देश का एक गुमनाम सिपाही, मनोज रंजन दीक्षित
मनोज रंजन दीक्षित की कहानी किसी फिल्मी जासूसी थ्रिलर से कम नहीं है। उत्तर प्रदेश के बिजनौर जिले के नजीबाबाद के रहने वाले मनोज रंजन दीक्षित का जीवन देशभक्ति, साहस, संघर्ष और फिर सिस्टम की बेरुखी की एक लंबी दास्तान है।
यहाँ मनोज रंजन दीक्षित के जीवन और उनकी जासूसी यात्रा पर आधारित एक विस्तृत विवरण है:
1. साधारण शुरुआत और असाधारण लक्ष्य
मनोज रंजन दीक्षित नजीबाबाद के एक मध्यमवर्गीय परिवार से ताल्लुक रखते थे। 1980 के दशक में, जब भारत और पाकिस्तान के बीच संबंध तनावपूर्ण थे, मनोज के मन में देश के लिए कुछ कर गुजरने का जज्बा था। उनकी इसी हिम्मत ने उन्हें भारतीय खुफिया एजेंसियों की नजरों में ला खड़ा किया। उन्हें प्रशिक्षित किया गया और एक कठिन मिशन के लिए तैयार किया गया: सीमा पार जाकर दुश्मन की सूचनाएं जुटाना।
2. पाकिस्तान में 'छद्म' पहचान
1985 के आसपास, मनोज रंजन दीक्षित को जासूसी के मिशन पर पाकिस्तान भेजा गया। वहाँ उन्होंने अपनी पहचान पूरी तरह बदल ली। एक जासूस का जीवन हर पल मौत के साये में होता है; उन्हें न केवल वहां की भाषा और लहजे को अपनाना था, बल्कि वहां के स्थानीय रीति-रिवाजों में इस तरह घुलना-मिलना था कि किसी को शक न हो।
कहा जाता है कि उन्होंने पाकिस्तान में रहते हुए कई महत्वपूर्ण सूचनाएं भारत भेजीं। उन्होंने वहां के सैन्य ठिकानों और रणनीतिक गतिविधियों पर नजर रखी, जो भारतीय सुरक्षा के लिहाज से बेहद संवेदनशील थीं।
3. गिरफ्तारी और प्रताड़ना का दौर
जासूसी की दुनिया में एक छोटी सी चूक भी भारी पड़ती है। 1992 में मनोज रंजन दीक्षित को पाकिस्तानी सुरक्षा एजेंसियों ने पकड़ लिया। उन पर जासूसी के आरोप लगाए गए और उन्हें जेल भेज दिया गया।
पाकिस्तान की जेलों में एक भारतीय जासूस की स्थिति क्या होती है, इसकी कल्पना करना भी रोंगटे खड़े कर देता है। मनोज ने वहां लगभग 13 साल बिताए। इस दौरान उन्हें अमानवीय प्रताड़ना (Third-degree torture) का सामना करना पड़ा। उन्हें अंधेरी कोठरियों में रखा गया, शारीरिक रूप से तोड़ा गया और मानसिक रूप से प्रताड़ित किया गया ताकि वे राज उगल सकें। लेकिन, नजीबाबाद के इस सपूत ने हार नहीं मानी।
4. वतन वापसी: एक अधूरा स्वागत
साल 2005 में, भारत और पाकिस्तान के बीच कैदियों की अदला-बदली और राजनयिक प्रयासों के चलते मनोज रंजन दीक्षित को रिहा किया गया। जब वे बाघा बॉर्डर के रास्ते भारत लौटे, तो उनकी आंखों में अपने देश की मिट्टी देखने की खुशी थी।
नजीबाबाद पहुंचने पर उनका स्वागत तो हुआ, लेकिन असली संघर्ष इसके बाद शुरू हुआ। एक 'गुमनाम नायक' (Unnamed Hero) की सबसे बड़ी त्रासदी यही होती है कि जब वह लौटता है, तो सरकारी रिकॉर्ड में अक्सर उसकी सेवाओं का कोई औपचारिक दस्तावेज नहीं होता।
5. गुमनामी और संघर्ष का जीवन
वापस आने के बाद मनोज रंजन की आर्थिक स्थिति बेहद खराब हो गई। जासूसी मिशन पर जाने के कारण उनके पास कोई स्थायी नौकरी नहीं थी और जेल की प्रताड़ना ने उनके शरीर को जर्जर कर दिया था।
स्वास्थ्य संबंधी समस्याएं: जेल की मार के कारण उन्हें कई गंभीर बीमारियां हो गईं।
आर्थिक तंगी: उन्हें अपना गुजर-बसर करने के लिए दर-दर की ठोकरें खानी पड़ीं।
सरकारी उपेक्षा: मनोज ने कई बार सरकार और प्रशासन से मदद की गुहार लगाई। उन्होंने पेंशन और सम्मान की मांग की, लेकिन लालफीताशाही (Bureaucracy) के चलते उन्हें वह सम्मान और आर्थिक सुरक्षा नहीं मिल पाई जिसके वे हकदार थे।
6. जासूसों की नियति पर सवाल
मनोज रंजन दीक्षित की कहानी भारत के उन दर्जनों 'ब्लैक टाइगर' और जासूसों की याद दिलाती है जो देश की खातिर अपनी जवानी जेलों में गला देते हैं, लेकिन लौटने पर उन्हें पहचान के लिए भी संघर्ष करना पड़ता है। रवींद्र कौशिक (Black Tiger) की तरह मनोज का जीवन भी इसी कड़वे सच को उजागर करता है।
नजीबाबाद के लोग उन्हें सम्मान की नजर से देखते हैं, लेकिन एक जासूस को केवल जनता की सहानुभूति नहीं, बल्कि राज्य का संरक्षण भी चाहिए होता है।
मुख्य बिंदु: एक नजर में
| पहलू | विवरण |
| निवासी | नजीबाबाद, बिजनौर (उत्तर प्रदेश) |
| मिशन | पाकिस्तान में जासूसी (1985 के आसपास) |
| गिरफ्तारी | 1992 में पाकिस्तान में पकड़े गए |
| सजा | 13 साल पाकिस्तान की जेल में बिताए |
| रिहाई | 2005 में भारत वापसी |
| वर्तमान स्थिति | आर्थिक और शारीरिक समस्याओं से जूझते हुए गुमनामी का जीवन |
निष्कर्ष
मनोज रंजन दीक्षित केवल एक व्यक्ति नहीं, बल्कि उस निस्वार्थ देशभक्ति का प्रतीक हैं जो बिना किसी मेडल या पब्लिसिटी की चाहत में दुश्मन की मांद में घुस जाते हैं। नजीबाबाद की गलियों से निकलकर पाकिस्तान की जेलों की सलाखों तक का उनका सफर साहस की पराकाष्ठा है। आज भी उनकी कहानी नई पीढ़ी को प्रेरित करती है, साथ ही यह सवाल भी खड़ा करती है कि क्या हम अपने इन छिपे हुए नायकों को वह सम्मान दे पा रहे हैं जिसके वे पात्र हैं?
जीबाबाद निवासी पूर्व रॉ (RAW) एजेंट मनोज रंजन दीक्षित का जीवन वीरता और संघर्षों की एक ऐसी कहानी है, जिसका अंत अत्यंत दुखद और विचलित करने वाला रहा।
यहाँ उनके जन्म, मृत्यु और जीवन के अन्य महत्वपूर्ण पहलुओं का विस्तार से विवरण है:
1. जन्म और शुरुआती जीवन
जन्म: मनोज रंजन दीक्षित का जन्म लगभग 1966-67 के आसपास उत्तर प्रदेश के बिजनौर जिले के नजीबाबाद में हुआ था (निधन के समय उनकी आयु 54 वर्ष बताई गई थी)।
शिक्षा और भर्ती: 80 के दशक में जब रॉ (R&AW) आम नागरिकों को उनकी योग्यता के आधार पर भर्ती कर रहा था, तब 1985 में मनोज को चुना गया। उन्होंने मिशन पर जाने से पहले दो बार कठिन सैन्य प्रशिक्षण लिया था।
2. पाकिस्तान में मिशन और पहचान
छद्म नाम: सीमा पार कदम रखते ही उनकी पहचान बदल दी गई। ब्राह्मण परिवार से ताल्लुक रखने वाले मनोज दीक्षित को पाकिस्तान में 'मुहम्मद यूनुस' और बाद में 'इमरान' के नाम से जाना गया।
कार्य: उन्होंने दो बार पाकिस्तान की यात्रा की और वहां रहकर भारत के लिए महत्वपूर्ण खुफिया जानकारियां जुटाईं।
3. गिरफ्तारी और जेल (1992-2005)
पकड़े जाना: साल 1992 में उन्हें जासूसी के आरोप में पाकिस्तानी सुरक्षा एजेंसियों ने गिरफ्तार कर लिया।
कैद: उन्हें कराची की जेल में रखा गया, जहाँ उन्होंने करीब 13 साल बिताए। वहां उन्हें अमानवीय यातनाएं दी गईं, लेकिन उन्होंने हार नहीं मानी। 2005 में बाघा बॉर्डर के जरिए उनकी वतन वापसी हुई।
4. निजी जीवन और त्रासदियां
विवाह: भारत लौटने के बाद, 2007 में उन्होंने शोभा नाम की महिला से विवाह किया।
पत्नी का निधन: उनकी पत्नी शोभा 2013 में कैंसर से ग्रस्त हो गईं। मनोज उन्हें इलाज के लिए लखनऊ ले गए, लेकिन उसी वर्ष उनकी पत्नी का निधन हो गया। पत्नी के इलाज में उनकी जमा-पूंजी भी खर्च हो गई।
5. मृत्यु: एक दुखद अंत (26-27 अप्रैल, 2021)
मनोज रंजन दीक्षित की मृत्यु देश के सिस्टम पर एक बड़ा सवालिया निशान लगाती है:
कारण: अप्रैल 2021 में, कोरोना महामारी की दूसरी लहर के दौरान वे कोविड-19 से संक्रमित हो गए थे।
अंतिम समय: उनकी स्थिति गंभीर थी और ऑक्सीजन लेवल काफी गिर गया था। मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, लखनऊ के अस्पतालों में काफी भटकने के बाद भी उन्हें एक बेड (Bed) तक नसीब नहीं हुआ।
तिथि: 26 अप्रैल 2021 (सोमवार) की रात को अभाव और इलाज न मिलने के कारण इस पूर्व जासूस ने दम तोड़ दिया।
6. जीवन के अंतिम दिनों का संघर्ष
अपने अंतिम दिनों में मनोज रंजन दीक्षित लखनऊ के गोमतीनगर विस्तार में एक स्टोर कीपर के रूप में काम कर रहे थे। लॉकडाउन के कारण उनकी वह नौकरी भी छूट गई थी और वे अत्यंत मुफलिसी (गरीबी) में जीवन व्यतीत कर रहे थे।
"देश के लिए अपना जीवन दांव पर लगाने वाले एक जासूस का अंत अस्पताल के बाहर बेड के इंतजार में हो जाना, उनकी पूरी जासूसी यात्रा से भी अधिक दर्दनाक रहा।"
मनोज रंजन दीक्षित का पाकिस्तान की जेलों में बीता समय और वहां से रिहाई तक का सफर किसी रूह कंपा देने वाले अनुभव से कम नहीं था। 1992 में पकड़े जाने से लेकर 2005 में भारत की धरती पर कदम रखने तक की कानूनी और कूटनीतिक प्रक्रिया को निम्नलिखित बिंदुओं में समझा जा सकता है:
1. गिरफ्तारी और 'दुश्मन' का ठप्पा
1992 में जब मनोज पाकिस्तान में अपनी खुफिया गतिविधियों को अंजाम दे रहे थे, तब उन्हें संदिग्ध अवस्था में गिरफ्तार किया गया।
आरोप: उन पर आधिकारिक गोपनीयता अधिनियम (Official Secrets Act) और जासूसी की धाराओं के तहत मामला दर्ज किया गया।
पहचान का संकट: गिरफ्तारी के वक्त उनके पास कोई भारतीय पहचान पत्र नहीं था (जो एक जासूस की मानक प्रक्रिया है)। पाकिस्तानी जांच एजेंसियों ने उन्हें एक 'भारतीय एजेंट' के रूप में चिन्हित किया, जबकि वे खुद को एक स्थानीय नागरिक बताने की कोशिश कर रहे थे।
2. अदालती कार्यवाही और सजा
पाकिस्तान की सैन्य अदालत (Military Court) में मनोज पर मुकदमा चला।
गोपनीय सुनवाई: इस तरह के मामलों की सुनवाई अक्सर बंद कमरों में होती है, जहाँ आरोपी को अपनी बेगुनाही साबित करने का बहुत कम मौका मिलता है।
सजा का ऐलान: पर्याप्त सबूतों और खुफिया जानकारियों के आधार पर उन्हें 14 साल के कठोर कारावास की सजा सुनाई गई। उन्हें कराची की सेंट्रल जेल और बाद में कोट लखपत जेल जैसी कुख्यात जगहों पर रखा गया।
3. जेल की प्रताड़ना और 'थर्ड डिग्री'
कानूनी लड़ाई से कहीं ज्यादा कठिन उनका जेल का जीवन था:
शारीरिक शोषण: मनोज ने अपने साक्षात्कारों में बताया था कि उन्हें लोहे की छड़ों से पीटा जाता था और हफ्तों तक अंधेरी कालकोठरी में अकेला छोड़ दिया जाता था।
मानसिक युद्ध: उनसे राज उगलवाने के लिए उन्हें सोने नहीं दिया जाता था और लगातार भारत विरोधी प्रचार सुनाया जाता था।
4. रिहाई की कूटनीतिक प्रक्रिया (The Road to Release)
उनकी रिहाई रातों-रात नहीं हुई, बल्कि इसके पीछे लंबी बातचीत का दौर चला:
राजनयिक दबाव (Diplomatic Pressure): 2000 के दशक की शुरुआत में भारत और पाकिस्तान के बीच 'विश्वास बहाली के उपायों' (Confidence Building Measures) के तहत कैदियों की अदला-बदली पर चर्चा शुरू हुई।
भारतीय उच्चायोग की भूमिका: इस्लामाबाद स्थित भारतीय उच्चायोग ने उन कैदियों की सूची तैयार की जिन्होंने अपनी सजा पूरी कर ली थी। मनोज का नाम इस सूची में शामिल था।
सजा की समाप्ति: 2005 तक मनोज अपनी 14 साल की सजा का बड़ा हिस्सा (करीब 13 साल) काट चुके थे। उनके अच्छे आचरण और अंतरराष्ट्रीय दबाव के कारण उन्हें सजा में कुछ महीनों की छूट मिली।
5. 2005: वतन वापसी का वह दिन
आखिरकार, 18 अगस्त 2005 को वह दिन आया जब पाकिस्तान ने मानवीय आधार पर कई भारतीय कैदियों को रिहा करने का फैसला किया।
बाघा बॉर्डर: मनोज रंजन दीक्षित को अन्य कैदियों के साथ वाघा-अटारी बॉर्डर पर लाया गया।
पुष्टि प्रक्रिया: सीमा पर भारतीय अधिकारियों ने उनकी पहचान की पुष्टि की। जैसे ही उन्होंने भारतीय सीमा में कदम रखा, उन्होंने मिट्टी को चूम लिया था।
कानूनी और सामाजिक चुनौतियां (वापसी के बाद)
विडंबना यह रही कि जेल से छूटने के बाद की 'कानूनी लड़ाई' और भी कठिन थी:
अस्तित्व की लड़ाई: रॉ (RAW) जैसी एजेंसियां आधिकारिक तौर पर कभी स्वीकार नहीं करतीं कि कोई व्यक्ति उनका जासूस था। इस कारण मनोज के पास अपनी सेवा साबित करने का कोई कानूनी दस्तावेज नहीं था।
मुआवजे का अभाव: उन्होंने सालों तक अदालतों और सरकारी दफ्तरों के चक्कर काटे ताकि उन्हें एक पूर्व सैनिक या सरकारी कर्मचारी की तरह पेंशन मिल सके, लेकिन तकनीकी कारणों से उन्हें "लावारिस" छोड़ दिया गया।
मनोज रंजन दीक्षित का सफरनामा
| वर्ष | घटना |
| 1985 | भारत से पाकिस्तान के लिए रवानगी। |
| 1992 | पाकिस्तान में गिरफ्तारी और 14 साल की सजा। |
| 1992-2005 | जेल में यातनाएं और लंबी कानूनी जद्दोजहद। |
| 2005 | वाघा बॉर्डर के जरिए रिहाई और भारत वापसी। |
| 2021 | बिना इलाज और ऑक्सीजन के लखनऊ में दुखद मृत्यु। |
नजीबाबाद के मनोज रंजन दीक्षित ने अपनी वापसी के बाद विभिन्न साक्षात्कारों में जो दर्द बयां किया, वह किसी भी पत्थर दिल इंसान को झकझोर सकता है। उनके शब्दों में केवल अपनी बहादुरी का बखान नहीं था, बल्कि एक ऐसी बेरुखी का अफसोस था जिसे उन्होंने 'वतन की बेरुखी' कहा।
यहाँ उनके द्वारा दिए गए बयानों और साक्षात्कारों के आधार पर उनके जीवन की एक मार्मिक कहानी प्रस्तुत है:
"नाम बदल गया, मजहब बदल गया, पर दिल हिंदुस्तानी रहा"
मनोज रंजन दीक्षित अक्सर अपने इंटरव्यू में उस पल को याद करते थे जब 1985 में उन्हें पहली बार सरहद पार भेजी गई 'अमानत' की तरह रवाना किया गया था। उन्होंने बताया था:
"जब मैं पाकिस्तान गया, तो मेरा नाम मनोज नहीं था। मैं 'मुहम्मद यूनुस' बन चुका था। मुझे नमाज पढ़नी आती थी, मुझे वहां के तौर-तरीके पता थे। मुझे डर मौत का नहीं था, डर इस बात का था कि अगर पकड़ा गया तो कहीं मेरा देश मुझे पहचानने से इनकार न कर दे।"
1. पाकिस्तान की कालकोठरी: "वह 13 साल एक लंबी रात थे"
अपने जेल के दिनों को याद करते हुए मनोज की आंखें अक्सर भर आती थीं। उन्होंने एक साक्षात्कार में बताया था कि 1992 में गिरफ्तारी के बाद शुरू हुआ यातनाओं का सिलसिला रूह कंपा देने वाला था।
अंधेरी कोठरी: उन्हें महीनों ऐसी कालकोठरी में रखा गया जहाँ सूरज की एक किरण तक नहीं पहुंचती थी।
शारीरिक प्रताड़ना: उनके शरीर पर सिगरेट से दागने के निशान और लोहे की छड़ों की मार के निशान उनकी कहानी खुद बयां करते थे। वे कहते थे, "वे (पाकिस्तानी अधिकारी) मुझसे बस एक ही बात सुनना चाहते थे कि मुझे किसने भेजा है, लेकिन मैंने कभी अपने देश का नाम बदनाम नहीं होने दिया।"
2. बाघा बॉर्डर का वह ऐतिहासिक सजदा
2005 में जब उन्हें रिहा किया गया, तो उस पल का वर्णन उन्होंने बहुत भावुक होकर किया था। उन्होंने कहा था कि जब वे वाघा बॉर्डर पर पहुंचे, तो उन्हें यकीन नहीं हो रहा था कि वे आजाद हैं।
"जैसे ही मैंने भारतीय सीमा की लकीर पार की, मैंने सबसे पहले अपनी मिट्टी को चूमा। मुझे लगा कि वनवास खत्म हो गया। मुझे लगा कि अब मेरा देश मुझे गले लगाएगा।"
3. "जासूस की सबसे बड़ी सजा: गुमनामी"
मनोज का सबसे बड़ा दर्द उनकी वापसी के बाद शुरू हुआ। साक्षात्कारों में उन्होंने बार-बार इस बात का जिक्र किया कि कैसे सरकारी तंत्र ने उन्हें 'पहचानने' से मना कर दिया।
सिस्टम की बेरुखी: उन्होंने कहा था, "मैंने जवानी जेल की सलाखों के पीछे गला दी, लेकिन जब वापस आया तो न मेरे पास नौकरी थी, न पहचान। मैं एक पूर्व जासूस था, लेकिन कागजों पर मैं कुछ भी नहीं था।"
आर्थिक तंगी: अपनी पत्नी शोभा के इलाज के दौरान उन्होंने जो लाचारी झेली, वह उनके शब्दों में साफ झलकती थी। उन्होंने बताया था कि कैसे एक 'नायक' को लखनऊ की सड़कों पर चंद रुपयों के लिए स्टोर कीपर की नौकरी करनी पड़ी।
4. अंतिम साक्षात्कार का कड़वा सच
अपने निधन से कुछ समय पहले के बयानों में मनोज रंजन दीक्षित के शब्दों में एक अजीब सी शांति और थोड़ी कड़वाहट थी। वे अक्सर कहते थे कि जासूस को 'इस्तेमाल' तो किया जाता है, लेकिन 'संभाला' नहीं जाता।
"हम वो सिपाही हैं जिन्हें न मेडल मिलता है, न शहीद का दर्जा। हम बस इतिहास के पन्नों में कहीं खो जाते हैं।"
एक नायक का निष्प्राण अंत
विशाल साक्षात्कारों का सार यही निकलता है कि मनोज रंजन दीक्षित ने पाकिस्तान की जेल में 13 साल तो काट लिए, लेकिन अपने ही देश में 'सिस्टम की जेल' से वे कभी आजाद नहीं हो पाए। अप्रैल 2021 में, जब वे अस्पताल के बाहर एक बेड और ऑक्सीजन के लिए तड़प रहे थे, तो शायद उन्हें वह पाकिस्तानी जेल याद आ रही होगी, जहाँ कम से कम उन्हें अपनी पहचान छुपाने की जरूरत तो नहीं थी।
मनोज रंजन के जीवन से जुड़ा एक महत्वपूर्ण सबक:
मनोज की कहानी हमें यह सिखाती है कि पर्दे के पीछे रहकर देश की रक्षा करने वालों के लिए "Social Security" और "Recognition Policy" कितनी जरूरी है।
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