आपातकाल में जनपद बिजनौर का संघर्ष अविस्मरणीय है


लेखक: डॉ. अनिल शर्मा 'अनिल' स्वतंत्र भारत में इतिहास में 25 जून 1975 से 21 मार्च 1977 तक का समय एक ऐसा काला अध्याय है, जिसको आपातकाल कहा जाता है। देश में तत्कालीन प्रधानमंत्री श्रीमती इंदिरा गांधी ने 25-26 जून 1975 की अर्धरात्रि को देश में आपातकाल की घोषणा कर दी। विपक्ष के कार्यकर्ताओं और सरकार के विरुद्ध आवाज उठाने वाले हजारों लोगों को तुरंत गिरफ्तार कर जेल में डाल दिया गया। सरकार का विरोध में लिखने विशेष पत्रकारों को जेल में डाल दिया गया प्रेस पर सेंसरशिप लागू कर दी गयी यह आपातकाल लगाया क्यों गया था?

इसकी पृष्ठभूमि में था 1971 का लोकसभा चुनाव। जो श्रीमती इंदिरा गांधी ने रायबरेली से राजनारायण को हराकर जीता था। राजनारायण ने इस चुनाव में धांधली का आरोप लगाते हुए उच्च न्यायालय में वाद दायर किया था। जिस पर निर्णय सुनाते हुए न्यायालय ने उस चुनाव को रद्द घोषित कर दिया और श्रीमती गांधी पर 6 वर्ष तक चुनाव लड़ने पर रोक लगा दी थी। इससे बौखला कर श्रीमती गांधी ने देश में आपातकाल की घोषणा कर दी।

वरिष्ठ पत्रकार कुलदीप नैयर ने अपने संस्मरण में लिखा है कि प्रेस की भूमिका अत्यंत दयनीय थी। उस समय कोई इलेक्ट्रॉनिक मीडिया नहीं था। प्रेस बहादुरी और नैतिकता के उपदेश देता था, लेकिन बहुत कम लोगों और अखबारों ने विरोध किया था। पूरे देश में शासन प्रशासन का भय व्याप्त था। धड़ाधड़ गिरफ्तारियां हो रही थीं उस समय आर.एस.एस. पर प्रतिबंध लगा दिया गया और उससे जुड़े लोगों, समाजवादी विचारधारा वाले लोगों और इस असंवैधानिक आपातकाल का विरोध करने वाले कलमकार और सक्रिय युवाओं को जेलों में ठूंस दिया गया।

देश के हर आंदोलन में सक्रिय रहने वाला हमारा जनपद बिजनौर इस आपातकाल के विरोध में भी पीछे नहीं रहा। सरकार की यातनाओं को सहा, किंतु विरोध से मुंह नहीं मोड़ा। उत्तर प्रदेश में 9 सितम्बर 2006 को तत्कालीन मुख्यमंत्री मुलायम सिंह यादव ने 1975 आपातकाल में जेल यात्रा करने वाले लोगों को लोकतंत्र सेनानी घोषित करते हुए सम्मानित किया। जनपद बिजनौर से 70 लोगों को लोकतंत्र सेनानी माना सरकार ने। इनमें सर्वाधिक 27 नाम धामपुर तहसील से, 10 नाम चाँदपुर तहसील से, 10 नाम नजीबाबाद तहसील से, 4 नाम नगीना तहसील से, 19 नाम बिजनौर तहसील से शामिल हैं। इनमें से लगभग 25 से अधिक सेनानी दिवंगत हो चुके हैं।

सरकारी आंकड़ों के अनुसार जनपद में लगभग 50 लोकतंत्र रक्षक सेनानियों को सरकार द्वारा दी जाने वाली मासिक सम्मान राशि और परिवहन विभाग की बसों में निशुल्क यात्रा की सुविधा प्राप्त हो रही है। लोकतंत्र रक्षक सेनानी जिला बिजनौर इकाई के पूर्व कोषाध्यक्ष शिव कुमार सिंह ने जनपद बिजनौर के लोकतंत्र सेनानियों का विवरण देते हुए बताया कि:

  • धामपुर तहसील से सर्वश्री: राजेंद्र कुमार गोयल, महेंद्र पाल सिंह, शिवकुमार, डॉ रमेश चंद्र, पवन कुमार, शीतल प्रसाद अग्रवाल, के वी भूषण, प्रवीण सिंह, बुध सिंह, उदय राज, रामकुमार जसवंत सिंह, आनंद कुमार, जसवंत सिंह, मुकेश रस्तोगी, राजबहादुर, राम सिंह, घनश्याम सिंह, मायाराम शर्मा, धर्मवीर सिंह, नेमीशरण, विश्वामित्र शर्मा, मोहम्मद इलियास, जगदीश नारायण, जलील अहमद, चरण सिंह सुमन, और गोपी सिंह।

  • चाँदपुर तहसील से: शब्बीर अहमद हेमेंद्र कुमार, महावीर सिंह, लाखन सिंह, महाबीर सिंह, राधेश्याम वर्मा, कमलेश कुमार, राम सिंह, चांदरूप सिंह, अब्दुल हमीद।

  • नजीबाबाद तहसील से: सोहेल उद्दीन, आमोद अरोज, धनीराम, सुरेश, योगेल कुमार, रामपाल ब्रजवीर सिंह, रामपाल सिंह, मुकंदी सिंह, ब्रजनंदन त्यागी।

  • नगीना तहसील से: अब्दुल लतीफ, खुर्शीद अहमद, सुक्खे सिंह, राम सिंह।

  • बिजनौर तहसील से: मुनीश प्रकाश अग्रवाल, श्री कृष्ण, प्रीतम सिंह, शिवकुमार शर्मा, चेतराम, टीकम सिंह, आनंदपाल, नरेंद्र कुमार, चंद्रवीर सिंह गहलोत, सुखबीर सिंह, बालेश्वर प्रसाद, प्रदीप कुमार, बरकत अली, सुखबीर सिंह, आदित्य नारायण मित्रा, देवेंद्र कुमार, जितेंद्र कुमार, बलवंत सिंह, बलकरण सिंह शामिल हैं।

यह वो लोग जो आपातकाल के दौरान जेल में रहे और सरकार ने इनको लोकतंत्र रक्षक सेनानी माना। इनमें से दिवंगत हो चुके सेनानियों के आश्रित को मासिक सम्मान राशि देने की व्यवस्था 2016 में की गई उत्तर प्रदेश सरकार इस कार्य के लिए बधाई की पात्र है। कई ऐसे भी हैं जो 9 सितंबर 2006 से पहले ही दिवंगत हो गए और लोकतंत्र रक्षक सेनानी घोषित न हो सके। कुछ नाम ऐसे हैं जिनको आपातकाल में जेल यात्रा के बावजूद सरकार ने लोकतंत्र रक्षक सेनानी का दर्जा नहीं दिया। हालांकि आंदोलन में इनका योगदान कम नहीं था। इनमें सर्वश्री अभिमन्यु सिंह, डॉक्टर अमर सिंह, ओमप्रकाश आक्षी, कृष्ण बहादुर सिंह, गिरीश चंद्र अग्रवाल, घनश्याम सिंह सैनी, चंद्रपाल सिंह कर्णवाल, चंपत राय बंसल, श्री चतर सिंह खत्री, श्री झुन्ना सिंह, दुर्गा सिंह, दलीप सिंह राणा, डॉ दयानंद, नौबहार सिंह, प्रभू सिंह सैनी, नरेश कुमार शर्मा, नेम चंद जैन, प्रभू सिंह सैनी, पृथ्वी सिंह चूड़, ब्रह्म शरण रखा, भगवान सिंह, भारत सिंह, मुकंदी सिंह लाही, गैपराज सिंह, मदन गोपाल शर्मा, महाराज सिंह, राजेश्वर प्रसाद बंसल, रघुराज सिंह, रामचंद्र सिंह, रमेश चंद्र अग्रवाल, बाबा लक्ष्मण दास, लाखन सिंह, विमल प्रसाद वर्मा, य श्याम सिंह, शिव चरन लाल, श्याम स्वरूप, कुंवर सत्यवीर सिंह, स्वरूप सिंह, हरीश कुमार खन्ना, हरदेव सिंह, हरिओम, हरपाल सिंह, हरिओम सिंह, डॉ कृष्ण कुमार शर्मा, सुदेश कुमार, ब्रजेश कुमार, धर्मवीर सिंह, भारत सिंह, बृजमोहन शर्मा, डॉ दुर्गा सिंह, प्रो रविंद्र सिंह वर्मा, रामनाथ सिंह वत्स, डॉ सुरेंद्र मणि, मास्टर बलराम सिंह, के पी सिंह, ओ पी अरोड़ा, राम अवतार वर्मा, लाला ओम प्रकाश, विमल प्रसाद रस्तोगी, जयंत कुमार, बंगाली बाबा, स्वामी आनंद चैतन्य, सुरेश कुमार, चंद्रशेखर सिंह, धर्मवीर सिंह, कमलेश कुमार गोयल आदि के नाम उल्लेखनीय हैं।

वरिष्ठ अधिवक्ता लोकतंत्र रक्षक सेनानी ठाकुर चंद्रवीर सिंह गहलोत बताते हैं कि जब 25 जून 1975 को देश में आपातकाल लगा तब वह स्वर्गीय कुंवर सत्यवीर सिंह जी के साथ पश्चिमी उत्तर प्रदेश में सत्याग्रह आंदोलन में सक्रिय भागीदार रहे। 7 सितंबर 1975 फरीदपुर हल्दौर में बैठक का आयोजन किया गया था। जिसमें आपातकाल के विरुद्ध प्रस्ताव पास किया गया। जिला कांग्रेस कमेटी ने इनके खिलाफ गिरफ्तारी के आदेश करा दिए और प्रशासन सही नाम घोषित करा दिया इसी बैठक में इन को गिरफ्तार कर जेल भेज दिया गया।

प्रवीण शास्त्री उन दिनों को याद करते हुए बताते हैं कि 1975 में उन्होंने आत्माराम कॉलेज धामपुर में पहुंचकर आपातकाल के विरुद्ध पंपलेट बांटे और जब वह पंपलेट बांटते हुए धामपुर मंडी पहुंचे सत्याग्रह जुलूस निकाला 2 दिसंबर को गिरफ्तार कर लिया गया और आपातकाल में जेल भेज दिया गया। वह कहते हैं कि उस समय आदमी से बात करते हुए भी यह घबराहट होती थी कि न जाने कब किस बात पर गिरफ्तारी हो जाए। डॉ रमेश सिंह राघव ने आपातकाल शीर्षक से एक लेख में लिखा है- 'तानाशाही के इस माहौल में देश के कुछ जागरूक नागरिकों ने इसके विरोध में अपनी आवाज उठाई। इंदिरा की जागीर नहीं है हिंदुस्तान हमारा है आदि नारे लगाते हुए वह सत्याग्रह कर जेल गए। बिना मुकदमे, अनिश्चित काल के लिए जेल में डाले जाने से भी ना डर कर लाखों नागरिकों ने सत्याग्रह किया। जिनमें स्कूलों के विद्यार्थी, महिलाएं, किसान, मजदूर सभी श्रेणी के लोग सम्मिलित थे।'

देश विदेश में इंदिरा सरकार के विरुद्ध बने वातावरण, खुफिया एजेंसियों द्वारा इंदिरा कांग्रेस के पुनः चुनाव जीतकर सत्ता में लौटने की शत प्रतिशत संभावना का अनुमान आदि के फलस्वरूप चुनाव की घोषणा की और चुनाव पूर्व 21 मार्च 1977 को आपातकाल समाप्ति की घोषणा कर दी। देश की जेलों में बंद सत्याग्रही रिहा हुए और 1977 में देश में पहली गैर कांग्रेसी सरकार श्री मोरारजी देसाई के नेतृत्व में बनी। कांग्रेस को आपातकाल की ज्यादतियों का खामियाजा हार के रूप में भुगतना पड़ा।

डॉ. अनिल शर्मा 'अनिल' धामपुर। 



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