राधा कृषण भक्ति धारा

 



जनपद में बहने लगी राधा कृष्ण भक्ति की धारा
बिजनौर। जनपद शैव मतावलंबियों की भूमि रही है परंतु अब इसमें राधा कृष्ण की भक्ति और प्रेम की धारा तेजी से प्रभाहित होने लगी है।बिजनौर जनपद के धर्मनगरी में रहने वाले बंगाली प्रतिवर्ष गौरंग चेतन्य महाप्रभु द्वारा शुरू किए गए राधा कृष्ण के अखण्ड कीर्तन की धारा को प्रवाहित करने में लगे है। प्रतिवर्ष यहां तीन दिन तक अखण्ड कीर्तन चलता रहता है। 
 हाल में यहां चले अखण्ड संकीर्तन के दौरान इनकी कला प्रतिमा को देखने और समझने का मौका मिला। राधा कृष्ण प्रांगण में विभिन्न टोलियों ने दो दो घंटे संकीर्तन में मग्न रहकर लोगों को भाव विभोर कर दिया। कलाकर कहते है कि मंदिर के समक्ष जब वे पहुंचते है  कि वे वृदांवन पहुंच गए है और फिर राधा कृष्ण के प्रेम में इतने तल्लीन हो जाते है कि उन्हें अपनी सुध नहीं रहती। एक टोली को दो घंटे संकीर्तन करना होता है किंतु उन्हें पता भी नहीं चलता कि यह अवधि कब बीत गई। दूसरी टोली के आने पर उन्हेंं समय का अहसास होता है।
धर्मनगरी के रहने वाल सत्य रंजन विश्वास बताते है कि लगभग ६०० वर्ष पूर्व गौरंग महाप्रभु ने राधा कृष्ण के अखण्ड संकीर्तन की शुरूआत की। वे इसमें इतने मस्त हो जाते थे कि उन्हें दुनिया का ध्यान नहीं रहता था। वे बताते हैं कि गौरंग राधा कृष्ण के प्रेम में रंग कर चेतन्य महाप्रभु हो गए।
वे बताते हैं कि उनके यहां आठ से १० टोलियां है जो हरी कीर्तन करती है। वे कहते है कि उन्होंने बचपन में नृत्य गायन वादन सीखा। और वह नई पीढ़ी को तैयार करने में लगे है। चार से पांच वर्ष के बच्चों को वह प्रशिक्षण देते है यही कारण है कि उनके गांव के स्कूल में बच्चे जिला स्तरीय कार्यक्रम में प्रथम स्थान प्राप्त करते रहते है। बंगाली समुदाय अपने बच्चों को गायन वादन एवं नृत्य में निपुण बनाकर अपनी कला संस्कृति से जुडे रहना चाहते है। वे बताते हैं कि जब कार्यक्रम का समय आता है तो उनके गांव की टोलियंा दो दो माह तक प्रतिदिन कई कई घंटे अभ्यास करती रहती है।  टाोलियों में पुरूषों के साथ  महिलांए भी होती हैँ।
वे बताते हे कि हरे रामा हरे कृष्णा के गायन के साथ टोलियां राधा कृष्ण की भक्ति पर आधारित राग,रागनियां प्रस्तुत करती है। दिन के प्रहर के हिसाब से अलग अलग राग और सुर होते है।
 अखण्ड संकीर्तन के बारे में वह बताते है कि यह कार्यक्रम ३६ हजार देवी देवताओं के आह़वान और आमंत्रण से प्रांरभ होता है। आमंत्रण के कार्यक्रम समाप्ति के समय दो महाराज को मंदिर के दोनों ओर जाप के लिए बैठा दिया जाता है। ये निरंतर जाप करते है।
इसके बाद शुरू होता है अखण्ड संकीर्तन। इस संकीर्तन को एक टोली दो घंटे तक प्रस्तुत करती है। इसमें महिला पुरूष कलाकार मृदंग और मंजीरो  और विभिन्न  वाद्य यंत्रों ं पर नृत्य संगीत प्रस्तुत करते है। वे अपनी प्रस्तुति में इतने भाव विभोर हो जाते है कि उन्हें अपना पता ही नहीं रहता। कभी हंसते हैं तो रोते भी हैं। गाते तो रहते  ही हैं। 
वे बताते है कि यह संकीर्तन निर्धारित २४ से ४८ घंटे की अवधि में निरंतर चलता रहता है। टोली कहीं संकीर्तन में गलती न कर दे इसलिए महाराज लगातार पाठ करते रहते है।  संकीर्तन बीच में रूकता नही।ं निर्धारित समय पर दूसरी टोली एक साइड से प्रवेश कर संकीर्तन स्थल  और मंदिर की परिक्रमा कर पहली टोली की जगह ले लेती है। और पहली टोली नृत्य संगीत प्रस्तुत करती   बाहर चली जाती है।
यहां कार्यक्रम में भाग लेने आए हरिद्वार की टोली सरजीत सिंह राय कहते है कि उन्होंने बचपन से अभ्यास किया। वह संकीर्तन मेंं मृदंग बजाते है। यह उन्होनें बचपन में कतकत्ता में सीखा। उनकी पत्नी माधुर भी टोली में है वह भी उनके साथ ही नृत्य संगीत प्रस्तुत करती है।
वे कहते है कि हम कार्यक्रम प्रस्तुत करते हुए ये महसूस करते है कि वे वृदांवन में है और अपने को राधा कृष्ण की भक्ति एवं गायन में पूरी तरह लगा देते है। फिर उन्हें कुछ पता नहीं चलता। सिर्फ याद रहता है तो यह कि वे अपने भगवान  को पुकार रहे है। पूजा अर्चना कर रहे ।
माधुरी धर्मनगरी के पास ही घासीवाला कालोनी की रहने वाली है और अब पति के साथ हरिद्वार में रहती है। माधुर और उनके पति ज्यादा शिक्षित नहीं किंतु कला, संगीत, नृत्य में उनक कोई सानी नहीं। जब वे कार्यक्रम प्रस्तुत कर रहे होते है तो बड़े बड़े कलाकार उनकी प्रतिभा के सामने नत मस्तक हो जाते है। इनका कहना है कि अब वे अपने बच्चों को तैयार करने में लगे है। 
अशोक मधुप


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