मददगार भैंसा

इतिहास से ही गायब है प्रथम स्वाधीनता संग्राम का क्षेत्रीय नायक
'नींव का पत्थर भी तो न बन सका भैंसा'
विडम्बना ही कहा जाएगा कि जिले में प्रथम स्वाधीनता संग्राम की मशाल लेकर मजबूती से खड़े होने वाले ग्राम उमरी के पहलवान रहमतुल्ला उर्फ भैंसा लड़ाई लड़ते-लड़ते अंग्रेजों की गोली का शिकार होकर अपनी जान गंवा दी। भैंसे की इस शहादत का सम्मान तो क्या होता इतिहास में उसे जगह तक न मिल सकी। ऐसे में प्रथम स्वाधीनता संग्राम की 150वीं वर्षगांठ मनाने का औचित्य किस हद तक ठीक हो सकता है? प्रस्तुत है एक रिपोर्ट-
[बाएं कॉलम का पाठ]
भरतमुनि बिजनौर, 10 मई।
स्वाधीनता संग्राम की 150वीं वर्षगांठ मनाई जा रही है। ऐसे में याद आ जाती है उन रणबांकुरों की जिन्होंने अपने प्राणों की आहुति देकर प्रथम स्वाधीनता संग्राम की लड़ाई को मजबूत किया था। ऐसे ही एक योद्धा का नाम है रहमतुल्ला, जिसके बल के आगे पूरा जिला नतमस्तक था।
कहावत तो बनी पर सरकार बहरी बनी रही
रण किसी का सगा नहीं है न माने तो कर देखो, रण करी थी भैंसे के संग में कोकापुर उड़ता देखो।
यह कहावत जिले में ही नहीं बल्कि आसपास के जिलों में भी कही जाती है। विडम्बना ही कहेंगे कि भैंसे के जीवन पर आधारित यह कहावत लोक प्रसिद्ध होने के बावजूद सरकार को भैंसे के बारे में जानकारी तक नहीं हुई।
तत्कालीन जनप्रतिनिधियों ने इस बारे में कोई सुध तक न ली। जिसका दुष्परिणाम यह निकला कि एक क्रांतिकारी को देश के प्रति प्राणों की आहुति देने के बावजूद सम्मान तक न मिल सका।
[निचले बाएं कॉलम का पाठ]
रहमतुल्ला क्षेत्र में 'भैंसे' के नाम से आज भी जाने जाते हैं। जिले में प्रथम स्वाधीनता संग्राम की चिंगारी फूंकने वाले शूरवीर रहमतुल्ला अंत में अंग्रेजों की गोली का शिकार होकर अपनी जान की आहुति दे दी। विडम्बना ही कहा जाएगा कि देश को आजादी दिलाने की मशाल लेकर आगे बढ़े इस योद्धा का नाम इतिहास के पन्नों में दर्ज न करके उसे इतिहास तक में जगह न दी गई। आज रहमतुल्ला उर्फ भैंसे का परिवार किल्लत-जिल्लत की जिंदगी गुजार रहा है मगर वोट बटोरने वाले किसी भी दल या नेता को उसकी सुध लेने की फुर्सत तक नहीं है। ऐसे में प्रथम स्वाधीनता संग्राम की 150वीं वर्षगांठ मनाए जाने का औचित्य किस कदर सही ठहरता है? यह सरकार व जागरूक लोगों के लिए चिंता का विषय होना चाहिए।
जिला मुख्यालय से लगभग 58 किलोमीटर दूर नगीना मार्ग पर बसे ग्राम उमरी में हुसैन बख्श के यहां एक पुत्र ने जन्म लिया। जिसका नाम रहमतुल्ला रखा गया। बचपन से ही कद्दावर व बलिष्ठ शरीर के रहमतुल्ला की बहादुरी पूरे इलाके में जानी जाती थी। पन्द्रह साल की छोटी सी उम्र में रहमतुल्ला ने एक भैंसे को अपने हाथों पर उठाकर कंधे पर रख लिया था तभी से लोगों ने उसे 'भैंसा' कहकर पुकारना शुरू कर दिया था। क्षेत्र के बुजुर्गों की मानें तो भैंसे ने छोटी उम्र से ही क्रांतिकारियों के सम्पर्क में आकर देश की आजादी के लिए लड़ाई में भाग लेना शुरू कर दिया था। उसके सम्बंध में कहा जाता है कि रहमतुल्ला उर्फ भैंसा लगभग 170 ग्राम का व्यक्ति था और पूरा कोल्हू अपने कंधे पर रखकर वह गांव में घूम जाया करता था। पूरे इलाके में उससे हाथ मिलाने की हिम्मत किसी में न थी। वह गरीबों की मदद करता जिस कारण धनवान लोग उससे चिढ़ रखते थे। भैंसे के सम्बंध में आज भी तमाम किस्से क्षेत्र में सुने जा सकते हैं।
रहमतुल्ला के पैतृक गांव उमरी में रहने वाले उसके भतीजे शराफत हुसैन ने बताया कि उसके 'चचा' से अंग्रेजी शासन परेशान हो गया था और अंग्रेजों ने उसके चचा भैंसे को पकड़ने के लिए जिले के दो सबसे मजबूत सिपाही असदु और मस्तू को उसके पकड़ने के लिए लगाया था। बताया जाता है कि इन दोनों सिपाहियों ने खेत में काम कर रहे रहमतुल्ला को पीछे से दबोचकर उसके हाथों में हथकड़ी डाल दी थी और यह सिपाही जैसे ही भैंसे को लेकर ग्राम धमकुआला के निकट स्थित रटड़ के पेड़ के नीचे पहुंचे वैसे ही भैंसे ने दोनों सिपाहियों पर हमला कर दिया और छूटकर गांव आ पहुंचा। उसने गांव के दूकान में अपने हाथ की हथकड़ी कटवाई थी। बताया जाता है कि इसके बाद अंग्रेजी हुकूमत में ताबड़तोड़ छापेमारी करते हुए इलाके के सभी बढ़इयों को गिरफ्तार कर उन पर मुकदमा दर्ज कर दिया था तब ग्राम राहेवाला निवासी एक बढ़ई ने अंग्रेजों को एक हलफनामा दिया था जिसमें उसने कहा था कि उस दिन इसके के सगे भाई ने उससे बढ़ई की रस्म में भाग ले रहे थे। तब कहीं जाकर अंग्रेजों ने इलाके के बढ़इयों की जान बख्शी थी।
[बॉक्स: परिजन बोले]
परिजन बोले
"सरकार से पैसा नहीं चाहिए, दादा की शहादत का सम्मान उन्हें मिल जाये बस दिल में यही तमन्ना है।" — मोहम्मद अहमद (पौत्र)
'चचा की बहादुरी के किस्से पूरे इलाके में मशहूर हैं। अंग्रेजों को उन्होंने खूब छकाया था। अपनी जान तक दे डाली। हमें अफ़सोस सिर्फ इस बात का है कि हमारे चचा को आज तक स्वाधीनता संग्राम सेनानी का दर्जा तक न मिला।' — शराफत हुसैन (भैंसे का भतीजा)
[मध्य और दाएं कॉलम का पाठ]
भैंसे के सम्बंध में एक बात यह भी प्रसिद्ध है कि वह गरीबों का सबसे बड़ा हमदर्द था। कहते हैं कि एक बार क्षेत्र के एक जमींदार ने एक मजदूर से कई दिन तक काम कराने के बाद उसे भुना लगा हुआ अनाज दे दिया था। पीड़ित गरीब ने यह पीड़ा कई लोगों को सुनाई लेकिन किसी ने जमींदार से इस बारे में कुछ कहने की हिम्मत न की लेकिन भैंसे ने जब यह बात सुनी तो वह जमींदार के घर जा पहुंचा तथा उस मजदूर की पूरी मजदूरी सही रूप से दिलाकर ही उसने दम लिया। भैंसे के बारे में यह भी कहा जाता है कि वह अमीरों से धन छीनकर गरीबों में बांट देता था। मगर भैंसे के पौत्र मोहम्मद अहमद इस बात को पूरी तरह नकार देते हैं। उनका कहना है कि 'उनके दादा ने हमेशा न्याय की लड़ाई लड़ी और गरीबों, मजलूमों को इंसाफ दिलाया।' भैंसे के परिजन कहते हैं कि वह (भैंसा) आपराधिक व्यक्ति नहीं था और सम्पन्न परिवार से सम्बंध रखता था। सन् 1857 के प्रथम स्वतंत्र संग्राम की चिंगारी क्षेत्र में भैंसे ने ही जलाई थी। भैंसे के पौत्र मोहम्मद अहमद ने बताया कि उनके दादा उनको भैंसे की बहादुरी के सम्बंध में बताया करते थे। प्रथम स्वतंत्रता संग्राम के समय भैंसे की उम्र 15-16 वर्ष रही होगी। मगर छोटी सी उम्र में भैंसे ने कुरुक्षेत्र में घूम-घूमकर उस क्रांति की निशानी कमल का फूल और चपाती बांटी थी। वह अंग्रेजों के खिलाफ लड़ता रहा। हुसैन ने बताया कि बरेली रियासत के तत्कालीन नवाब जफर बहादुर खान क्षेत्र में प्रथम स्वतंत्रता संग्राम का नेतृत्व कर रहे थे और भैंसा उनके आदेश पर ही संग्राम की मशाल जगाए क्षेत्र में खड़ा था। अंग्रेजों की निगाह में कद्दावर भी भैंसा कभी गिरफ्तार नहीं हो सका। क्षेत्र में छिपकर वह हमेशा क्रांतिकारियों की मदद किया करता था ऐसा नहीं को उसकी पैठ सिर्फ गरीबों में हो बल्कि क्रांतिकारी देशभक्त प्रवृत्ति के अमीरों में भी उसका बहुत सम्मान था। जीवन भर भैंसे ने अंग्रेजों को खूब छकाया मगर लाख कोशिशों के बावजूद अंग्रेज उसे पकड़ने में सफल न हो सके।
एक महत्वपूर्ण घटना वर्ष 1891 की है। गांव के लोग बताते हैं कि अंग्रेजों ने भैंसे को पकड़ने के लिए नहटौर क्षेत्र के गांव कोकापुर के एक व्यक्ति को अपने साथ मिला लिया। उस व्यक्ति से भैंसे की मित्रता थी तथा भैंसा अक्सर उस व्यक्ति के पास आया-जाया करता था। षड्यंत्र के तहत उस व्यक्ति ने एक दिन भैंसे को अपने कोल्हू पर बुलाया और इसकी सूचना पाकर अंग्रेजी सैनिकों ने अपना जाल वहां बिछा लिया। अंग्रेज भैंसे से पूरी तरह चौकन्ने थे। इसलिए उन्होंने कोल्हू के एक पेड़ के पीछे की दीवार में छेद कर तीन बंदूकें उसमें लगाया दी थी। जैसे ही भैंसा शाम के समय कोल्हू पर पहुंचा अंधेरा देखकर उसने अपने दोस्त से कहा कि 'आज डिबिया क्यों नहीं जलाई उसके इस वाक्य के पूरा होते ही पीछे से एक गोली उसकी कनपटी में आ घुसी। भैंसा धोखे की इस बात को समझ गया और जंगल की तरफ भाग निकला लेकिन अंग्रेजी सिपाहियों ने दो गोली और उस पर दाग दी जो उसकी कमर व पसली में लगी। इसके बावजूद भी वह एक किलोमीटर दूर तक भागा और फिर धड़ाम से ऐसे गिरा कि फिर कभी न उठ सका। मरने के बाद जब भैंसा का पोस्टमार्टम कराया गया तो बताते हैं कि उसके दिल का वजन सवा सेर पक्का था। इतना हो वजन एक भैंसे के दिल का होता है। इसके बाद अंग्रेजों ने भैंसे का वंश समाप्त करने की ठान ली तथा उसके इकलौते पुत्र को अंग्रेजों ने गोली से मरवा दिया था।
भैंसे का कुटुम्ब आज भी उमरी गांव में रहता है और वह मकान भी जीर्ण-शीर्ण अवस्था में मौजूद है जिसमें भैंसा रहा करता था। गांव में कब्रिस्तान में स्थित भैंसे की कब्र अपना अस्तित्व खो चुकी है मगर परिवार के लोग आज भी उसकी कब्र पर फातिहा पढ़ते हैं। परिजनों का कहना है कि उन्हें सरकार से कोई सहायता नहीं बल्कि अपने परिवार के बहादुर स्वाधीनता संग्राम सेनानी के नाम पर किसी सड़क, पार्क या गांव का नाम चाहिए। इतिहास में अपने वंश के मोती का नाम दर्ज हो जाये यही बस दिल में तमन्ना है।
(फोटो का कैप्शन): अंतिम स्मृति शेष-ग्राम उमरी में भैंसे का जीर्ण-शीर्ण अवस्था में पड़ा पैतृक मकान। (छाया: रॉयल बुलेटिन)
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