दुष्यंत कुमार



दुष्यंत कुमार की कविता का परिवर्तनवादी स्वर

                                                      डॉ. संजय रणखांबे

                                                      विभागाध्यक्ष , हिंदी विभाग

                                                    डॉ. अण्णासाहेब जी. डी. बेंडाळे

                                                   महिला महाविद्यालय जलगाँव

                                                                                                                                  मोबा. 9096306029

                                                                                          Email : Dr.sanjay.rankhambe@gmail.com

 

 

हो गई है पीर पर्वतसी पिघलनी चाहिए ,

इस हिमालय से कोई गंगा निकलनी चाहिए 

मेरे सीने में नहीं तो तेरे सीने में सही

हो कहीं भी आग , लेकिन आग जलनी चाहिए ।

            दुष्यंत कुमार जी की साये में धूपग़ज़ल-संग्रह की उपर्युक्त पंक्तियां परिवर्तनवादी लडाइयों में सक्रिय कार्यकर्ताओं के लिए प्रेरणा एवं स्फूर्ति प्रदान कराती हैं । विषमतावादी व्यवस्था के  परिवर्तन में जुटे हुए, संघर्षरत  सामान्य मनुष्य के लिए उनकी कविता उर्जास्रोत है । वे कविता को सामाजिक और राजनीतिक परिवर्तन का हथियार मानते हैं । इस संबंध में उनकी सूर्य का स्वागतसंग्रह की निम्न पंक्तियाँ उल्लेखनीय हैं

मैंने कुछ तेज-सा कहा है ,

यों मुझे क्या पड़ी थी

जो अपनी कलम को खड्ग बनाता मैं ?”

          डॉ. मोहन समकालीन कविता की संघर्षशीलता के संबंध में लिखते हैं – “समकालीन कविता हर तरह की विषमताओं से लड़ती हुई कविता है । अंतर चाहे वर्ग का हो , या वर्ण का या रंग का जो विषमताएं जीवन को झकझोर देती है , समकालीन कविता इनके खिलाफ खडी रहती है ।1

         समकालीन कविता की इस प्रवृति को पूरी सामर्थ्य से अभिव्यक्त करने में दुष्यंत कुमार जी की कविता अग्रणी है । परिवर्तन के गीत जन-जन के बीच पहुँचानेवाली दुष्यंत की कविता अपनी समकालीन व्यवस्था को ध्वस्त कर नई जनकेंद्री व्यवस्था की पक्षधर है । उनकी सूर्य का स्वागतऔर आवाजों के घेरेकाव्य-संग्रह की अधिकतर कविताएँ नयी समतामूलक शोषणमुक्त व्यवस्था लाने की जद्दोजहद करती दिखायी देती हैं । इसके लिए दुष्यंत की कविता अपनी समकालीन व्यवस्था से सीधा लोहा लेती हुई सामान्य जनता के पक्ष में खडी होती है । इसलिए दुष्यंत कुमार जी की कविता में सामान्य मेहनतकश आदमी की अभावभरी जिंदगी के कई चित्र अंकित हुए हैं । उसकी दयनीय दशा का यथार्थ चित्र प्रस्तुत कर दुष्यंत कुमार जी उस आदमी के मन में क्रांति की चिंगारी जलाना चाहते हैं ।

              अपनी आम जरूरतों के लिए भागता, खटता यह श्रमजीवी आदमी व्यवस्था द्वारा शोषित, पीड़ित है । अभाव तथा दुःख-दर्दभरी जिंदगी, दिन-रात की मेहनत और उस पर व्यवस्था द्वारा शोषण के कारण आम आदमी की दशा अत्यंत दयनीय बन गई है । वह शारीरिक तथा मानसिक दृष्टि से पूरी तरह से टूट गया है । कवि दुष्यंत कुमार जी ने अपनी इनसे मिलिएशीर्षक कविता से इसी शोषित, पीड़ित जीव का सजीव अंकन किया है-

चुकता करते-करते जीवन का सूद

बाहें ढीली-ढीली ज्यों टूटी डाल

अंगुलियाँ जैसे सूखी हुई पुआल

छोटी-सी गरदन रंग बेहद बदरंग

हर वक्त पसीने की बदबू का संग

पिचकी अमियों से गाल लटे से कान

ऑंखें जैसे तरकश के खुट्टल बान

माथे पर चिंताओं का एक समूह ।2

            इस प्रकार दुष्यंत कुमार जी ने अपनी कविता में शहरों तथा गाँवों में निरंतर श्रम की चक्की में पीसकर , जिंदगी का बोझ उठाने के कारण घीस चुके , पीस चुके ,पसीने से तर-बतर बेहद बदरंग बने और दिन-रत माथे पर चिंताओं समूह लेकर निरंतर खटनेवाले आम आदमी की जिंदगी की कई झाकियाँ अंकित की है ।

           दुष्यंत कुमार जी ने अपनी कविताओं में सामान्य मेहनतकश आदमी की  अभाव तथा यातनाभरी जिंदगी का यथार्थ चित्रण किया हैं । कभी-कभी संघर्षरत जीवन पथ पर चलते हुए सामान्य मनुष्य छोटी-मोटी हार से निराश होता है । यह हार उसे अपने लक्ष्य से विचलित करती है । वह अपना आत्मविश्वास खो बैठता है । अपनी परिस्थितियों से हारकर बेबस बन जाता है । यह बेबस मानसिकता उसे पराधीन बनाती है । अत: अपने संघर्षमय जीवन से हताश एक आम आदमी की बेबस मानसिकता को रेखांकित करते हुए कवि लिखता है-

खंडहरों-सी भावशून्य ऑंखें

नभ से किसी नियंता की बाट जोहती हैं ।

बीमार बच्चों से अपने उचाट हैं

टूटी हुई जिंदगी

आंगन में दीवार से पीठ लगाए खड़ी है,

कटी हुई पतंगों से हम सब

छत की मुंडेरों पर पड़े हैं ।3

               कवि कहना चाहते हैं कि अपनी अज्ञानता, अभाव और यातनाभरी जिंदगी के कारण आम आदमी अपने मस्तिष्क की शक्ति विवेक खो बैठता है और अपनी वर्तमान दशा को प्रारब्ध मानकर उससे मुक्ति पाने के लिए किसी अज्ञात नियंता की बाट जोहता है । कवि ने ऐसी हारी हुई, बेबस मानसिकता का यथार्थ चित्रण प्रस्तुत पंक्तियों में किया है ।

              दुष्यंत कुमार जी की कविता उपेक्षित जनता की अभावभरी, यातनामय जिंदगी को चित्रित कर उनमें क्रांति के लिए आवश्यक चेतना जागृत करती है । इसी कारण इन कवियों ने अपनी कविता में सामान्य मेहनतकश लोगों की रोजमर्रा की जिंदगी के प्रसंगों, घटनाओं, दृश्यों को अंकित किया है । इसके लिए ये कवि हमेशा मेहनतकशों की बस्ती में ही घूमते रहते हैं । उनके जीवन के विविध पक्षों का, सुख-दुःख का चित्रण करना ही उनके साहित्य का उदेश्य होता है । वे अपनी सामाजिक प्रतिबद्धता का वहन करते हुए लोगों के जीवन यथार्थ प्रस्तुत करते हैं-

माना इस बस्ती में धुआँ है,

खाई है / खंदक है / कुआँ है / पर जाने क्यों ?

कभी-कभी धुआँ पीने को भी मन करता है ,

खाई खंदकों में जाने को भी मन करता है ,

यह भी मन करता है- / यहीं कहीं झर जाएँ

यहीं किसी भूखे को देह दान कर जाएँ

यहीं किसी नंगे को खाल खींच कर दे दे

प्यासे को रक्त आंख मींच-मींच कर दे दें

सब उलीच कर दे दें / यहीं कहीं ।4

               इस प्रकार दुष्यंत कुमार जी ने धुआँ , खंदक , खाई से भरे मेहनतकश वर्गों की बस्ती-झोपड़पट्टी का वर्णन करते हुए इन लोगों के लिए अपना जीवन समर्पित करने की उदात्त भावना को अभिव्यक्त किया है । अपनी दायित्वबोध की भावना के कारण ही कवि मेहनतकश लोगों के लिए सब कुछ उलीचकर दे देना चाहता है ।  

              अपनी गौतम बुद्ध सेकविता में जनता के प्रति प्रतिबद्ध कवि इस विवशता को भी व्यक्त करते है कि आज कोई  भी प्रतिबद्ध सच्चा प्रतिबद्ध कवि अपने आसपास की अभाव , दुःख-दर्दभरी जिंदगी , कराहों और चीखों से पृथक नहीं रह सकता । कवि बुद्ध से संबोधित करते हुए कहता है-

ये जो उठती चीख कराहें

सब गलियों सब दरवाजों से ,

सच कहना क्या बचकर जा सकते थे

तुम इन आवाजों से ?”5

              दुष्यंत कुमार जी को यह अच्छी तरह से ज्ञात है कि क्रांति का अपना समय होता है । केवल आम जनता में चेतना की जाग्रति ही परिवर्तन के लिए आवश्यक नहीं होती । जब वक्त की मार और अन्याय तथा शोषण से जर्जर आम जनता की सहनशीलता का अंत होगा तब ही परिवर्तन का स्वप्न साकार हो सकता है । कवि दुष्यंत कुमार के शब्दों में

सुख नहीं यों खौलने में सुख नहीं कोई ,

पर अभी जागी नहीं वह चेतना सोयी

वह, समय की प्रतीक्षा में है , जगेगी आप

ज्यों कि लहराती हुई ढकने उठाती भाप ।

अभी तो यह आग जलती रहे , जलती रहें ,

जिंदगी यों ही कडाही में उबलती रहे ।6

             इसका कारण यह है कि अधिक समय तक कोई भी मनुष्य अन्याय और शोषण के प्रहारों को सहन नहीं कर सकता । जब आम जनता की सहनशीलता दम तोडती है तो उमड़ते जन-सैलाब के बहाव में अत्याचारी व्यवस्था तहस-नहस हो जाती है । इस अपार जनसागर की सामर्थ्य के संबंध में कवि दुष्यंत कुमार लिखते हैं-

कब तक सहता रहता

अन्यायी वायु के प्रहारों को मौन यों ही

गरज उठा सागर

विवेकहीन जल है , मनुष्य नहीं ।7

               कवि कहना चाहता है कि जब जनता को अपनी जीर्ण-शीर्ण दशा के लिए जिम्मेदार व्यवस्था तथा उन आततायियों का पता चलेगा तो वह उसे उखाड़ फेंक देगी  । इसी कारण दुष्यंत कुमार जी ने अपनी काव्य साधना के माध्यम से आम जनता को देश की वर्तमान दशा और उसमें उसकी स्थिति से अवगत करवाकर जनता में चेतना जागृत करने का प्रयास किया है । वह अपने सभी साथी कवियों , कलाकारों को भी इसी प्रकार की शुद्ध चेतनाजागृति के गीत गाने का आह्वान करता है

गाओ....! / काई किनारे से लग जाए

अपने अस्तित्व की शुद्ध चेतना जग जाए

जल में ऐसा उबाल लाओ.... ।8

                   कवि अपनी समकालीन कवियों से आह्वान करता है कि वे ऐसे ओजस्वी गीत गायें जिससे आम जनता के मन में अपने अस्तित्व , स्वाभिमान की शुद्ध चेतना का संचार हो । उनके मन तथा बुद्धि पर चढ़ी अन्धविश्वास , अज्ञान , भय की काई छंट जाये । क्योंकि कवि को जनता की इस शुद्ध चेतना तथा जनशक्ति पर पूरा विश्वास है । वह मानता है कि इस अदम्य जनशक्ति का केवल एक संगठित प्रयास इस पूंजीवादी-सामंती व्यवस्था को ध्वस्त कर सकता है ।

                  अपनी इस जगी हुई क्रांति-चेतना के साथ शोषित , पीड़ित , दमित जनता अत्याचारी व्यवस्था के खिलाफ आक्रमक रूप धारण कर रास्ते पर उतरती है । जन-जन के मन में जलती यह ज्वाला एक होकर अपनी उष्णता से शोषणकारी-पूंजीवादी व्यवस्था को भस्म करने के लिए आगे बढती है । उसके इस रूप को देखकर अत्याचारी शासक भयभीत होता है । आज तक झुग्गी-झोपड़ियों, गांवों , गलियों में बदहाल जिंदगी जीनेवाले आदमी के पाँव जब राज-पथ पर पड़ने लगते हैं तो वह आततायी शासक  भयभीत होकर अपने दुर्ग में छिप जाता है और कवि से पूछता है कि यह राज-पथ की ओर कौन बढ़ता आ रहा  है ? कवि दुष्यंत कुमार ने व्यवस्था परिवर्तन के पथ पर अग्रसर जनता में जगी चेतना और उसके साहसी रूप का वर्णन करते हुए कहा है

आज लेकिन / आज  / वर्षों बाद /झोपड़ों से

आहटें सुन पड़ रही हैं / गली में आने

गली से राजपथ में पहुँच पाने के लिए

पगडंडियों से लड़ रही हैं..

आहटें ! / एक, दो, दस नहीं / अनगिन पगों की

रह-रह तड़पती / लडखडाती पर पास आती हुई

हर क्षण / बढ़ रही है .../ अभी होगा भग्न

दैत्याकार यह वातावरण / एक मरणासन्न रोगी की तरह

अकुला रहा है मौन / पूछती है गली मुझसे बावली

कवि ! / राजपथ पर आ रहा है कौन ?”9

                इस प्रकार जागृत चेतना से भरा जनसागर जब अपने सदियों से हो रहे शोषण के खिलाफ पूंजीवादी व्यवस्था की ऊँची , चिकनी दीवार पर धावा बोलता है तब वह खोखली दीवार पल में ढह जाती है । कवि दुष्यंत कुमार लिखते हैं

दीवार, दरारें पड़ती जाती हैं इसमें

दीवार दरारें बढती जाती हैं इसमें

तुम कितना प्लास्टर और सीमेंट लगाओगे

कब तक इंजीनियरों की दवा पिलाओगे

गिरनेवाला क्षण दो क्षण में गिर जाता है ,

दीवार भला कब तक रह पायेगी रक्षित

यह पानी नभ से नहीं धरा से आता है ।10 

               यही कारण है कि डॉ. विजय बहादुर सिंह उनकी कविता के संबंध में लिखते हैं – “ कविता को वे सिर्फ शब्दों तक सीमित रखने के कायल नहीं थे । उसे परिवर्तन के सबसे धारदार हथियार के रूप में देखने के आदी है ।11        

               निष्कर्षतः  कह सकते है कि दुष्यंत कुमार जी यह अच्छी तरह से जानते हैं कि किसी भी समाज में समाज का सामान्य मनुष्य जो सबसे शोषित, पीड़ित है वही परिवर्तन ला सकता है । इसलिए उसकी सोयी हुई परिवर्तनवादी चेतना को जगाना ही कवि अपना कर्त्तव्य मानता है । इसलिए दुष्यंत जी की सभी कविताएँ सामान्य शोषित, पीड़ित, अज्ञान, अंधविश्वास की खंदक और खाई में फँसे हुए आदमी के मन में व्यवस्था परिवर्तन की चेतना का संचार कराती है । उसे परिवर्तन के पथ पर बढ़ने के लिए प्रवृत्त करती है । इसलिए उनकी कविता केवल कोरी कविता नहीं रहती वह व्यवस्था परिवर्तन का हथियार बनती है । जन-जन के मन की ज्वाला बनकर व्यवस्था को ध्वस्त करने के लिए धधकती दिखाई देती है । इसीलिए दुष्यंत की कविता परिवर्तन के पथ पर अग्रसर सामान्य मनुष्य का उर्जास्रोत है 

 

 

स्व. दुष्यंत कुमार 01 सितंबर 1933 - 30 दिसम्बर 1975 )

   
अपने तीसरे कविता संग्रह 'जलते हुए वन का वसंत' की भूमिका में दुष्यंत कुमार कहते हैं कि 'मेरे पास कविताओं के मुखौटे नहीं हैं, अंतर्राष्ट्रीय मुद्राएँ नहीं हैं, मैं सामाजिक परिस्थिति के संदर्भ में साधारण आदमी की पीड़ा, उत्तेजना, दबाव, अभाव और उनके संबंधों में उलझनों को जीता हूँ और व्यक्त करता हूँ। मेरे लिए मनुष्य मात्र की अवमानना सबसे अधिक कष्टप्रद है।' इसी भावभूमि, विचार और संवेदना के तहत दुष्यन्त का परवर्ती लेखन निरंतर निखरता रहा एवं अधिक समृद्ध होता गया। अपने पहले कविता संग्रह 'सूर्य का स्वागत' से लेकर 'आवाज़ों के घेरे', 'जलते हुए वन का वसंत' और ग़ज़ल संग्रह 'साये में धूप' तक उनकी काव्य-प्रतिभा और प्रखरता लगातार परवान चढ़ती रही। उनका  काव्य-नाटक 'एक कंठ विषपायी' और दो उपन्यास 'छोटे छोटे सवाल' तथा 'आँगन में एक वृक्ष' भी इस दृष्टि से कम महत्त्वपूर्ण नहीं हैं।

   
दुष्यंत कुमार ने अपनी अधिकांश  लोकप्रिय गज़लें अंतिम समय में ही लिखीं। कहते हैं कि बुझते दिए की लौ तेज़ होती है। इन्हीं ग़ज़लों की वजह से दुष्यंत ने साहित्य में एक मुकम्मिल जगह बना ली। उनकी अंतिम समय की लिखीं ग़जलें न केवल बेइंतिहा लोकप्रिय हुई अपितु इन ग़ज़लों को एक जड़ व्यवस्था का तीव्र विरोध भी सहना पड़ा। व्यवस्थावादी लोगों ने कहा कि हिंदी में ग़ज़ल कोई विधा ही नहीं है। यह बहुत हल्की चीज़ है और साहित्य में इसका कोई महत्त्वपूर्ण स्थान भी नहीं। अब इसकी वजह क्या रही यह पता कर पाना बहुत मुश्किल काम नहीं। दरअसल दुष्यंत की ग़ज़लें एक पैनी सामाजिक और राजनैतिक चेतना की बेमिसाल नमूना थीं। वह इतनी संवेदनात्मक थीं कि लोगों पर अपना गहरा प्रभाव छोड़े बिना नहीं रहती थीं। अत: संवेदन-हीन और रूढ़ व्यवस्था के पक्षधरों द्वारा उनका विरोध होना स्वाभाविक ही था। इस से पहले न तो कभी ग़ज़ल को साहित्य की विधा मानने से इन्कार किया गया न ही उसे हल्की चीज़ माना गया। सत्तर के दशक के में दुष्यंत कुमार ने 'ग़ज़ल' को एक नई ज़िन्दगी दी। दिल को छूने वाले सामाजिक यथार्थ को अभिव्यक्त करने में दुष्यंत की भाषा एवं शैली ने जादू-सा कर दिया।'

   
उर्दू ग़ज़ल का मिजाज़ दरबारी था। उसकी विषयवस्तु, उसकी शब्दावली, संवेदना, लय, उन्मान, प्रतीक सब सुनिश्चित थे उन्हें तोड़ना या विकसित करना बहुत मुश्किल काम था। शमशेर बहादुर सिंह ने संभवत: इस दिशा में पहल की जब उन्होंने कहा - 'हक़ीक़त को लाए तखैयुल से बाहर, मेरी मुश्किलों का हल जो पाए'। शमशेर जी के बाद दुष्यंत कुमार ही एक ऐसे शायर हुए जिन्होंने उर्दू ग़ज़ल के बँधे-बँधाए ढाँचे को एकदम तोड़ दिया। यूँ हिंदी में ग़ज़ल लिखने की पहल जयशंकर प्रसाद, निराला, देवी प्रसाद पूर्ण, राम नरेश त्रिपाठी आदि कवियों ने की पर वे चूँकि उर्दू की परंपरागत ग़ज़लों और उसके छंद शास्त्र से कतई भिन्न थी सो तब बहुत लोकप्रियता उन्हें हासिल नहीं हुई । इसका एक कारण उनका रूढ़ और पारंपरिक कंटेन्ट भी रहा होगा। पर दुष्यंत ने जब ग़ज़लें लिखीं तो उसका कंटेन्ट बहुत प्रभावी था। अब यहाँ नई मुसीबत आ खड़ी हुई, व्यवस्था-विरोध पूर्ण शिद्दत से इन ग़ज़लों में उभर कर आया। वहीं परंपरावादी ग़ज़लकारों, ग़ज़ल प्रेमियों को आम, सहज भाषा का प्रभावी इस्तेमाल भी अखरा। यूँ उर्दू की जदीद शायरी में भी आम बोलचाल की भाषा का काफ़ी इस्तेमाल होता रहा था पर दुष्यंत को कैफ़ियत देना पड़ी कि उन्होंने 'शह्र' को शहर और 'वज्न' को वज़न जैसे शब्दों का उपयोग क्यों किया। बहरहाल जब दो मिसरों की ग़ज़ल आम भाषा में नुमाया हुई तो रदीफ़, क़ाफ़िये, वज़न, टेक्सचर और भाषा के सवालात पैदा  हुए। पर दुष्यंत कुमार की ग़ज़लों ने इन सारे सवालों को दरकिनार करते हुए अपनी पुख़्ता और मुकम्मिल ज़मीन बनाई। यहाँ यह बताना ग़ैरमुनासिब नहीं होगा कि भारतेन्दु हरिश्चंद्र ने भी उर्दू की परंपरा और शैली में ग़ज़लें लिखीं थीं परंतु अपनी पारंपरिक शैली के कारण जनमानस में वह महत्त्वपूर्ण स्थान न पा सकीं । जाहिर है दुष्यंत की ग़ज़लों की लोकप्रियता के पीछे हिंदी और उर्दू का फ़र्क नहीं बल्कि ग़ज़लों का धारदार कंटेन्ट ही है।

   
हम इस विवाद में नहीं पड़ना चाहते कि ग़ज़ल उर्दू हो या हिंदी, ग़ज़ल उर्दू से आई है वह हिंदी नहीं हो सकती। अलबत्ता उर्दू मिश्रित आम बोलचाल की भाषा में हो सकती है। ऐसी ग़ज़ल यदि लोगों के करीब हो तो कोई आश्चर्य की बात भी नहीं। दुष्यंत की ग़ज़लों में सामाजिक स्थितियों की पैनी और गहरी पड़ताल है तो राजनीतिक चेतना भी ग़ज़ब की है। दुष्यंत आम आदमी के दुख दर्द, सियासत की चालबाज़ी, फ़रेब, पाखंड और जड़-व्यवस्था की मूल्यहीनता के ख़िलाफ़ बहुत तीखे ढंग से रीएक्ट करते हैं। वह साफ़ कह उठते हैं -                                                                                                                  

                         
कहाँ तो तय था चरागां हरेक घर के लिए

                         
कहाँ चराग़ मयस्सर नहीं शहर के लिए।

यहाँ दुष्यंत की दृष्टि बहुत विस्तृत है। वह हर घर के लिए चराग़ की बात करते हैं। चराग़ का मतलब रोशनी से है और रोशनी का मतलब सुख, समृद्धि, शांति और समझदारी से है । हैरत की बात है कि आज चराग़ पूरे शहर के लिए यानि एक बहुत बड़े वर्ग के लिए मयस्सर नहीं है। यहाँ दुष्यंत की वर्ग चेतना बहुत स्पष्टता से मुखरित होती है लेकिन दुष्यंत इस स्थिति से हताश नहीं हैं । वह कहते हैं कि -

                         
वे मुतमइन हैं कि पत्थर पिघल नहीं सकता

                         
मैं बेकरार हूँ आवाज़ में असर के लिए ।

   
हर पल दुष्यंत कुमार की चेतना, मूल्य हीनता, सियासती दाँव-पेंच, सिद्धांतहीनता और प्रतिगामी स्थितियों को आरपार चीरती नज़र आती है। उनकी संवेदनशीलता हर बार और अधिक वेधक हो उठती है -

                           
कैसे-कैसे मंज़र सामने आने लगे हैं

                           
गाते-गाते लोग चिल्लाने लगे हैं ।

                           
अब तो इस तालाब का पानी बदल दो

                           
ये कँवल के फूल कुम्हलाने लगे हैं ।

     
वह देखते हैं कि आम अवाम किस क़दर असंवेदनशील हो गया है  तब वह कहते हैं कि -

                           
गज़ब ये है कि अपनी मौत की आहट नहीं सुनते

                           
वो सब के सब परेशाँ है कि वहाँ पर क्या हुआ होगा ।

                           
यहाँ तो सिर्फ़ गूँगे और बहरे लोग बसते हैं

                         
ख़ुदा जाने यहाँ पर किस तरह जलसा हुआ होगा ।

दुष्यंत की ग़ज़लें देश के हालात ( जाहिर है ख़स्ता हालात ) से रूबरू हैं। वे इससे इतने जुड़े हुए दिखते हैं कि प्रतिक्रिया व्यक्त करते हैं और ग़ज़ल नुमाया होती है । दूसरी चीज़ जो इन ग़ज़लों में बखूबी देखी जा सकती है वह है लोगों की संवेदनाओं को तेज़ करने की ललक। वह कुछ लोगों की संवेदनहीनता और शेष की जड़ता पर व्यंग्यात्मक प्रहार करते दीखते हैं -

                           
जिस तरह चाहो बजाओ इस सभा में

                           
हम नहीं आदमी,  झुनझुने हैं ।

   
आज के निम्न वर्ग के हालात पर और दिल्ली के संसदी-सियासती ढ़ोंग पर गज़ल है -

                           
भूख है तो सब्र कर,

                           
रोटी नहीं तो क्या हुआ

                           
आजकल दिल्ली में है ज़ेरे बहस ये मुद्दआ

   '
लोक की चिंता' आजकल राजनीति की दुनिया में बस दिखाने भर की चीज़ बच गई है । लोगों की परेशानी की नुमाइश अब जलसों-जुलूसों में की जाती है । भव्य आयोजन होते हैं यह बताने के लिए कि वे सब अवाम के लिए कितने फ़िक्रमंद हैं -

                           
ये लोग होमो हवन में यकीन रखते हैं

                           
चलो यहाँ से चलें, हाथ जल न जाए कहीं ।

   
अभिव्यक्ति की आज़ादी और सत्ता का उससे डर दुष्यंत की एक ग़ज़ल में यूँ आया है -

                           
मत कहो आकाश में कोहरा घना है

                           
यह किसी की व्यक्तिगत आलोचना है ।

   
दुष्यंत की ग़ज़लों की जो सब से बड़ी विशेषता है, वह है उनका आशावाद। यही बात कम से कम मुझे सबसे ज्यादा प्रभावित करती है। वह साफ़गोई से कहते हैं -                                                                                                  

                             
सिर्फ हंगामा खड़ा करना मेरा मकसद नहीं

                             
मेरी कोशिश है कि ये सूरत बदलनी चाहिए ।

   
सांप्रदायिकता और धार्मिक पाखंड पर वह क्षुब्ध होकर कह उठते हैं -

                             
ग़ज़ब है सच को सच कहते नहीं वो

                             
कुरानो उपनिषद खोले हुए हैं,

                             
मज़ारों से दुआएँ माँगते हो

                             
अकीदे किस कदर पोले हुए हैं ।

दुष्यंत कुमार का यह दृढ़ विश्वास था कि असली कविता सामाजिक जीवन से ही उभरकर सामने आती है। वे किसी स्कूल या साहित्यिक मत के हिमायती नहीं थे। वे एक ऐसी कविता शैली की तलाश कर रहे थे जो स्वाभाविक हो। काव्य के प्रति उनके इसी दृष्टिकोण ने उनमें सामान्य जीवन के यथार्थ को पुनर्सृजित करने का विश्वास पैदा किया।

'
वे कविताएँ उसी हद तक मेरी हैं कि मैंने इन्हें लिखा और इन्हें जिया है। अगर आप इनमें एक परिचित आवाज़ को सुन पाते हैं, एक सहृदय भाषा और अपनापन महसूस करते हैं तो मैं समझूँगा कि मैं सफल हो गया।'  दुष्यंत ने एक उम्र कविताएँ लिखने में गुज़ार दी, नाटक और उपन्यास भी लिखे पर लोकप्रियता ग़ज़ल से ही मिलीयह अकारण नहीं है। यहाँ तक कि उनके गीत भी ग़ज़लों की श्रेणी में पहचाने जाने लगे -

                             
रह रह कर आँखों में चुभती है

                             
निर्जन पथ की दोपहरी,

                             
आगे और बढ़ो तो शायद

                             
दृश्य सुहाने आएँगे ।

और इन्हीं सुहाने दृश्यों की मधुर परिकल्पना के साथ  30 दिसंबर 1975 को अल्प वय में भोपाल में हुए हृदयाघात से दुष्यंत चले गए लेकिन छोड़ गए एक विस्तृत आकाश, समृद्ध परंपरा और आने वाले स्वर्णिम कल की उम्मीद।

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दुष्यंत कुमार की कविताओं में जो आग है वो उनके भीतर सुलग रही है

Description: Kavya Desk 

काव्य डेस्क

 

Description: दुष्यंत कुमार

Kavya Charcha

"तुम्हारे शहर में ये शोर सुन-सुन कर तो लगता है 
कि इंसानों के जंगल में कोई हाँका हुआ होगा 
कई फ़ाक़े बिता कर मर गया जो उस के बारे में 
वो सब कहते हैं अब ऐसा नहीं ऐसा हुआ होगा 
यहाँ तो सिर्फ़ गूँगे और बहरे लोग बस्ते हैं 
ख़ुदा जाने यहाँ पर किस तरह जलसा हुआ होगा" 

यूँ तो जनता की कविता की जब भी हम बात करते हैं तो हमारे सामने वह कविता अवश्य होती है जो जनता के सुख-दुख में उसके संघर्षों में, उसके जीवन संग्राम में हमेशा साथ होती है। आज़ादी के बाद की जनपक्षधरताओं और जनसंघर्षों की कविता में नागार्जुन, रघुवीर सहाय, रमेश रंजक, गोरख पाण्डे, मुकुट बिहारी सरोज जैसे कई कवि हैं। ऐसे जनपक्षधर कवियों में शलभ श्रीराम सिंह और दुष्यंत कुमार भी शामिल हैं। दुष्यन्त कुमार का जन्म उत्तर प्रदेश में बिजनौर के राजपुर नवादा में एक सितम्बर 1933 को हुआ और निधन भोपाल में 30 दिसम्बर 1975 को हुआ था। दुष्यंत कुमार की शख़्सियत पर बात करने से पहले हमें हस्तक्षेप और प्रतिरोध के बारे में भी जानना ज़रूरी है।

हस्तक्षेप और प्रतिरोध ये दो ऐसे शब्द हैं जिनसे रचनाकार के व्यापक सरोकारों का पता चलता है। यह भी ज्ञात होता है कि उसके सामाजिक कन्सर्नक्या हैं और किस तरह के हैं। हस्तक्षेप मतलब दूसरे के काम में हाथ डालना। कोई भी रचनाकार सत्ता, व्यवस्था या किसी की मनमानी के ख़िलाफ़ जब सामान्य कार्यवाही करता है तो हम उसे हस्तक्षेप कह सकते हैं, लेकिन जब यह कार्यवाही व्यापक स्तर पर विरोध के रूप में या परिवर्तन की प्रक्रिया के रूप में बड़े व्यापक पैमाने पर की जाती है, तब उसे हस्तक्षेप नहीं प्रतिरोध ही कहा जाता है। 

दुष्यंत एक परिवर्तनकामी रचनाकर हैं। वे जीवन की सहजता में विश्वास करने वाले लेखक हैं। अपनी अनुभूति को ईमानदारी के साथ पेश करते हैं। दुष्यंत की चेतना का विकास दरअसल आज़ादी के बाद के स्वप्नों, कठोर हक़ीक़तों, आज़ादी से मोहभंग और जनतंत्र के विरोधाभासों विसंगतियों और एक ऐसे भारत के बनने का अंग है जहाँ साम्राज्यवाद, पूंजीवाद और कठोर व्यक्तिवाद का ताना-बाना है। दुष्यंत के किशोर मन में दो प्रकार के प्रश्न उठते थे जिनका उत्तर वे आज़ादी के बाद पाना चाहते थे, क्योंकि उन्हें लगता था कि दूसरे विश्व युद्ध और आज़ादी के बाद सब कुछ अपना है, लेकिन आज़ादी के बाद साम्प्रदायिकता के विस्फोटक रूप हमारे सामने आए। भष्ट्राचार के कई रूप पनपे। धर्म की हदबंदियों ने संबंधों को, आपसी भाईचारे को लगभग खंडहर के रूप में तब्दील कर दिया। भूख, ग़रीबी, बेकारी, बेबसी, अत्याचार, अंधेरगर्दी, निरक्षरता, अन्याय, असमानता हड़बोग आदि ने हमारी विकास-प्रक्रिया को भयावह और क्रूर रूप में बाधित किया। 

दुष्यंत का संवेदनशील मन इन प्रश्नों से सीधे-सीधे बेचैन हो उठता था। अपनी काव्य-यात्रा की शुरुआत से लेकर अपने आकस्मिक अवसान के बीच उनकी कविता में कई तरह के स्वप्न, कई तरह के यथार्थ, कई तरह की स्थितियां और कई तरह के अन्तर्विरोध एक साथ मिलते हैं। 1950 में लिखा उनका एक गीत देखें - 

"चाहे कितना कसकर बाँधों यह तूफान न बंदी होगा 
उठा आ रहा दूर एशिया की घाटी से विप्लव का स्वर। 
सोने-चांदी की दीवारें हो जाएंगी खण्डहर-खण्डहर
करते हो उपहास हमारा किस बूते पर किस बल पर
चमकीले सिक्कों के बंधन में ईमान न बंदी होगा।"

एक चिनगारी कहीं से ढूंढ लाओ दोस्तों

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दुष्यंत की कविताओं और ग़ज़लों को पढ़ते हुए मुझे तीन तरह के स्वर सुनाई पड़ते हैं। एक स्वर स्वीकार का है जो बहुत शांत और मद्धिम है। दूसरा अस्वीकार का है जो बहुत उद्धत और व्यापक परिवर्तन का आकांक्षी है, जिसमें बेचैनी, नाराज़गी, असुरक्षा का भय, असमानता और अन्याय का प्रतिरोध है। तीसरा स्वर वह है जिसमें उन्होंने अपने प्रेम के लिए भी स्पेसको बहुत शिद्दत के साथ तलाशा है। इन समूचे स्वरों को दुष्यंत कुमार अपनी कविताओं में दर्ज करते हैं। सबसे ज़्यादा, प्रबल, शक्तिशाली और घनत्व वाला स्वर अस्वीकार और प्रतिरोध का ही है। इस अस्वीकार में वे नाराज़गी के उस मुकाम तक पहुँचते हैं, जिसमें जनकवियों के जनजागरण के अभियान हैं, जनपक्षधरता की चिंतायें भी। इसके साथ बौखलाहट भी है और चीख़ पुकार की आवाज़ भी शामिल है। जनता जिसे पसंद करती है और वह जिस तरह का आचरण करती है और वह जिस तरह से अपने आक्रोश को व्यक्त करती है वह सबकुछ उसमें घुल मिल जाता है। दरअसल दुष्यंत की प्रसिद्धि का क्षेत्र इसी तरह की कविताओं से बनता है और यही उनकी पहचान का अटूट सिलसिला भी है। दुष्यंत कुमार के मित्रों, शुभचिंतकों और प्यार करने वालों ने भी उनके मूड्स या यूं कहें कि उनके उस पक्ष को सामने रखा है जो उनके तई उन्हें अच्छा लगा। 

'
यारों के यार दुष्यंत कुमार' में कथाकार शानी का दुष्यंत के बारे में कहते हैं, "संघर्ष यानी तथाकथित सफलता की लड़ाई जो उसके इस सबके बावजूद आख़िर तक नहीं मिली। हाँलांकि मैं जानता हूँ कि मिल भी जाती तो भी वह उसकी बेचैनी का इलाज नहीं थी। ...जल्दी, बेचैनी, खुलापन, बेलौस मस्ती, बेसब्री और अधैर्य से पैदा हुआ अंतरद्वंद्व, कविता ही नहीं उसकी ज़िंदगी का भी मिज़ाज था।" 

दुष्यंत का एक गीत है जो उनके जज्बे को उनकी मनोसामाजिकी और उनके अटूट भरोसे के रूप में हम देख सकते हैं। इस गीत पर पाठकों और आलोचकों बार-बार निशाना साधते रहे हैं - 

"ज़िंदगी ने कर लिया स्वीकार 
अब तो पथ यही है।
अब उफनते ज्वार का आवेग मद्धम हो चला है,
एक हल्का-सा धुंधलका था कहीं कम हो चला है,
यह शिला पिघले न पिघले रास्ता नम हो चला है,
क्यों करूं आकाश की मनुहार 
अब तो पथ यही है।
क्या भरोसा, कांच का घट है, किसी दिन फूट जाए,
एक मामूली कहानी है, अधूरी छूट जाए,
एक समझौता हुआ था रोशनी से टूट जाए,
आज हर नक्षत्र है अनुदार 
अब तो पथ यही है।" (जलते हुये वन का बसंत)

कवि दुष्यंत की भयावह चिंताओं में हमारा समय रहा है, समय के तमाम घमासान, समय के कहे अनकहे द्वंद्व रहे हैं जिसके बारे में कहा जाता है, कि यह तलवार की धार जैसा समय है। इस समय में अन्याय, अत्याचार, शोषण, उत्पीड़न, दोगलापन है। धर्मान्धता, साम्प्रदायिकता, धूर्तता, छल-कपट और भ्रष्टाचार के अलावा राजनैतिक हडबोंग भी शामिल है। इसे हम केवल राजनैतिक सत्ताओं में ही नहीं धर्मसत्ताओं, समाजसत्ताओं और अर्थसत्ताओं की व्यापक और बहुआयामी कार्यवाहियों में भी देख और अनुभव कर सकते हैं। इन सबकी शिनाख़्त भिन्न-भिन्न रूपों में दुष्यंत करते हैं - 

‘‘कहां तो तय था चिराग़ा हरेक घर के लिए
कहाँ चिराग़ मयस्सर नहीं शहर के लिए।
हाथों में अंगारे लिये सोच रहा था
कोई मुझे अंगारों की तासीर बताये।

दुष्यंत जनता के विश्वास को इस रूप में दर्ज़ करते हैं - 

एक चिनगारी कहीं से ढूंढ लाओ दोस्तों,
इस दिये में तेल से भीगी हुई बाती तो है।
दुख नहीं कोई कि अब उपलब्धियों के नाम पर
और कुछ हो या न हो, आकाश सी छाती तो है।
कैसे मंज़र सामने आने लगे हैं,
गाते गाते लोग चिल्लाने लगे हैं। 

 

 

मत कहो आकाश में कोहरा घना है,

यह किसी की व्यक्तिगत आलोचना है!

व्यक्तिगत आलोचना से बचने वाले और हर समस्या का हल खोजने को प्रयासरत रहने वाले दुष्यंत कुमार (जन्म: 01 सितम्बर 1933निधन: 30 दिसम्बर 1975) आज ही के दिन अल्पायु में साहित्य जगत को सूना कर चले गए थे।  यद्यपि इस संसार में उनका प्रवास बहुत अल्प रहा था, परन्तु उतने ही समय में उन्होंने साहित्य को जनता का स्वर बना दिया था। उनकी रचनाओं में तत्कालीन व्यवस्था के प्रति रोष और क्षोभ दिखलाई देता है।

उनकी रचनाओं में सपने टूटने की पीड़ा है। उनकी रचनाओं में उस व्यवस्था के प्रति मोहभंग है, जिसमें उन्होंने आँखें खोली हैं। वह जबरन क्रान्ति लाने में विश्वास नहीं करते। वह जानते हैं कि क्रान्ति को जब आना होगा, तब आएगी। उन्हें पता है कि जब समय के अत्याचारों, अन्याय और शोषण से व्यक्ति स्वयं त्रस्त होगा, तब क्रांति आएगी। वह लिखते हैं:

सुख नहीं यों खौलने में सुख नहीं कोई ,

पर अभी जागी नहीं वह चेतना सोयी

वह, समय की प्रतीक्षा में है , जगेगी आप

ज्यों कि लहराती हुई ढकने उठाती भाप ।

अभी तो यह आग जलती रहे , जलती रहें ,

जिंदगी यों ही कडाही में उबलती रहे ।

दुष्यंत कुमार शासन और लेखकों के मध्य भी एक स्पष्ट सम्बन्ध निर्धारित करते हैं। वह जो कहते हैं, उसे कहने में बड़े बड़े लेखक आज तक लजाते हैं, वह सोच के स्तर पर इतने परिपक्व हैं और स्पष्ट हैं कि आज के तमाम लेखक उनके समान धरातल पर जाकर खड़े नहीं हो पाते हैं। इन दिनों लेखकों और साहित्यकारों को यह लगता है कि सरकार उन्हें नहीं पहचानती या सम्मान नहीं देती तो वह शिकायत करते हैं।

परन्तु वर्ष 1972 में नई दुनिया में प्रकाशित दुष्यंत कुमार का लेख साहित्य सत्ता की ओर क्यों देखता है पढने पर यह ज्ञात होता है कि कथित जनवादी लेखकों को यह समस्या तब भी थी। वह लिखते हैं कि यह एक अजीब बात है कि साहित्यकार में शिकवों और शिकायतों का शौक बढ़ता जा रहा है। उसे शिकायत है कि गवर्नर और मुख्यमंत्री उसे पहचानते नहीं, शासन उसे मान्यता नहीं देता या देता है तो तब जब वह कब्र में पैर लटका कर बैठ जाता है। लेकिन समझ नहीं आता कि लेखक के लिए यह जरूरी क्यों है कि वह उन बातों को महत्व दे! आखिर शासन ने तो उससे नहीं कहा था कि वह लेखक बने। वह अपनी अदम्य संवेदनशीलता के कारण लेखक बनता है, अभिव्यक्ति की दुर्निवार पीड़ा उसे कलम उठाने के लिए विवश करती है। इस प्रक्रिया में शासन या समाज कहाँ बीच में आता है?”

दुष्यंत यहीं नहीं रुकते हैं, वह लेखन और शासन को अलग रखने के लिए तर्क देते हैं। वह कहते हैं कि शासन से मान्यता का अर्थ है शासन से समझौता, और समझौता हमेशा अकादमी को कहीं न कहीं कमजोर करता है, और यह विरोधाभास ही तो है कि आप जिस शासन की आलोचना करें, उसी की स्वीकृति और मान्यता के लिए तरसें!

उन्होंने लेखकों को विशेषाधिकार का भी विरोध किया था क्योंकि उनके अनुसार लेखक को अपनी स्वतंत्रता में बाधक होने वाले हर अहसान से बचना चाहिए। वह इस बात से बहुत दुखी थे कि लेखक आखिर सत्ता के आसपास क्यों घुमते हैं? उन्होंने इस लेख में लेखक संघों की राजनीति की भी आलोचना की थी।

एक और बात उन्होंने लेखकों के लिए कही थी और वह अभी तक हिंदी के साहित्य जगत के लिए सटीक बैठती है। उन्होंने लिखा था कि दरअसल बात यह है कि लेखक किसी दूसरे लेखक को भौतिक दृष्टि से जरा सी भी संपन्न स्थिति में नहीं देख सकता।और उन्होंने हिंदी लेखकों के दोमुंहेपन पर बात करते हुए कहा था कि वह अर्थात हिंदी का लेखक) एक साँस में विरोध करता है और दूसरी में समर्पण! एक तरफ वह शासन को कोसता है और उनकी उपेक्षा का हवाला करता है और फिर दूसरे प्रदेशों का हवाला देकर यह सिद्ध करना चाहता है कि वहां नेता साहित्यकारों का आदर करते हैं।

दुष्यंत कुमार ने हिंदी वामपंथी लेखकों की सच्चाई जो उस समय बताई थी, वह इस समय भी वही है। आज भी उन्हें भारतीय जनता पार्टी के नेतृत्व वाली एनडीए की सरकार को कोसना है और उससे हर समिति में स्थान, फेलोशिप और सम्मान, पुरस्कार भी पाने हैं।

सरकार को कोसने वाले और हिन्दुओं को कोसने वाले लेखक भारतीय जनता पार्टी के नेताओं से सम्मान और पुरस्कार लेते देखे गए हैं। वामपंथी लेखकों का लेखकीय ईमान धन राशि या सम्मान देखते ही डोल जाता है।

बहरहाल बात दुष्यंत की! दुष्यंत को आन्दोलनों का शायर कहा जाता है, वह लिखते हैं

हो गई है पीर पर्वत-सी पिघलनी चाहिए

इस हिमालय से कोई गंगा निकलनी चाहिए

आज यह दीवार, परदों की तरह हिलने लगी

शर्त थी लेकिन कि ये बुनियाद हिलनी चाहिए

हर सड़क पर, हर गली में, हर नगर, हर गाँव में

हाथ लहराते हुए हर लाश चलनी चाहिए

सिर्फ हंगामा खड़ा करना मेरा मकसद नहीं

मेरी कोशिश है कि ये सूरत बदलनी चाहिए

मेरे सीने में नहीं तो तेरे सीने में सही

हो कहीं भी आग, लेकिन आग जलनी चाहिए

पर आज के आंदोलनों से दुष्यंत गायब हैं

दुष्यंत की रचनाओं में जो आक्रोश है, वह किसी भी सरकार विरोधी आन्दोलन के प्राण हो सकता है, परन्तु वह हाल ही में हुए आन्दोलनों से नदारद दिखे! ऐसा क्यों है कि जिन दुष्यंत ने अपनी सरकारी नौकरी की परवाह न करते हुए आपातकाल में कविता लिख डाली थी

एक गुड़िया की कई कठपुतलियों में जान है,

आज शायर यह तमाशा देखकर हैरान है

ख़ास सड़कें बंद हैं तब से मरम्मत के लिए

यह हमारे वक़्त की सबसे सही पहचान है

एक बूढ़ा आदमी है मुल्क़ में या यों कहो

इस अँधेरी कोठरी में एक रौशनदान है

उनकी किसी कविता को इन सरकार विरोधी आन्दोलनों में नहीं लिया गया?

क्या इसलिए क्योंकि दुष्यंत ने विभाजनकारी कविताएँ नहीं लिखीं? उनका असंतोष भारत के लिए था, उनका क्षोभ एक बेहतर भविष्य के लिए था और समाधान खोजते थे, वह लिखते थे कि

सिर्फ हंगामा खड़ा करना मेरा मकसद नहीं

मेरी कोशिश है कि ये सूरत बदलनी चाहिए

जबकि अभी के जो लेखक हैं, वह हंगामा तो खड़ा करते हैं, पर सूरत बदलने पर उनका जोर नहीं है! दुष्यंत हिन्दुओं को गाली नहीं देते हैं, वह सत्ता पर निशाना साधते हैं, इसलिए हिंदी गजल को धारदार पहचान देने वाले दुष्यंत साहित्यिक परिदृश्य से गायब कर दिए गए हैं और उनके स्थान पर फैज़ आ गए हैं, जो बुत गिरवाने के बहाने हिन्दू धर्म पर निशाना साधते हैं और जिनका विरोध सत्ता से न होकर हिन्दू धर्म से है!

हिंदी गजल में दुष्यंत का स्थान वही है जो उर्दू में ग़ालिब या किसी और का हो सकता है!  परन्तु हिंदी साहित्य दुष्यंत को भुला बैठे हैं, क्योंकि उन्होंने एजेंडा नहीं चलाया, साहित्यकारों को सत्ता से अलग रहने के लिए कहा!

 

 

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