादक स्वामी सच्चिदानंद को समाज विरोध तत्वों के विरूद्घ लिखने, प्रशासन के भ्रष्टाचार का भंडाफोड़ करने के कारण उनके खारी स्थित आश्रम में पांच अप्रैल 1971 को गोली मारकर हत्या कर दी गई। भूखा मानव क्या करेगा नामक संपादकीय लिखने पर बिजनौर टाइम्स के संपादक बाबू सिंह चौहान को मीसा के अंतर्गत जेल जाना पड़ा।
नांगल सोती में पुलिस के विरूद्घ चल रहे आंदोलन की खबरें छापने पर वहां के पत्रकारों से पुलिस नाराज हो गई। थाने पर दो जून 1985 को हुए प्रदर्शन और लाठी चार्ज में पत्रकार उमाकांत और अमर उजाला के तत्कालीन संवाददाता मुकेश सिंहा के विरूद्घ मुकदमें दर्ज हुए। कई साल तक इन्हें कोर्ट कहचरी के चक्कर लगाने पड़े। पुलिस के खिलाफ लिखने पर नजीबाबाद के पत्रकार जितेंद्र जैन को पुलिस ने 20 दिसंबर 1989 को गिरफ्तार ही नहीं किया बल्कि थाने में बुरी तरह मारा गया। किवाड़ की चौखट में देकर हाथों की उंगलियां कुचली गईं। प्लास से उंगलियों के नाखून खींच लिए गए। जनपद के पत्रकारों के आंदोलन के आगे पुलिस को नतमस्तक होना पड़ा और उनकी बिना शर्त रिहाई हुई ।
पुलिस और लाटरी माफियाओं के गठजोड़ के खिलाफ लिखने का खामियाजा नगीना के पत्रकार प्रदीप जैन का भुगतना पड़ा। 1995 में पुलिस ने उन्हें तमंचे के साथ पकड़ा दिखाया और सरेआम पिटाई करते नगर में जुलूस निकाला। यह प्रकरण समाप्त हुआ और पत्रकार एकता के आगे पुलिस को नगीना के सीओ और थानाध्यक्ष को भी हटाना पड़ा। धामपुर के पत्रकार सुशील अग्रवाल को भी राजनैतिक और पुलिस उत्पीड़न का शिकार होना पड़ा।
जिले के इस वरिष्ठ पत्रकार अशोक मधुप के विरूद्घ दो बार एनएसए लगाने का प्रशासन ने प्रयास किया किंतु पत्रकारों एंव सामाजिक संगठनों के दबाव के कारण वह कामयाब न हो सका।स्वर्ण मंदिर आपरेशन के तुरंत बाद कोड़िया छावनी से नौ सिख सैनिक भाग गए।इनके भागने का समाचार छापने पर अमर उजाला बरेली और इस पत्रकार अशोक मधुप के विरूद्घ सेना में विद्रोह फैलाने का कोटद्वार पुलिस में मुकदमा दर्ज हुआ। बांद में जांच में समाचार सही पाए जाने पर पुलिस ने मामले को खारिज कर दिया।
समय -समय पर अनेक पत्रकार उत्पीड़न के मामले सामने आए किंतु पत्रकार एकता के आगे सभी को मुहकी खानी पड़ी।
-अशोक मधुप