कुर्रतुलऐन हैदर: जिन्हें मौलाना आजाद ने बनाया था पाकिस्तानी से हिंदुस्तानी
कुर्रतुलऐन
हैदर के अफसाने, कहानियां और उपन्यास पढ़ते जाइए और आप इसी नतीजे पर पहुंचेंगे कि उनकी
रचनाओं का केंद्र इंसान है
Updated On: Aug 21, 2017 10:41 AM Nazim Naqvi
हिंदुस्तानी साहित्य में दो
आपाओं का जिक्र हुए बिना बात पूरी नहीं होती. उर्दू में ‘आपा’ बड़ी बहन
को कहते हैं. एक हैं ‘इस्मत आपा’ यानी इस्मत चुगताई और दूसरी आपा हैं, ‘ऐनी आपा’ अर्थात
कुर्रतुलऐन हैदर. ऐनी आपा, इस्मत आपा से 11
बरस छोटी थीं. अभी कुछ दिनों पहले इस लेखक ने
इस्मत चुगताई की यादें आपके साथ साझा की थीं, आज बात कुर्रतुलऐन हैदर की.
कोशिश करूंगा कि ऐनी आपा पर
बात करूं साथ ही साथ उनकी लेखनी से निकले हुए हीरे-मोती भी आपको दिखाता चलूं.
लेकिन पहले एक बहुत ही संक्षिप्त परिचय, उनके लिए, जो लोग ‘ऐनी-आपा’ से जरा भी परिचित नहीं. ऐनी आपा के नाम से प्रसिद्ध
कुर्तुल एन हैदर पूरी दुनिया घूमी। ऐनी आपा के नाम से प्रसिद्ध
कुर्तुल एन हैदर पूरी दुनिया घूमी। कुर्रतुलऐन
हैदर का जन्म उत्तर प्रदेश के शहर अलीगढ़ में 1926 में हुआ.
उनके पिता 'सज्जाद
हैदर यल्दरम' उर्दू के जाने-माने लेखक होने के साथ-साथ ब्रिटिश शासन के राजदूत की
हैसियत से अफगानिस्तान, तुर्की इत्यादि देशों में तैनात रहे और उनकी मां 'नजर' बिन्ते-बाकिर
भी उर्दू की लेखिका थीं.
वह बचपन से रईसी और
पाश्चात्य संस्कृति में पली-बढ़ीं. उनकी प्रारंभिक शिक्षा लखनऊ में हुई फिर अलीगढ़
से हाईस्कूल किया. लखनऊ लौटीं और बी.ए. और एम.ए. लखनऊ विश्वविद्यालय से किया.
विदेश गईं और लंदन के हीदरलेस आर्ट्स स्कूल से भी एक डिग्री ली.
विभाजन
के बाद चली गईं थीं पाकिस्तानी
1947 में विभाजन के बाद उनके भाई-बहन और दूसरे रिश्तेदार पाकिस्तान चले
गए. लखनऊ में अपने पिता की मौत के बाद वो भी अपने बड़े भाई मुस्तफा हैदर के साथ
पाकिस्तान चली गईं. फिर वहां से 1951
में वे लंदन चली गईं. यहां एक स्वतंत्र लेखक व
पत्रकार की हैसियत से ‘बीबीसी’ और ‘दि टेलीग्राफ’ से जुड़ीं.
1956 में जब वे भारत भ्रमण पर आईं तो उनके वालिद के गहरे दोस्त, मौलाना
अबुल कलाम आज़ाद ने उनसे पूछा कि क्या वे भारत आना चाहतीं हैं? कुर्रतुल
ऐन हैदर के हामी भरने पर उन्होंने कोशिश की और आखिरकार वो फिर हिंदुस्तानी होकर
मुंबई में रहने लगीं. उन्होंने ता-उम्र विवाह नहीं किया. 21 अगस्त 2007 को, 80 वर्ष की
उम्र में उन्होंने आखिरी सांस ली.
कुर्रतुलऐन हैदर का जन्म
उत्तर प्रदेश के शहर अलीगढ़ में 1926
में हुआ.
उनके पिता 'सज्जाद
हैदर यल्दरम' उर्दू के जाने-माने लेखक होने के साथ-साथ ब्रिटिश शासन के राजदूत की
हैसियत से अफगानिस्तान, तुर्की इत्यादि देशों में तैनात रहे और उनकी मां 'नजर' बिन्ते-बाकिर
भी उर्दू की लेखिका थीं.
वह बचपन से रईसी और
पाश्चात्य संस्कृति में पली-बढ़ीं. उनकी प्रारंभिक शिक्षा लखनऊ में हुई फिर अलीगढ़
से हाईस्कूल किया. लखनऊ लौटीं और बी.ए. और एम.ए. लखनऊ विश्वविद्यालय से किया.
विदेश गईं और लंदन के हीदरलेस आर्ट्स स्कूल से भी एक डिग्री ली.
विभाजन
के बाद चली गईं थीं पाकिस्तानी
1947 में विभाजन के बाद उनके भाई-बहन और दूसरे रिश्तेदार पाकिस्तान चले
गए. लखनऊ में अपने पिता की मौत के बाद वो भी अपने बड़े भाई मुस्तफा हैदर के साथ
पाकिस्तान चली गईं. फिर वहां से 1951
में वे लंदन चली गईं. यहां एक स्वतंत्र लेखक व
पत्रकार की हैसियत से ‘बीबीसी’ और ‘दि टेलीग्राफ’ से जुड़ीं.
1956 में जब वे भारत भ्रमण पर आईं तो उनके वालिद के गहरे दोस्त, मौलाना
अबुल कलाम आज़ाद ने उनसे पूछा कि क्या वे भारत आना चाहतीं हैं? कुर्रतुल
ऐन हैदर के हामी भरने पर उन्होंने कोशिश की और आखिरकार वो फिर हिंदुस्तानी होकर
मुंबई में रहने लगीं. उन्होंने ता-उम्र विवाह नहीं किया. 21 अगस्त 2007 को, 80 वर्ष की
उम्र में उन्होंने आखिरी सांस ली.
‘स्त्रियों
की ‘इंटेलीजेंस सर्विस’
इतनी तेज होती है कि खुफिया विभाग का विशेषज्ञ भी
उसके आगे पानी भरे, और फिर मेरी कहानी तो इतनी दुःख भरी है. मेरी दशा कोई उल्लेखनीय
नहीं. गुमनाम हस्ती हूं, इसलिए किसी को मेरी चिंता नहीं, खुद मुझे भी अपनी चिंता
नहीं. रेहाना, सईदा, प्रभा और ये लड़की जिसकी आंखों में मुझे देखकर डर पैदा हुआ, शायद वो
मुझसे ज्यादा अच्छी तरह मुझसे परिचित हों!.’ (कहानी ‘पतझड़ की
आवाज’ से)
‘औरत की कहानी’ पुस्तक की भूमिका में सुधा अरोड़ा लिखती हैं- ‘उर्दू और
हिंदी में रुकैय्या सखावत हुसैन,
सुभद्रा कुमारी चौहान, शिवरानी
देवी, सुमित्रा कुमारी सिन्हा, महादेवी वर्मा, इस्मत
चुगताई और कुर्रतुलऐन हैदर ने अपने समय में औरतों की सामाजिक स्थिति पर कहानियों
या लेखों के रूप में अपने बयान दर्ज किए हैं.’ ये बात सच लगती है क्योंकि ‘अगले जनम
मोहे बिटिया न कीजो’ के बिना महिला-विमर्श अधूरा रह जाता है.

साझी
विरासत की लेखिका
कुर्रतुलऐन हैदर
उर्दू-फिक्शन का रौशन नाम हैं. फिक्शन लेखन एक तरह से उनको विरासत में मिला था.
मां-बाप दोनों की दिलचस्पी फिक्शन से थी. लेकिन इस बड़ी विरासत की वारिस होने के बावजूद
भी उनकी पहचान और शोहरत में उनकी समझ की गहराई, इंसान-दोस्ती, वतन-परस्ती
और पुरानी सांस्कृतिक धरोहर से उनका जो लगाव था, उन सबका बड़ा हाथ था.
‘एक और जर्मन मेरी तरफ आया और मुझसे कहने लगा ‘मैं वो
जर्मन आर्टिस्ट हूं जो मुंबई में चंद रोज आपके यहां मेहमान रहा था. इंडिया से जाकर
मैंने आपको वियतनाम से खत भी लिखा था’, ‘हां मुझे अच्छी तरह याद है, लेकिन
मैंने तो तुमको वियतनाम ही में वो खत लिखने के बाद एक इत्तेफकिया (अकस्मात) गोली
का निशाना बनाकर मार दिया था,
अपने एक अफसाने में.’ (कहानी ‘आवारा-गर्द’ से)
‘साझी-विरासत’ उनका पसंदीदा विषय था. इसके कई कारण हो सकते हैं. एक तो मुल्क का
विभाजित होना, दूसरा उनके पुरखों ने जो कुछ सांस्कृतिक-विरासत छोड़ी थी, उसकी
हिफाजत उनकी नस्ल ने नहीं की,
इसका गम उन्हें बहुत था.
वो लिखती हैं- ‘इस
मिट्टी पर बैठ कर, उस पुरानी नदी के किनारे, पुराने इमामबाड़े के साए में, जबकि
सूरज आहिस्ता-आहिस्ता डूबता जा रहा है, अपना, और अपने
पुरखों का मर्सिया लिखूंगी. क्योंकि हम नालायक साबित हुए, हमारी
नस्ल उस भार को न उठा सकी जो अब्बा मियां तुमने और तुम्हारे साथियों ने हमें सौंपा
था. हम तुम्हारे मानकों पर जो इंसानियत, शराफत और तहजीब के मानक थे, पूरे
नहीं उतर सके और इसलिए अब हम जा रहे हैं.’
कुर्रतुलऐन हैदर ने बहुत ही
छोटी सी उम्र, महज 6 साल में ही लिखना शुरू केर दिया था. ‘बी-चुहिया’ उनकी
पहली प्रकाशित कहानी थी. 17-18 साल की हुईं तो एक पूरा संकलन ही (शीशे का घर) प्रकाशित हो गया. दो
साल बाद 1947 में पहला उपन्यास ‘मेरे भी सनमखाने’
प्रकाशित हुआ.
साझी विरासत का एक और नमूना
देखिए जब वो अपने शहर लखनऊ को याद करते हुए लिखती हैं- ‘लखनऊ की
सरजमीन में एक तरफ लोग जहां राधा-कन्हैया की रास-लीला में शामिल होते तो दूसरी तरफ
मुहर्रम के जुलूस में बराबर शरीक होते. जहां रात को ढोलक की थाप पर मुस्लिम घरों
से औरतों की आवाजें आतीं ‘भरी गगरी मोरी धरका लइ श्याम.’ या जब लडकियां अपनी गुड़ियों
की बरात निकालतीं तो बार-बार ये नारा लगता ‘हाथी घोडा पालकी, जय
कन्हैया लाल की’. एक तरफ हिंदू रईस इमामबाड़े बनवाते, जैसे ‘झाओ लाल
का इमामबाड़ा, राजा ग्वालियर का इमामबाड़ा तो दूसरी तरफ असिफुद्दौला होली खेलते और
बसंत मनाते.’
लेकिन विभाजन ने उस
साझी-विरासत कि जिसको बनने में सदियां लगी थीं, चंद लम्हों की सियासत ने
उसमें ऐसे नफरतों के बीज बोये कि लाल खून भी हरा और भगवा नजर आने लगा. इन सारी
स्थितियों ने कुर्रतुलऐन हैदर पर बहुत बुरा असर छोड़ा. और यही खराब असर उनकी लेखनी
में जा-ब-जा दिखाई देता है, चाहे वो टूटती हुई तहजीब हो, वक्त का बदलाव हो, इंसान और
वक्त की अहमियत हो या संवेदनाओं के बेकद्री हो.
‘हम गए थे एक आया की तलाश में, कलकत्ते में... पहुंच गए एक
जगह सोनागाछी... वहां एक बहुत बदनाम इलाका है तवायफों का... वहां दहलीज पर एक लड़की
बैठी हुई... सुर्ख रंग की साड़ी पहने, सफेद रंग उसका, बहुत
प्यारी शक्ल उसकी. वो हम लोगों को देखकर बार-बार बहुत अदब से नमस्कार कर रही थी.
वो लड़की मुझे कभी नहीं भूली... कि कहां से आई थी... कहां बैठी थी... तो उसपर मैंने
अफसाना ‘तलाश’ लिखा.’
इंसानी
जज्बातों की लेखिका
उनके अफसाने, कहानियां
और उपन्यास पढ़ते जाइए और आप इसी नतीजे पर पहुंचेंगे कि उनकी रचनाओं का केंद्र
इंसान है. वह इंसान से ज्यादा अहमियत किसी को नहीं देती हैं. उनका खयाल है कि
इंसान आज के बाजारू दौर में अकेला पड़ गया है. वो दूसरे रिश्तों को भूल बैठा है.
खुदगर्जी, और मतलब-परस्ती,
अवसरवादिता में पूरी तरह डूब गया है.
‘इंसान इन्फेरादी (व्यक्तिगत) तौर पर कितना सीधा-सादा और नेक है और
इज्तेमाई (सामूहिक) हैसियत में दरिंदा बन जाता है.’
उनकी रचनाओं में पकिस्तान
और उसका चित्रण दीवार में चुनी गयी एक बेढंगी ईंट की तरह नजर आता है और आंखों को
चुभता है. उनका एक अफसाना ‘कैक्टस लैंड’ है जिसमें उन्होंने पाकिस्तान को कैक्टस-लैंड कहकर पुकारा है. उनकी
कहानियों का संकलन ‘शीशे का घर’ की तमाम कहानियां विभाजन के दौर की हैं और इसमें हर जगह विभाजन के
जख्म रिसते हुए नजर आते हैं.
‘आग का दरिया’ विभाजन पर लिखा हुआ उनका कालजयी उपन्यास है जो न सिर्फ धरती का
बंटवारा बल्कि बल्कि तहजीबों की तकसीम को भी अपनी परिधि में लेता है. एक ऐसा
विभाजन जिससे खून के रिश्ते और इंसान दोस्ती के रिश्ते भी टूट गए.
उर्दू जबान की मधुरता लिए
कथा-साहित्य की रसधारा को अपनी संवेदनाओं से वेग देती हुई ऐनी आपा भारतीय साहित्य
जगत पर अपनी अमिट छाप छोड़ गयी हैं. जिसे पढ़े बगैर हिंदुस्तानी साहित्य का सफर
अधूरा रह जाता है।
−−−−−−−−−−
जन्म 20 जनवरी
कुर्रतुल
ऐन हैदर : उस माला का एक मनका जो अमीर खुसरो और कबीर जैसे मनकों से बनी है
कुर्रतुल ऐन हैदर मानती थीं कि मज़हबी समस्याओं का हल मिली-जुली
तहज़ीब में ही है और वह किसी अखबार की सुर्ख़ी नहीं जो दूसरे दिन ही भुला दी जाए
अनुराग भारद्वाज | 21 अगस्त 2021
दिन… नहीं पता. महीना… वो भी नहीं पता. साल… शायद 1960.
जगह… लन्दन या पाकिस्तान का
कोई एक शहर… एक बड़े हॉल में दो लोगों की बातचीत.
‘आपा आपका ख़त आया है.’
‘किसका है यासीन?’
‘अब आपने इतना भी नहीं पढ़ाया कि मैं अंग्रेजी समझ लूं. हां, खत के ऊपर तीन शेरों के मुंह वाली तस्वीर है.’
‘इधर लाएं, जल्दी. और एक ब्लैक कॉफ़ी बना ले आइये.’ वे शायद समझ गईं थीं.
वे ख़त पढ़ते-पढ़ते मुस्कुरा रही हैं.

कहां से है, ऐनी आपा और ऐसा क्या है
जो आप मुस्कुरा रही हैं’ यासिन ने सवाल पहले दागा, कॉफ़ी बाद में दी.
ऐनी आपा: लिफ़ाफ़े पर तीन शेरों वाली जो तस्वीर
है ना, ये दरअस्ल चार शेर हैं और ये निशान-ए-हिंदुस्तान
है. मेरी हिंदुस्तान बसने की दरख़्वास्त मंज़ूर कर ली है वहां की सरकार ने, यासीन मियां.
यासीन: ‘पर क्यूं जा रही हैं वहां
आपा? तक़सीम के वक़्त वहीं से तो आयी थीं आप अपने
भाईजान के साथ. और फिर ये मुसलमानों का मुल्क़ है. मैंने तो सुना है कि आपका
ख़ानदान बुख़ारा से ताल्लुक रखता है.’
आपा: ठीक ही सुना है. हमारे बुजुर्ग सैय्यद
जलालुद्दीन बुख़ारी 1236 में बुख़ारा से हिंदुस्तान गए थे. उन दिनों
दिल्ली में रज़िया सुल्तान गद्दीनशीं थीं. बुखारी साहब तबियत के सूफी थे, लिहाज़ा उन्हें दिल्ली सल्तनत की सरपरस्ती मिल गयी थी. फिर कुछ
वक्त बाद….’तशरीफ़ रखिये मियां’… ‘अरे वहां नहीं…
कितनी बार कहा है कि सोफे
पर बैठा करें, नीचे क्यूं गद्दी जमा लेते हैं?
यासीन: ‘आपने जवाब नहीं दिया, आपा, कि वहां जाकर क्यों रहना अब?’
आपा: मेरी किताब ‘आग का दरिया’ पाकिस्तान सरकार को पसंद नहीं आई है.
यासीन: ‘ऐसा क्या लिखा है आपने
उसमें… ?’
ऐनी आपा या कुर्रतुल ऐन हैदर अपने आप से सवाल
करती हुईं, ‘मैंने ऐसा क्या लिख दिया था?’
पश्चिम और हिंदुस्तान की गंगा-जमुनी तहज़ीब का
शानदार संगम कुर्रतुल ऐन हैदर हिन्दुतान के साहित्य में बड़ा दख़ल रखतीं हैं. वह
चाहे इतिहास हो या फिर किस्सागोई या, राजनीति, या दूसरी ज़ुबान के अफसाना-निगारों का उर्दू में तर्जुमा, उनकी लिखी हुई हर चीज अहम् है.
पैदाइश अलीगढ़ (हिंदुस्तान) के एक नामी गिरामी
खानदान में. वालिद सैय्यद सज्जाद हैदर ‘यलदरम’ अंग्रेजी हुकूमत में अफ़ग़ानिस्तान, तुर्की वगैरह के राजदूत
रहे. ‘यलदरम’ के लिए कहा जाता है कि वो
नयी उर्दू दास्तानगोई के पहले जायज़ उस्ताद थे. वालिदा नज़र सज्जाद भी एक मशहूर
अफ़साना निग़ार थीं और उन्हें उर्दू का जेन ऑस्टिन कहा जाता था. जब कुर्रतुल पैदा
हुईं तो घर और आसपास अदीब लोगों का जमघट था.
ऐनी आपा’ ने शुरूआती तालीम लखनऊ
में हासिल की, अलीगढ से इंटर पास किया. बाद में लख़नऊ से ही
बीए और जब 18वां लगा तो अफसानों की उऩकी पहली क़िताब ‘शीशे का घर’ शाया(प्रकाशित) हुई. 19 की होते -होते एमए कर किया और दूसरी किताब ‘मेरे भी सनमख़ाने’
को लोगों ने हाथों-हाथ
लिया . बाद में उन्होंने लंदन के हीदरलेस आर्ट्स स्कूल से भी पढाई की.
कुछ ही महिला साहित्यकार जैसे ऐनी आपा, इस्मत चुग़ताई और अमृता प्रीतम हैं जिन्होंने तकसीम के ग़म को झेला
है और उसपर शिद्दत से लिखा है. ये तो हम मानते हैं कि दंगों-फ़सादों में सबसे
ज़्यादा अगर कोई झेलता है तो औरतें. वे बेवा होती हैं, बाप तो फिर भूल जाता है औलाद के मरने का ग़म वे नहीं भूलतीं. और
फिर कहे जाने वाले मर्द के हाथों….
चुनांचे, इनकी ग़मबयानी मंटो, राजिंदर बेदी और गुलज़ार
सरीखे अफ़साना-निगारों पर भारी पड़ जाती हैं.
कमलेश्वर ने कभी इस तिकड़ी के लिए कहा था: अमृता
प्रीतम, इस्मत चुगताई और कुर्रतुल ऐन हैदर जैसी
विद्रोहिणियों ने हिंदुस्तानी अदब को पूरी दुनिया में एक अलग स्थान दिलाया है. जो
जिया, जो भोगा या जो देखा, उसे लिखना शायद बहुत मुश्किल नहीं, पर जो लिखा वह झकझोर कर
रख दे, तो तय है कि बात कुछ ख़ास ही होगी. ये कमलेश्वर
की गोलमोल टिप्पणी है क्योंकि उन्होंने अपने द्वारा संकलित ‘शताब्दी की कालजयी काहिनयां’ में एक भी कहानी ऐनी आपा
की नहीं उठाई. ख़ैर, वे कमलेश्वर के परिचय की मोहताज नहीं हैं.
दरअस्ल, जितनी बात कमलेश्वर ने
कही है, कुर्रतुल का परिचय उससे ज़्यादा है. आइये देखें
कैसे?
कुल 20 साल की
उम्र में ही उन्होंने हिंदुस्तान के बंटवारे को देख लिया था. वो बंटवारा जिसने एक
तहज़ीब, चलो संस्कृति कह लेते हैं, के दोफाड़ कर दिए थे. रातों-रात भाई से भाई जुदा ही नहीं हुआ बल्कि
दुश्मन हो गया था. इस बंटवारे ने उनके खानदान को तहस-नहस कर दिया और उनके भाई-बहन
पाकिस्तान चले गए. हिंदुस्तान में रह गईं कुर्रतुल और पिता. जब लखनऊ में पिता चल
बसे तो अपने भाई मुस्तफ़ा हैदर के साथ वो भी पाक़िस्तान चली गयीं.
उन्होंने दुनिया के उतार-चढ़ावों, बंटवारों, कौमों के पतन को नज़दीक से देखा और महसूस किया
और ये उनके अफसानों में झलकता भी है. उनके पात्र दर्शन की बातें करते हैं और अपने
सुख-दुख को इतिहास के दर्पण में तौलते हैं. उन्हें हमेशा लगता था कि मज़हबी
समस्याओं का हल मिली-जुली तहज़ीब में निहां (छुपा) है और उससे ही इसका हल किया
जाए. उन्होंने कहीं लिखा था कि ‘ये तहज़ीब(हिंदुस्तान की) किसी अखबार की सुर्ख़ी
नहीं, जो दुसरे दिन ही भुला दी जाए. यह तहज़ीब दुनिया
के इतिहास का उन्वान (टाइटल) है जो अपनी जगह महफूज़ है और दूसरी तहज़ीबों को अपनी
ओर खींचता है.’ दरअस्ल मेरी नज़र में बात ये है कि कुर्रतुल ऐन
हैदर उस माला का एक मनका हैं जो अमीर खुसरो, तुलसीदास, कबीर जैसे मनकों से बनी है.
बड़ी बेख़ौफ़ बातें करने के लिए वे जानी जाती
रहीं. अयोध्या में बाबरी मस्जिद ढहाये जाने पर उन्होंने तीखी प्रतिक्रिया करते हुए
हिन्दू-मुसलमान दोनों को खरी-खरी सुनाई थी. कबीर को उद्धृत करते हुए उन्होंने कहा
था कि – ’अरे, इन दोउ राह न पाई.’ और कुछ ऐसी ही बात अपनी किताब ‘आग का दरिया’ में भी वे उठाती हैं.
यासीन: आपा, ऐसा क्या था उस किताब में? उसने ये सवाल दूसरी बार पूछा.
‘यासीन मियां,
सुनना चाहते हैं, तो सुनिये, ये हिंदुस्तान कोई लक़ीर के उस पार का मुल्क
नहीं है. ये 4500 साल की तारीख़ (इतिहास) है जिसका फैलाव ख़ैबर
दर्रे से लेकर बंगाल की खाड़ी तक और हिमाले से लेकर हिंद महासागर तक है. इसमें
कारवां आते गए और ये गुलिस्तां बनता गया. आर्य, हुन, कुशान और फिर मुसलमां सब आये और बस गए. राम यहीं हैं, बुद्ध यहीं हैं और यहीं हैं निज़ामुद्दीन औलिया और गरीब नवाज़.
यहां आकर सब कुछ गड्ड-मड्ड हो गया. लकीर खींच कर पाकिस्तान तो बना लिया पर तहज़ीब
वही रखी जो हिंदुस्तान की थी. वही पहनावा, वही खाना, ‘बाजरे के सिट्टे…’
यहां भी गाया जाता है और
वहां भी. अगर हिंदुओं की तहज़ीब कमतर होती तो क्यूं रहीम ‘कृष्ण’ गाते और उनसे पहले खुसरो ‘राम’ गाते? चलो गाया सो गाया, अब भी तो जब बच्चा मुसलमान के घर पैदा होता है, गीत कृष्ण-कन्हैया के गाए जाते हैं, मुसलमान बच्चे मुंह
नीला-पीला किए गली-गली टीन बजाते हैं, साथ-साथ चिल्लाते हैं- ’हाथी घोड़ा पालकी,
जय कन्हैया लाल की.’ मुसलमान पर्दानशीं औरतें जिन्होंने पूरी उम्र किसी गैर मर्द से बात
नहीं की, जब ढोलक लेकर बैठती हैं तो लहक-लहक कर अलापती
हैं – भरी गगरी मेरी ढलकाई तूने, श्याम हां तूने. और सुनो हिंदू तहज़ीब की ख़ास बात ये है कि इसमें
कोई किसी को हुक्म नहीं देता है कि ये करो, वो करो, ये करना ही है. मैंने इस तहज़ीब की बात की थी.’ थोड़ा रुकीं,
फिर – ‘कुछ मुसलमानों का अच्छा है तो कुछ हिंदुओं का और यही मिली-जुली
तहज़ीब इस ‘हिंदुस्तान’ की पहचान है. कुछ महासभाई
यहां थे और कुछ मुस्लिम लीगी वहां. आप तो आ गए अपने पाकिस्तान में, मैं तो आज भी बीच में झूल रही हूं और मुझे सुकून उस धरती पर ही
मिलता है क्योंकि आज भी वहां गंगा-जमुना तहज़ीब है. इसलिए जा रही हूं.’
यासीन सिर्फ सुनता रह गया और उनके पूछने पर बोला, ‘… किताब का उन्वान तो आपने ग़ालिब के शेर से लिया है ना.’ उसकी आंखे चमक उठीं ये कि चलो कुछ तो बोल पाया वो?
‘एक बात बोलूं?
और न भी कहो तो फिर भी
कहे देता हूं, निक़ाह पढ़ लीजिएगा हिंदुस्तान जाकर.’
1960 में आपा अपने ख़्वाबों के हिंदुस्तान चली आयीं. यहां आकर भी
उन्होंने कई बेशकीमती अफ़साने जैसे ’अगले जन्म मोहे बिटिया ना
कीजो’, ‘कलंदर’, ‘कारमिन’, ‘कोहरे के पीछे’
‘सीता हरण’ और नक्सलवाद पर ‘आखिरी शब के हमसफ़र’ लिखा. ‘आख़िरी शब् के हमसफ़र’ महाश्वेता देवी के उपन्यास ‘जंगल के दावेदार’ की याद दिलाता है. साहित्य अकादेमी, ज्ञानपीठ और न जाने कितने
सम्मान उन्हें दिए गये. बस ताउम्र यासीन की शादी वाली बात टालती रहीं. ‘अगले जनम मोहे …’
को एक तरह से उनकी जीवनी
भी कह सकते हैं. औरतों के शोषण पर आधारित इस कहानी की कुछ पंक्तियां लिखने से
अपने-आप को रोक नहीं पा रहा हूं:
कहानी की पहली लाइन – ‘लगाके काजल चले गौसाईं’ भूरे क़व्वाल की गगनभेदी
तान से दीपक की लौ थर्रा उठी. इससे आगे है – ‘अरे
लगाके काजल चले गौसइयां’ भूरे खान का 10 वर्षीय
सुपुत्र शदूदू भी अपनी बारीक़ आवाज़ में गाने लगा.’
इसे अगर ध्यान से पढ़ें तो पाएंगे कि कितने
सलीक़े से इसमें गौसाईं गोसइयां बन जाते हैं. और देखिये आपा भूरे खां और उसके बेटे
से ये क़व्वाली शबे मेराज(वह रात जिसमे पैग़ंबर साहब ईश्वर से मिलने गए थे) के
किस्से पर गवाती हैं!
एक और लाइन: ‘… मैंने
खाला से कहा हो जाओ ईसाई. ख़ुदा न यहां है न वहां, फर्क क्या पड़ता है.’
और आखिरी बात, वो दोहा जिससे उन्होंने
इस कहानी का उन्वान बनाया था:
’औ रे विधाता बिनती करूं तोरी पैयां पडूं बारंबार,
अगले जनम मोहे बिटिया न कीजो चाहे नरक दीजो डार
.’
चलते-चलते
आग का दरिया के बारे में मशहूर शायर निदा
फ़ाज़ली ने यहां तक कहा है कि मोहम्मद अली जिन्ना ने हिन्दुस्तान के साढ़े चार
हज़ार सालों की तारीख़ (इतिहास) में से मुसलमानों के 1200 सालों को अलग करके पाकिस्तान बनाया था. क़ुर्रतुल ऐन हैदर ने नॉवल ‘आग़ का दरिया’
लिख कर उन अलग किए गए 1200 सालों को हिंदुस्तान में जोड़ कर उसे फिर से एक कर दिया.
और एक बात जो बात है कि कमलेश्वर ने उनकी एक भी
कहानी का चयन ‘शताब्दी की कालजयी कहानियां, में नहीं किया पर मगर ध्यान से दखें तो उनकी ‘कितने पाकिस्तान’
का कथानक कुछ-कुछ ‘आग का दरिया’
जैसा ही है.
ऐनी आपा के ‘हिंदुस्तान’ की तमाम बेटियों के उज्जवल भविष्य की कामना के साथ
कुर्रतुलऐन हैदर! जैसा कड़क व दमदार
नाम, वैसा ही लेखन। मुस्लिम महिलाओं पर पाबंदियों की विरोधी व सांझी
संस्कृति की संवाहक कुर्रतुल ऐन हैदर का नाम अमृता प्रीतम व इस्मत चुगताई जैसी
उपन्यासकारों के साथ बेहद सम्मान से लिया जाता है। यह गौरव की बात है कि पद्मश्री, पद्मभूषण, साहित्य अकादमी व
ज्ञानपीठ समेत अनेक पुरस्कारों व सम्मानों से नवाजी गईं हैदर का जन्म अलीगढ़ में
ही हुआ और यहीं से लेखन यात्रा शुरू हुई। स्नातक भी यहीं से किया। महान उपन्यासकार
की पुण्यतिथि पर कौन उन्हें याद नहीं करना चाहेगा...
20 जनवरी 1927 को जन्म
कुर्रतुलऐन हैदर का जन्म 20 जनवरी 1927 को एएमयू के पुराने
रजिस्ट्रार हाउस में हुआ। वालिद सज्जाद हैदर अलदरम एएमयू के पहले रजिस्ट्रार व
बड़े उर्दू लेखक थे। मां नजर सज्जाद हैदर व नानी अकबरी बेगम भी उर्दू लेखिका थीं।
लेखन उन्हें विरासत में मिला और बचपन से ही लिखना शुरू कर दिया।
पर्दा प्रथा की विरोधी
Ads by Jagran.TV
बकौल वरिष्ठ साहित्यकार डॉ.
प्रेमकुमार, एक साक्षात्कार में ऐनी आपा ने बताया कि कक्षा पांच में दाखिल हुईं
तो उस्तानी ने सिर पर दुपïट्टा डालने को कहा। वह अकेली फ्रॉक में थीं। घर आकर वालिद से कह
दिया कि यहां नहीं पढ़ूंगी। हाईस्कूल व इंटर के बाद वालिद ने लखनऊ भेज दिया। बाद
में भाई के साथ लखनऊ में पढ़ाई की। एमए के लिए पुन: एएमयू में दाखिला लिया, मगर यहां बुर्का
पहनने की शर्त थी। मां ने ही 1920
में पर्दा करना छोड़ दिया तो मैं क्या
बुर्का पहनूंगी, इसलिए वापस लखनऊ चली गईं। इससे साफ है कि वे कïट्टरपंथी विचारों
की विरोधी थीं। उनकीकहानियों व उपन्यासों में भी इसकी झलक मिलती है।
उपन्यास आग का दरिया में है सब कुछ
एएमयू में उर्दू अकादमी के निदेशक डॉ.
राहत अबरार ने बताया कि उनकी बचपन यही बीता। एएमयू में विजिटिंग प्रोफेसर भी रहीं।
यहां अपनी मित्र सुरैया सैन के यहां रहती हैं। जिस दिन उन्हें ज्ञानपीठ पुरस्कार
मिला वे अलीगढ़ में ही थीं। मैंने वरिष्ठ साहित्यकार व संपादक कन्हैया लाल की
पत्रिका के लिए उनका साक्षात्कार लिया। ऐनी आपा को जानना है तो उनका उपन्यास 'आग का दरिया' पढऩा होगा।
उतार-चढ़ाव के साथ साहित्यिक सफर छह वर्ष की आयु में पहली कहानी लिखी। 'बी चुहिया' उनकी पहली प्रकाशित
कहानी थी। 17-18 साल की उम्र में कहानी संकलन शीशे का घर सामने आया। 19 वर्ष की उम्र में
पहला उपन्यास 'शीशे के घर' लिखा। 20 वर्ष की उम्र में मुल्क का बंटवारा देखा। पिता की मौत के बाद भाई
मुस्तफा हैदर के साथ पाकिस्तान चली गईं। बंटवारे की टीस मन में लेकर 1949 में लंदन चली गईं।
वहां स्वतंत्र लेखक व पत्रकार के रूप में बीबीसी लंदन से जुड़ीं। दि टेलीग्राफ की
रिपोर्टर व इम्प्रिंट पत्रिका की प्रबंध संपादक भी रहीं। कहानी, उपन्यास, रिपोर्ताज आदि
लिखकर सुर्खियां बटोरीं। शादी नहीं की। 1956 में भारत भ्रमण पर आईं और फिर यहीं
(मुंबई) बस गईं। नोएडा को अपना अंतिम बसेरा बनाया। 21 अगस्त 2007 में निधन हुआ।
बहादुर महिला थीं ऐनी आपा
डॉ. प्रेम कुमार बताते हैं कि ऐनी आपा
बहादुर महिला थीं। उन्हें दुनिया भर में शोहरत मिलीं। दो बार साहित्य अकादमी
पुरस्कार मिला। पद्मश्री, पद्मभूषण, मिर्जा गालिब,
ज्ञानपीठ पुरस्कार से भी नवाजी गईं।
उर्दू साहित्यकार काजी अब्दुल सत्तार को खुद से भी श्रेष्ठ मानतीं थीं। चकाचौंध व
पब्लिसिटी से दूर रहीं। लंबे समय बाद मुझे ही साक्षात्कार दिया, जो चर्चित रहा।
क़ुर्रतुलऐन हैदर
की कहानियों का पहला संग्रह 'सितारों के आगे'
प्रकाशित हुआ! इसमे संकलित लगभग सभी
कहानियाँ उर्दू में हैं! क़ुर्रतुलऐन हैदर ने घटनाओं की अपेक्षा उनसे जन्म लेने
वाली अनुभूतियों और संवेदनाओ को विशेष महत्त्व दिया! इन कहानियों द्वारा पाठक के
सम्मुख एक अपरिचित सी दुनिया प्रस्तुत की गई, जिसमें जीवन की अर्थहीनता का संकेत था, हर तरफ छाई हुई
धुंध थी! एक मनोग्राही शायराना उदासी थी!क़ुर्रतुल ऐन हैदर आज़ादी के बाद भारतीय
फ़िक्शन का सबसे मजबूत स्तंभ मानी जाती थीं! वह साहित्य अकादमी में उर्दू सलाहकार
बोर्ड की दो बार सदस्य रहीं,
विजिटिंग प्रोफेसर के रूप में वह
जामिया इस्लामिया विश्वविद्यालय,
अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय से
जुड़ीं! वह कैलिफोर्निया विश्वविद्यालय में अतिथि प्रोफेसर भी रहीं!मानविकी, समाज, इतिहास, दर्शन, राजनीति, अध्यात्म, सभ्यताओं के संघर्ष
और सांस्कृति परिवर्तनशीलता पर बेबाकी से अपने विचार रखने वाली कुर्रतुल ऐन हैदर
ने सदैव से रचनात्मक विविधता में रंग भरे, फिर चाहे वह उपन्यास, कहानी, लेख, समीक्षा, संस्मरण, आत्मकथा, रिपोर्ताज, अनुवाद हो या फिर
पेटिंग या फ़ोटोग्राफ़ी, उन्होंने अपना कैरियर एक पत्रकार की हैसियत से शुरू किया लेकिन इसी
दौरान वे लिखती भी रहीं और उनकी कहानियां, उपन्यास, अनुवाद, रिपोर्ताज़ वग़ैरह
सामने आते रहे!क़ुर्रतुलऐन हैदर 1950
से 1960 के मध्य लंदन में रही! भारत लौटने के
बाद उन्होंने बम्बई में इम्प्रिंट के प्रबंध संपादक का पद संभाला! उसके बाद लगभग
सात वर्ष वह 'इलस्ट्रेटेड वीकली ऑफ़ इंडिया' के संपादन विभाग के सबंद्ध में रहीं!
कथा लेखन के अलावा ललित कलाओं,
ख़ासकर संगीत और चित्रकला में भी उनकी
गहरी रुचि थी। गर्दिशे रंगे चमन में उनके रेखांकन प्रकाशित हुए हैं!वर्ष 1947 क़ुर्रतुलऐन हैदर
की कहानियों का पहला संग्रह 'सितारों के आगे'
प्रकाशित हुआ! इसमे संकलित लगभग सभी
कहानियाँ उर्दू में हैं! 1947 में क़ुर्रतुलऐन ने लखनऊ विश्वविद्यालय से अंग्रेज़ी साहित्य में
एम.ए.किया! क़ुर्रतुलऐन हैदर ने घटनाओं की अपेक्षा उनसे जन्म लेने वाली अनुभूतियों
और संवेदनाओ को विशेष महत्त्व दिया! इन कहानियों द्वारा पाठक के सम्मुख एक अपरिचित
सी दुनिया प्रस्तुत की गई, जिसमें जीवन की अर्थहीनता का संकेत था, हर तरफ छाई हुई
धुंध थी! एक मनोग्राही शायराना उदासी थी!क़ुर्रतुलऐन हैदर 1950 से 1960 के मध्य लंदन में
रही! क़ुर्रतुलऐन हैदर का पहला उपन्यास 'मेरे भी सनमख़ाने' 1949 में प्रकाशित हुआ!
यह उपन्यास भारत की समन्वित संस्कृति के माध्यम से मानवता की त्रासदी प्रस्तुत
करता है! भारत की वह सामाजिक संस्कृति, जो यहाँ रहने वाले हिन्दू मुस्लिम
समुदायों के लिए एकता और प्रेम का प्रसाद और गौरव का प्रतीक थी, देश-विभाजन के बाद
वह खंडित हो गई! यह पीड़ा मेरे भी सनमख़ाने में लखनऊ के कुछ आदर्शवादी अल्हड़ एवं
जीवंत लड़के-लड़कियों की सामूहिक व्यथा कथा के माध्यम से बड़े ही मार्मिक रुप में
दर्शाई गई है! 1952 में क़ुर्रतुलऐन हैदर का दूसरा उपन्यास 'सफ़ीना ए गमे दिल' और दूसरा कहानी
संकलन 'शीशे के घर' प्रकाशित हुआ! इस संकलन में 'जलावतन', 'यह दाग़-दाग़ उजाला' और 'लंदन कहानियाँ' विशेष उल्लेखनीय
हैं!
दिसंबर 1959 में क़ुर्रतुलऐन
हैदर का सुप्रसिद्ध उपन्यास 'आग का दरिया'
प्रकाशित हुआ, जिसने साहित्य जगत
में तहलका मचा दिया! यह उपन्यास अपनी भाषा शैली, रचना-शिल्प, विषय-वस्तु और
चिंतन, हर दृष्टि से एक नई पंरपरा का सूत्रपात करता है! 'कारे-जहाँ-दराज़' उपन्यास के बाद
क़ुर्रतुलऐन हैदर के तीन और उपन्यास प्रकाशित हो चुके हैं! एक उपन्यासकार के रूप
में क़ुर्रतुलऐन हैदर की गणना उर्दू के महान साहित्यकारों में की जाती है!
क़ुर्रतुलऐन की पहली मौलिक कहानी प्रसिद्ध साहित्यिक पत्रिका साक़ी में प्रकाशित
हुई!संपादकीय में इसकी प्रशंसा विशेष उल्लेख के साथ की गई थी! इस कहानी से
क़ुर्रतुलऐन हैदर को काफ़ी प्रोत्साहन मिला और वह निरंतर लिखती चली गईं! अपने लेखन
में उन्होंने कभी किसी के अनुकरण का प्रयास नहीं किया, जो कुछ भी लिखा
अपने जीवनानुभव, कल्पना और चिंतन के आधार पर ही लिखा!मेरे भी सनमख़ाने (1949) सफ़ीना-ए-ग़मे-दिल
(1952) आग का दरिया (1959)
आख़िरी शब के हमसफ़र (1979) गर्दिशे–रंगे-चमन (1987) चांदनी बेगम (1990) कारे-जहाँ-दराज़
है। (1978-79) शीशे के घर (1952)
पतझर की आवाज़ (1967) रोशनी की रफ़्तार (1982) पुरस्कार
क़ुर्रतुलऐन हैदर को साहित्य अकादमी पुरस्कार (1967) सोवियत लैंड़ नेहरु पुरस्कार (1969), ग़ालिब अवार्ड (1985), इक़बाल सम्मान (1987), और ज्ञानपीठ
पुरस्कार (1991) से सम्मानित किया गया है।
क़ुर्रतुलऐन हैदर
का प्रसिद्ध उपन्यास 'आग का दरिया'
आज़ादी के बाद लिखा जाने वाला सबसे
बड़ा उपन्यास है! 'आग का दरिया'
समेत उनके बहुत से उपन्यास का अनुवाद
अंग्रेज़ी और हिंदी भाषा में हो चुका है,
उनके उपन्यासों में 'आग का दरिया', 'सफ़ीन-ए-ग़मे दिल', 'आख़िरे-शब के
हमसफ़र', 'गर्दिशे-रंगे-चमन',
'मेरे भी सनम-ख़ाने' और 'चांदनी बेगम' शामिल हैं! उनकी
कहानियों के संकलन में 'सितारों से आगे',
'शीशे के घर', 'पतझड़ की आवाज़' और 'रोशनी की रफ़्तार' शामिल हैं! उनके
जीवनी-उपन्यासों में 'कारे जहां दराज़ है' (दो भाग), 'चार नावेलेट', 'सीता हरन', 'दिलरुबा', 'चाय के बाग़' और 'अगले जन्म मोहे
बिटिया न कीजो' शामिल हैं! रिपोर्ताज़ में 'छुटे असी तो बदला हुआ ज़माना था', 'कोहे-दमावंद', 'गुलगश्ते जहां', 'ख़िज़्र सोचता है', 'सितंबर का चाँद', 'दकन सा नहीं ठार
संसार में', 'क़ैदख़ाने में तलातुम है कि हिंद आती है' वग़ैरह शामिल
हैं!अनुवाद के मैदान में भी उन्होंने काफ़ी काम किया है! हेनरी जेम्स के उपन्यास 'पोर्ट्रेट ऑफ़ ए
लेडी' का अनुवाद 'हमीं चराग़, हमी परवाने' के नाम से किया! उन्होंने अंग्रेज़ी के प्रसिद्ध लेखक के नाटक 'मर्डर इन द
कैथेड्रल' का अनुवाद 'कलीसा में क़त्ल'
के नाम से किया, इसके अलावा 'आदमी का मुक़द्दर' 'आल्पस के गीत', और 'तलाश' वग़ैरह उनके अनुवाद
में शामिल हैं!
ऐनी आपा ने जीवन भर
लिखा और जमकर लिखा, 21 अगस्त, 2007 की उस तारीख तक भी, जब वह दुनिया को छोड़ चली नहीं गईं!
साहित्य आज तक उर्दू अदब की इस नायाब शख्सियत को शिद्दत से याद करते हुए अपनी
श्रद्धांजलि देता है! उर्दू के जाने-माने आलोचक और कुर्रतुल ऐन हैदर को नज़दीक से
समझने वाले लेखक प्रोफ़ेसर शमीम हनफ़ी ने बताया कि ऐनी आपा के नाम से जानी जाने
वाली कुर्रतुल ऐन हैदर के निधन से न केवल उर्दू जगत में शोक का माहौल है बल्कि
भारतीय साहित्य भी उससे अलग नहीं है क्योंकि वह आज़ादी के बाद भारतीय फ़िक्शन का
एक स्तंभ मानी जाती थीं!बम्बई में इम्प्रिंट के प्रबंध संपादक भी रह चुकी हैं!
उसके बाद लगभग सात वर्ष वह 'इलस्ट्रेटेड वीकली ऑफ़ इंडिया' के संपादन विभाग के सबंद्ध में रहीं!
कथा लेखन के अलावा ललित कलाओं,
ख़ासकर संगीत और चित्रकला में भी उनकी
गहरी रुचि थी! गर्दिशे रंगे चमन में उनके रेखांकन प्रकाशित हुए हैं! अलीगढ़
मुस्लिम यूनिवर्सिटी, जामिया मिलिया इस्लामिया, ज्वाहरलाल नेहरू और दिल्ली
विश्वविद्यालयों के उर्दू विभाग में शोक का माहौल है. ऐनी आपा ने शादी नहीं की थी.
Comments