स्वर्गीय सुबाेध चंद्र शर्मा नूतन


 

स्व. सुबोध चन्द्र शर्मा 'नूतन' : एक उपेक्षित साहित्यकार

जनपद बिजनौर की पावन भूमि को अपनी गोद से अनेक लालों को जन्म देकर भारत के विविध क्षेत्रों में उन्हें प्रतिनिधित्व के लिये भेजने का गौरव प्राप्त है।

विश्व प्रसिद्ध मां भागीरथी ने जहां अपने कल-कल निनादित जल से इसका आंचल पावन करते हुए इसकी सीमाओं का अंकन किया है, वहीं भारत का मुकुट हिमालय इसे अपनी गोद में बिठाये मुस्कुरा रहा है। चक्रवर्ती सम्राट भरत की यह क्रीड़ा स्थली, महर्षि कण्व का विद्याश्रम आश्रम, महाराज विदुर की कुटी और गुरु द्रोणाचार्य का आश्रम, आदि भारतीय संस्कृति के महान दिग्गजों और पुराधाओं को जन्म देने का गौरव और उनका पालन-पोषण करने का श्रेय इसी धरती को प्राप्त है। सामाजिक, राजनीतिक, धार्मिक, सांस्कृतिक, साहित्यिक-ऐसा कौन सा क्षेत्र है, जिसमें इसकी अनन्य सहभागिता नहीं रही है। मैं यहां साहित्यिक पक्ष को ले रहा हूँ। साहित्यिक दृष्टि से इस धरती ने असंख्य प्रख्यात एवं गुमनाम साहित्यकारों को जन्म दिया। स्व. दुष्यन्त कुमार, स्व. पदमसिंह शर्मा, प्रकृति की विश्व प्रसिद्ध साहित्यिक मेधा और हिन्दी साहित्य के लिये किए गये अविस्मरणीय योगदान को कौन भुला सकता है? इसी प्रकार श्री रामचन्द्र जो 'वाचक' (रतनगढ़), श्री भगवन्त शर्मा 'दर्द' (रतनगढ़), श्री भगवन्त सहाय (नवादा), श्री सुबोध चन्द्र शर्मा 'नूतन' (सिसींना), श्री दिग्विजय 'तस्लीम', श्री शम्भु नाथ सिंह 'दानिश', श्री राम अवतार शर्मा 'उम्मीद', श्री मक्खन सिंह 'माखन', श्री काशीनाथ शर्मा, श्री जयकृष्णा शर्मा 'कृष्णा', श्री राम अवतार शास्त्री आदि-आदि के नाम उल्लेखनीय हैं। ये सभी साहित्यकार-

  1. 'त्यागी' मासिक पत्रिका : अंक 11, वर्ष 27, नवम्बर 1935, 508 मां भारती की सतत सेवा करते हुए विरन्द्रा में विलीन हो गये हैं। अपने जीवन में जीवन-पर्यन्त सृजन में रत रहे, पर प्रचार से विरत भी रहे। ऐसे ही साहित्यकारों में स्व. सुबोध चन्द्र शर्मा 'नूतन' का नाम उल्लेखनीय है।

स्व. सुबोध चन्द्र शर्मा 'नूतन'

  • जन्म : 29/5/1906

  • मृत्यु : 25/7/1974

श्री सुबोध चन्द्र शर्मा 'नूतन' हिन्दी भाषा और साहित्य के उदीयमान लेखकों और कवियों में अग्रणी रहे।

हिन्दी साहित्य के इस मार्तण्ड का जन्म 29/5/1906 को सोमवार को जनपद बिजनौर के ग्राम सिसींना में चौधरी सुरजसिंह के सुपुत्र चौ. हीरासिंह के यहां हुआ। आर्थिक दृष्टि से यह मध्यम वर्गीय परिवार था। किन्तु 'त्यागी' परिवारों में इस परिवार का नाम बड़े ही आदर एवं सम्मान के साथ लिया जाता है। 'नूतन' जी अपने पिता चौ, हीरासिंह के सबसे छोटे पुत्र थे जो पांच भाई थे। क्रमशः सभी संतानों की मृत्यु होती चली गई और ईश्वर की कृपा से केवल श्री सुबोध चन्द्र शर्मा 'नूतन' ही जीवित रह पाये।

हमारे आदरणीय रचनाकार-श्री 'नूतन' को भी चार पुत्रों-श्री सुबोध कुमार त्यागी, श्री विनोद कुमार त्यागी, तथा दो पुत्रियों- श्रीमती मंजू एवं श्रीमती इन्दु की प्राप्ति हुई। इनमें श्री सुबोध कुमार त्यागी आज भी कवि के पैतृक निवास गृह-सिसींना में अपने परिवार के साथ रह रहे हैं।

श्री सुबोध चन्द्र शर्मा 'नूतन' आरंभ से ही कुशाग्र बुद्धि के रहे। कवि ने पिता के सभी गुणों को जैसे स्वयं ही आत्मसात कर लिया था। ज्ञातव्य है कि कवि के पिता श्री चौ. हीरासिंह जो 'हीरा' भी स्वयं में एक समर्थ साहित्यकार थे।

'नूतन' जी बचपन से विनीत, विनम्र, मृदुभाषी, कठोर, परिश्रमी, स्वाभिमानी, स्वाध्यायी, उत्साही, गंभीर, निर्भीक व्यक्तित्व के धनी रहे। आप की प्रारम्भिक शिक्षा कक्षा 1 से 4 तक उनके ग्राम-सिसींना में ही हुई। उसी समय आपके परिवार में कुछ अज्ञात कारणों से कलह रहने लगी। स्वाभिमान प्रिय व्यक्तित्व को जब अपने घर का वातावरण रास नहीं आया तो वे अपना परिवार छोड़कर अपनी शेष शिक्षा की पूर्ति हेतु ज्वालापुर (हरिद्वार के गुरुकुल) में चले गये। और, वहीं से आपने अपनी शेष शिक्षा से लेकर उच्च शिक्षा तक की शिक्षा पूर्ण की। आपने, संस्कृत, हिन्दी और गणित में विशेष योग्यताएं प्राप्त कीं। हिन्दी भाषा एवं साहित्य की तो आपने उस समय की सर्वोच्च परीक्षाएं-जैसे- 'साहित्य भूषण' 'विशेष योग्यता' और 'प्रभाकर' इत्यादि को ससम्मान उत्तीर्ण किया। आपने अनूठी प्रतिभा थी। तत्कालीन प्रख्यात 'त्यागी' पत्रिका के तो प्रचारक, उद्धारक और लेखक भी रहे।

हिन्दी के कितने अनाम साहित्यकार अपने अनूठे व्यक्तित्व एवं कृतित्व को साहित्य-जगत को उपहार देकर गोलोकवासी हो गये! क्या कभी हमे उनकी याद आती है? हम उन पर दो शब्द श्रद्धांजलि स्वरूप व्यय करने में भी कतराते हैं?

बिजनौर जनपद

गुरुकुल हरिद्वार से उच्चशिक्षा ग्रहण करने के पश्चात आप डीडवाना (मारवाड़) चले गये, वहां आपने टीचर्स ट्रेनिंग स्कूल से शिक्षण की उपाधि प्राप्त करते हुए हिन्दी व गणित में विशेष योग्यता भी प्राप्त की। टीचर्स ट्रेनिंग प्राप्त करने के पश्चात 1936 में आप बाली (राजस्थान) चले गये और वहां कई वर्ष तक शिक्षण कार्य किया। इसके बाद आप डीडवाना आये, और वहां भी कुछ वर्ष तक शिक्षण कार्य किया, डीडवाना से आप, सुमेरपुर (राजस्थान) आ गये, और अंत तक यही कार्य करके अपने निवास स्थान-सिसींना आकर रहने लगे।

मुरादाबाद जनपद के ग्राम-हरा (हसनपुर तहसील) निवासी श्री छिद्दासिंह की पुत्री-सुश्री अतर कली से आप दाम्पत्य बंधन में बंध गये। जिससे आपको चार पुत्रों एवं दो पुत्रियों की प्राप्ति हुई।

श्री 'नूतन' ने जीवन-भर कठोर परिश्रम किया और अपने स्वाभिमान को कहीं भी आंच नहीं आने दी तो कहते थे- 'स्वाभिमान से विचलित हो जीवन व्यतीत करना, यह जीवन को मजाक उड़ना समझिए'। और, इसी मान्यता के अनुरूप ही उनका जीवन व्यतीत हुआ।

श्री 'नूतन' जीवन-पर्यन्त अपने शिक्षण कार्य के साथ साहित्य-सेवा में लीन रहे। आप एक अच्छे आलोचक, लेखक, सम्पादक, और कवि थे। वे ज्योतिष के भी अच्छे ज्ञानी थे। आप भारतीय वेशभूषा, ऋजुता और निश्छलता के बड़े पक्षपाती थे।

'नूतन' जी ने ज्योतिष, व्याकरण, शिक्षा पद्धति को लेकर अनेक मौलिक पुस्तकों का सृजन किया। व्याकरण पर इनकी एक पुस्तक 'अनुभुक डिपो, जलंधर' से भी प्रकाशित हुई। यह अत्यन्त हिन्दी व्याकरण की पुस्तक है।

'नूतन' जी के जीवन के अधिकांश वर्ष राजस्थान के सुमेरपुर, डीडवाना, आदि भयानक स्थानों पर व्यतीत हुआ यही कारण है कि उनका अधिकांश प्रकाशित साहित्य वहां प्राप्त होता है।

'नूतन' जी के सुपुत्र-श्री प्रबोध कुमार त्यागी से जो विपाठ मिला तो उनके बारे में मुझे विस्तृत जानकारी एवं कुछ अप्रकाशित साहित्य मूल रूप में प्राप्त हुआ, जो कि साहित्य ही अतिशय उदारता के साथ उन्होंने मुझे अवलोकनार्थ सौंप दिया। यही नहीं कवि के जीवन से जुड़े अनेक महत्वपूर्ण प्रसंगों एवं संस्मरणों को मुझे बताया, जिन्हें यहां प्रस्तुत करना सम्भव भी नहीं है। हां, शोधार्थी ही उनका उपयोग कर सकता है।

उनके पुत्र से प्राप्त 'नूतन' जी की हस्तलिखित मूल पाण्डुलिपि 'नेताशतक' मुझे देखने को मिली जिसमें मुझे नेताजी के चरित्र और भारतीय राजनीति के उतार-चढ़ावों को बड़े ही सुन्दर ढंग से प्रस्तुत किया गया है। इसमें 'नूतन' जी के एक सौ से अधिक दोहे उपलब्ध हैं। उनकी दृष्टि में आज के नेता की बानगी देखिए-

- डॉ. महेश 'दिवाकर'

डी.लिट.

प्राध्यापकः- हिन्दी विभाग

जी.एस. एम. कालेज, चांदपुर (बिजनौर)

"नेता में गुण चार हैं, कौशल, अवसरवाद।

वचन-तुष्टि 'नूतन' तथा सभा-मंच पर नाद।।"

और-

"दल-बदलू नेता घने, भारत में है आज।

इस दल-बदली के लिए, आती इन्हें न लाज।।"

इसके विपरीत एक अच्छे नेता के गुण भी देखिए-

"सत्य-निष्ठ, निष्पक्ष जन, संयत वाक्-विहीन।

जन-प्रिय नेता कठिन है, सुमति, गूढ़, स्वाधीन।।"

'नेता शतक' में भारतीय राजनीति, नेताओं की कुर्सी आदि विषयों पर अधिकार लिखा गया है। उनका यह सृजन बड़ा ही सुन्दर बन पड़ा है। पैना व्यंग्य है और साहित्यिक हिन्दी का प्रयोग आद्योपांत दर्शनीय है।

'नूतन' सतसई नाम से भी उनकी एक अन्य पाण्डुलिपि भी मुझे देखने को मिली, जिसमें धर्म, अध्यात्म गीता, जीवन-मरण, उपदेश, भाग्य, कर्म, दुर्जन, स्त्री, मा-महत्ता, कृषक, राष्ट्र आदि बहुविधि विषयों पर उनके एक हजार से अधिक दोहे संगृहीत हैं। अतः मैं तो इसे 'नूतन सतसई' ही कहना अधिक संगत मानूँगा, क्योंकि इस पाण्डुलिपि के मुखपृष्ठ पर कृति का नाम नहीं दिया है। लगता है कृति का आवरण पृष्ठ अपने मूल रूप में नहीं है। वस्तुतः इस पाण्डुलिपि के दोहे भी बड़े सुन्दर बन पड़े हैं।

आइए, जरा इनकी भी बानगी लीजिए-

"गीता-रामायण पढ़ी, ज्ञान हुआ नहि, खेद।

मानव-मानव में किये, ऊँच-नीच के भेद।।"

और-

"देश-जाति-हित जो हुए, हस-हंस, कर बलिदान।।"

"उनके गौरव गाव को, बनूँ, मधुरतम गान।।"

'मानव-मानव से घृणा, करता धन से अन्ध।'

"नीच-साधक-नारकी, क्यों वह उल्टी रीध।।"

'प्रेम' का यह चित्र देखिए-

"श्रेष्ठ प्रेम भगवान् है, प्रभु है निर्मल प्रेम।

'नूतन' एक एकत्व में, योगी कुशल-क्षेम।।"

"मां की महत्ता देखिए- 'माता सम कोई नहीं, देव जगत में जान।'

'नूतन' सबको छोड़कर, मां का धर तू ध्यान।।"

स्मरतः 'नूतन' जी के काव्य में मानव-जीवन और समाज का एक भी ऐसा पक्ष नहीं है, जिसका अभीष्ट चित्र अपने दोहों में उन्होंने न खींचा हो। उनकी शैली प्रभावप्रिय लिये हुए है, जो कही-कहीं दुरूह भी हो जाती है। किन्तु साहित्यिक दृष्टि से उसकी उपादेयता असंदिग्ध है। उनके साहित्य का भावपक्ष एवं कलापक्ष उनके नाम के अनुरूप सर्वथा 'नूतन' और सशक्त है।

इस पर पृथकतः शोध की आवश्यकता है। दुर्भाग्य है कि जनपद के किसी भी साहित्यिक-प्राध्यापक एवं अनुसंधानित्सु का ध्यान 'नूतन' जी पर नहीं गया। उनका साहित्य अभी अप्रकाशित है। उसे संगृहीत कर प्रकाशित कराने की भी आवश्यकता है। साथ ही ऐसे जुझारू शोधार्थियों एवं शोध-प्राध्यापकों की भी आवश्यकता होगी। जो अपने निर्देशन में शोध कराकर 'नूतन-साहित्य' को प्रकाश में ला सके।

'नूतन' जी अपने जीवन के अंतिम दिनों में अपने पैतृक निवास सिसींना (बिजनौर) उ.प्र. आ गये और वही साहित्य साधना करते हुए अंततः 25 जुलाई 1974 को चिरनिद्रा में विलीन हो गये। इसे इस महान साहित्यकार को मेरी भाव-भीनी श्रद्धांजलि अर्पित है।

Comments

Popular posts from this blog

हल्दौर रियासत

तारीख ए सरकशे जिला बिजनौर लेखक सर सैयद अहमद खां

बिजनौर है जाहरवीर की ननसाल