बिजनौर में सात साल से सक्रिय हैं आतंकवादी
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(अशोक मधुर)
बिजनौर, ४ अप्रैल। बिजनौर-मुजफ्फरनगर की सीमा पर उग्रवादियों द्वारा बस यात्रियों के मर्मांतक नरसंहार का प्रयास इस क्षेत्र की पहली उग्रवादी घटना नहीं है। बीते सात सालों से क्षेत्र में आतंकवादी सक्रिय हैं और आतंकवादी घटनाएं होती रही हैं।
जनपद बिजनौर में रक्षा मंत्रालय की पुनर्वास योजना के अन्तर्गत जनपद की बंजर जमीन १९४७ में देकर यहां सिखों को बसाया गया था। इन सिखों ने जनपद के विकास में महत्वपूर्ण योगदान दिया। जनपद की बंजर तथा बेकार पड़ी भूमि को खेती योग्य बनाया। आज इस जमीन से काफी अच्छी पैदावार भी ली जा रही है। हालांकि इन फार्म हाउसों पर रहने वालों के संबंध और नई रिश्तेदारियां आमतौर पर बन गये हैं। हालांकि इन फार्म हाउस पर रहने वालों के संबंध और रिश्तेदारियां पंजाब से जुड़े रहे। इन्हीं संबंधों के चलते उग्रवादियों का यहां आना-जाना जारी रहा। पंजाब में दबाव बढ़ता तब ये भाग कर यहां आ जाते और कुछ दिन विश्राम करके चले जाते। यह कहना गलत न होगा कि जनपद के कई फार्म हाउस इनकी शरण स्थली बन गये। किन्तु उग्रवादियों की गतिविधि प्रकाश में नहीं आयी। हालांकि पुलिस को इस मामले में सफलताएं भी मिलीं।
जनपद में सबसे पहली उग्रवादी घटना १९८३ में थाना अफ़ज़लगढ़ में हुई। कादराबाद स्थित सिंडिकेट बैंक की शाखा से उग्रवादी लगभग ७० हजार रु. लूट ले गये थे। बाद में स्वर्ण मंदिर से कल्यात आतंकवादी भुट्टो का पत्र आया कि उ.प्र. की पुलिस बुद्धू है। वह कुछ न कर सकी और वे सिंडिकेट बैंक की ब्रांच को आराम से लूटकर पंजाब आ गये। उसने यह भी लिखा था कि बैंक लूटकर वे घोड़ा-बुग्गी से अपने शरण स्थल तक गये। अगले दिन कादराबाद से ही बस में बैठे। बस अड्डे पर पुलिस के दो सिपाही तैनात थे। किन्तु वे आराम फरमा रहे थे। वे चाहते तो हमें पकड़ सकते थे, किन्तु उनके बुद्धूपन के कारण हम आराम से लूट करके चले आये।
जुलाई ८५में दूसरी घटना उस समय प्रकाश में आयी, जब कालागढ़ बांध से ऊपर ग्राम कुआंखाडा की पहाड़ी पर हथियारों से लैस कुख्यात उग्रवादी सेवा सिंह के ट्रेनिंग कैम्प का पता चला। इस ट्रेनिंग कैम्प में आपस में गोली चल जाने से भूपेन्द्र सिंह नामक युवक घायल हो गया था। बाद में भूपेन्द्र पकड़ा गया था और सेवा सिंह भाग गया।
इस घटना के बाद आई.जी. ज़ोन की देखरेख में शिवालिक आपरेशन चला तथा इन फार्म हाउसों की सघन जांच हुई। आग्नेयास्त्रों का सत्यापन हुआ, जिनमें अनेक अनियमिततायें पाई गईं। कई लोगों के लाइसेंस यहां रद्द थे, किन्तु उनकी सूचना यहां नहीं थी। लगभग दो दर्जन आग्नेयास्त्र सत्यापन न होने के कारण आज भी सम्बद्ध थानों में जमा हैं।
८९ के बाद भी अनेक छिटपुट घटनायें भी प्रकाश में आयीं। रेहड़ थाना क्षेत्र में संत जरनैल सिंह भिंडरांवाला के भाषणों के कैसेट मिले। रामपुर के पुलिस अधीक्षक के नेतृत्व में मारे गये छापे में इस थाना क्षेत्र के एक फार्म हाउस से कई स्टेनगन तथा राइफलें भी मिलीं।
सितंबर ८९ में बिजनौर में एन.आई.ए. के एस.एस.आई. रामप्रसाद ने दो युवक पकड़े। इनमें एक कुख्यात आतंकवादी बलजीत सिंह था। वह पंजाब में अनेक घटनाओं- नहर काटने, सिनेमा में बम विस्फोट आदि में शामिल था। बलजीत ने हालांकि पुलिस को छकाऊ के दौरान बताया था कि वह चंडीगढ़ से विमान को अपहरण कर ले जाने वाले दलजीत सिंह का भाई है, किन्तु पुलिस अधिकारियों ने इसके बारे में पंजाब से जानकारी आने से पूर्व ही छोड़ दिया। बाद में पता चला कि यह तो कुख्यात आतंकवादी था।
२८ सितंबर, ८८ को हल्दौर में पंजाब नेशनल बैंक को लूटने का प्रयास किया, किन्तु बैंक कर्मचारियों की हड़ताल के कारण बैंक का कारोबार बंद था, जिस कारण यह कामयाब नहीं हो सका। बाद में इस लूट के जिम्मेदार अमरीक सिंह उर्फ बिल्ला तथा कुलजीत सिंह उर्फ छिन्दा को रामपुर पुलिस ने पकड़ा। इनकी निशानदेही पर उसने गन्ना क्षेत्र से ए.के. ४७ राइफल भी बरामद की।
मंडावर की दो अप्रैल को क्षेत्र में हुई घटना नई नहीं है, ऐसा भी नहीं है कि इस प्रकार की घटना का किसी को अंदेशा नहीं था। कई दिन पूर्व से पुलिस अधिकारियों को आगाह भी कर दिया गया था कि कोई भी घटना बिजनौर क्षेत्र में घट सकती है, क्योंकि कई फार्म हाउस उनके लिए पहले ही अच्छे शरण स्थल रहे हैं। दूसरे शब्दों में कहें तो आतंकवादियों को देखकर लगने लगा था कि कोई बड़ी घटना हो सकती है।
दूसरी ओर पुलिस अधीक्षक ने आज बुलाई गई थानाध्यक्षों एवं अधिकारियों की बैठक में उग्रवादियों से निपटने आदि के बारे में व्यापक निर्देश दिये।
यह क्राइम मीटिंग प्रत्येक माह की पांच तारीख को बुलाई जाती है किन्तु इस बार एक दिन पहले ही बुला ली गई।
बैठक में सभी थानाध्यक्षों को पूरी तरह अलर्ट रहने को कहा है। रेहड़ तिराहे तथा भूतपुरी से जशपुर जाने वाले तिराहे पर पी.ए.सी. की स्थाई पोस्ट बना दी गयी है। बैराज पर भी पी.ए.सी. की स्थाई पोस्ट बनायी जा रही है।
पांच अप्रैल १९९० अमर उजाला

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