मधु महेंद्र राही
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Gemini said
इमेज image_28d2e7.jpg में दिए गए समाचार पत्र के लेख का पूरा टेक्स्ट नीचे दिया गया है:
... और अनंत यात्रा पर निकल गये राही जी
● अनिल शर्मा 'अनिल'
'बोल प्रिये, तेरा देश कहां है?' 'प्रिये के देश की तलाश करने को अनंत यात्रा की राह पर 'राही' जी ऐसे चले जाएंगे लगता नहीं था। 2 नवम्बर को जब अचानक राही जी की भौतिक संसार से विदाई की खबर मिली तो विश्वास ही नहीं हुआ।
श्री मधु महेन्द्र राही ने साहित्य जगत में अपनी अलग पहचान बनायी थी। साहित्य की कोई भी विधा ऐसी नहीं जिसके विपुल भण्डार में राही जी की रचनाएं न हों। नाटक, उपन्यास, कहानी, गीत, मुक्तक, गजल, दोहे, हास्य व्यंग्य, नयी कविता सभी में तो राही जी की उपस्थिति है।
अनंत आकाश में आकाशवाणी के माध्यम से फैले राही जी के शब्द विचरण कर रहे हैं। राही की सादगी और स्पष्टवादिता हर दिल में जगह बनाए हुए है। उनकी रचनाओं में वे हैं और उनके व्यक्तित्व में उनकी रचनाएं थीं। राष्ट्रीय स्तर पर चर्चित होने के बाद भी गुरुजी में वह अहं भाव कहीं नहीं था जो आजकल जरा सी चर्चा मिलने पर साहित्यकारों में आ जाता है।
व्यक्तिगत रूप से राही जी का मुझे भरपूर स्नेह मिला। प्रोत्साहन व सार्थक वार्ता करने के पक्षधर राही जी ने हमेशा मार्गदर्शन किया। हमारे निवास पर हुई विभिन्न काव्य गोष्ठियों में राही जी सदा शामिल रहे। उनकी रचना 'बोल प्रिये, तेरा देश कहां है?' छायावादी युग की रचना है, जिसे वह बहुत पसंद करते थे।
उनकी रचनाओं में प्राकृतिक प्रतिबिम्ब बहुत मिलते हैं। आज जब राही जी हमारे बीच नहीं तो उनके बारे में लिखते समय शब्द नहीं मिल पा रहे हैं। राही जी की स्पष्टवादिता का एक उदाहरण यह है कि चिंगारी में एक आलेख श्रृंखला में राही जी की वार्ता प्रकाशित करने को जब मैं उनसे मिला था तो उन्होंने कहा था- 'क्या करोगे मुझ पर लिखकर, कुंतलों लिखा पर क्या मिला?' यह कहकर मुस्कुरा दिये और दो लाइनें कह दीं-
सोखने को रह गया समंदर शराब का/बस आखिरी पन्ना हूं मैं अपनी किताब का।
उस लेख का शीर्षक भी हमने ये ही पंक्तियां दी थीं। कितनी सहजता से अपनी बात दो पंक्तियों में उन्होंने कह दी।
उनके कितने ही नाटक, कहानी, गीत, भजन, समूहगान आकाशवाणी से प्रसारित हुए। दूरदर्शन पर एक स्क्रिप्ट स्वीकृत हुई तो अधिकारियों ने राही जी को कहा पायलट एपिसोड बनाकर जमा करो। उन्होंने कह दिया 'लेखक हूं, पूंजीपति नहीं। कहां से लाऊं पैसा नाटक शूटिंग के लिए।'
उनमें कट्टरपन नहीं था। 'अलशिवम' संस्था बनायी तो गंगा-जमुनी प्रोग्राम कराये। भजन लिखे तो मसीही गीत व देशगान भी लिखे। राष्ट्रप्रेम से ओतप्रोत उनकी रचना की पंक्तियां दृष्टव्य हैं- भक्त और भगवान का आश्रम, भूमि देव सुधीर की/देश मेरा है राम का मंदिर कुटिया दास कबीर की।
सदा मुस्कुराते रहने वाले राही जी का मानना था कि आंखों से बहते आंसू जीवन जल को कम करते हैं। आंसू बहाना आयु कम करना है- अश्कों के खारे पानी को आंखों में न बढ़ने देना/राही ये सूखेगा लेकिन कश्ती-कश्ती तेरी डुबोकर।
श्री मधु महेन्द्र 'राही' ने ठा. निहाल सिंह व श्रीमती स्वरूप देवी के आंगन में 15 जुलाई 1946 को प्रथम सांस ली और 2 नवम्बर 05 को अंतिम सांस के साथ संसार को छोड़ प्रिये के देश चले गये। वह कहते भी थे- नाभि प्रदेश से देव कुसुम की/भीनी-भीनी गंध छलकती/बदले में एक झलक के तेरी/छोड़ दे राही दुनिया सस्ती/ले चल मुझको धीरे-धीरे तेरा सरस स्वदेश जहां है।
धीरे-धीरे प्रिये के देश जाने वाला राही, हमारे बीच रहेगा स्मृतियों में, अपनी रचनाओं में। विनम्र श्रद्धांजलि।
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