अब्दुल लतीफ गांधी

 


चिंगारी (Sunday स्पेशल)

(दैनिक) बिजनौर, 11 अगस्त 2024

देश की आज़ादी में बिजनौर के गांधी ने भी निभायी थी महत्वपूर्ण भूमिका

ज़रा याद करो कुर्बानी

पुलिस की नौकरी छोड़ स्वतंत्रता संग्राम में कूद गये थे अब्दुल लतीफ़ गांधी

-अशोक चक्रवर्ती

महात्मा गांधी के विचारों से प्रभावित होकर देश की आज़ादी की लड़ाई लड़ने वाले एक स्वतंत्रता सेनानी ऐसे भी हैं जो अंग्रेज़ों के ज़ुल्म रोक पुलिस की नौकरी छोड़ कर आज़ादी की जंग में शामिल हो गए। अंग्रेज़ों के ख़िलाफ़ उनके तेवरों और काम से बेज़ार होकर अंग्रेज़ों ने उनका नाम 'गांधी' रखा तो सब उन्हें गांधी कहने लगे।

बिजनौर के इस गांधी का नाम अब्दुल लतीफ़ था। इनका जन्म 1898 में बिजनौर के मुहल्ला पीरज़ादगान में स्वतंत्रता सेनानी मो. अब्दुल गनी साहब के घर में हुआ था। 10वीं पास करने के बाद यह पुलिस विभाग में आ गए। परीक्षा की मैरिट में बहुत उच्च स्थान था। लेकिन अंग्रेज़ पुलिस अफ़सरों के ग़लत रवैये और ज़ुल्म के कारण वह बहुत परेशान रहने लगे। वे आए दिन अफ़सरों से जनता पर ज़ुल्म न करने की हिदायत देते रहते थे।

1921 में बिजनौर के कलक्ट्रेट परिसर में सूबे के अंग्रेज़ राज्यपाल हैली के बिजनौर आगमन पर अब्दुल लतीफ़ की पुलिस में रहते हुए पुलिस की वर्दी फाड़ दी थी। उनके शादी बिजनौर क्षेत्र के ही रहने वाले खां परिवार में हुई थी। शहर बिजनौर के ही डॉ. अब्दुल मजीद के दिल में भी देश की आज़ादी की आग सुलग रही थी। इस बात का जब 1918 में उन्हें ज्ञान हुआ, तब दोनों, एक गरिमामय रूप वाले के साथ मिलकर आन्दोलन को संगठित करने, देश का कारण बनने का क्षेत्र था। अब्दुल लतीफ़ ने एम.डी.एल.आर का निर्णय था कि केवल कोर कमिटी में ही काम करूँगा... अंग्रेज़ों की नौकरी करते हुए भी कई अंग्रेज़ों के नाम सामने भी आ रहे थे और स्वतंत्रता सेनानियों को मदद कर रहे थे। अब्दुल लतीफ़ को पुलिस सेवा से 1921 में हटा दिया गया था, लेकिन उनकी संस्था का संचालन जारी रहा। आज हम बिजनौर आज़ाद अब्दुल लतीफ़ को जानते हैं कि जब वह नौजवान थे, तब से वे ही स्वतंत्रता संग्राम में सक्रिय भूमिका में थे। और उनके बहुत बड़े योगदान को भुलाया नहीं जा सकता।

उल्लेखनीय है कि जब अब्दुल लतीफ़ के पिता अब्दुल गनी के घर में रसूल के स्थान पर अब्दुल लतीफ़ के ख़िलाफ़ कड़े फ़ैसले ले रही थी, तब उनके साथियों ने स्वतंत्रता संग्राम में भाग लेने का निर्णय लिया।

1920 में जब देश में स्वतंत्रता आन्दोलन की लहर चल रही थी, उस समय आन्दोलन शुरू हुआ। अंग्रेज़ों ने दमनकारी नीतियां लागू कीं। ख़िलाफ़त आन्दोलन, जलियांवाला बाग़ काण्ड, असहयोग आन्दोलन शुरू हुआ। आन्दोलन में सक्रिय होने के लिए अब्दुल लतीफ़ आगे आए। उन्होंने नौकरी छोड़ी, जेल गए, अंग्रेज़ी शिक्षा का भी विरोध किया। उन्होंने विचार किया कि अंग्रेज़ों के साथ काम करना है, कांग्रेसी नेताओं की मदद करनी है। 1921 में जब अब्दुल लतीफ़ पुलिस अफ़सर और ज़िलाधीश बिजनौर के साथ कांग्रेसी सम्मेलन में सम्मिलित करने की मंशा से आए, तो उन्होंने बिजनौर के अफ़सर अब्दुल लतीफ़ को गिरफ़्तार करने आए। उन्होंने मुरादाबाद में भी एक जलसा आयोजित किया था। अब्दुल लतीफ़ के नेतृत्व में चल रहे विरोध पर दबाव बनाने को ज़िलाधीश बिजनौर का हुक्म मिला। 1921 के बाद अब्दुल लतीफ़ का बिजनौर में दौरा रहा। 1921-1922 में जब अब्दुल लतीफ़ का मुरादाबाद, सहारनपुर में गिरफ़्तारी का वारंट जारी हुआ, तब वे पुलिस अफ़सरों के सामने प्रस्तुत हो गए।

अब्दुल लतीफ़ बिजनौर नहीं आ सकते थे। वे ज़िले के स्वतंत्रता सेनानी बन चुके थे। अब्दुल लतीफ़ का बिजनौर के मोहल्ले में जन्म हुआ था। 21 अगस्त 1922 को उन्होंने बिजनौर में नागरिक अधिकारों और आज़ादी पर भाषण दिया। भाषण के बाद उन्हें पुलिस ने बिजनौर से गिरफ़्तार कर लिया। ज़िला मजिस्ट्रेट बिजनौर ने उनके बोलने पर रोक लगा दी थी। इसके बावजूद भी वे ज़िला मजिस्ट्रेट, ज़िला पुलिस अधीक्षक और बिजनौर के पुलिस अधीक्षक के सामने बोले। उनके इस भाषण से घबराकर पुलिस ने उन्हें गिरफ़्तार कर लिया। इसके बाद ज़िला मजिस्ट्रेट ने भाषण देने पर ज़िला मजिस्ट्रेट बिजनौर की ओर से 1 वर्ष के लिए ज़िले में प्रवेश पर पाबंदी लगा दी गई। ज़िला मजिस्ट्रेट ने यह आदेश भेजा कि वे किसी कपड़े के बाज़ार में नहीं जाएंगे। इसके बाद में वे मुरादाबाद चले गए। उन्होंने ज़िले में असहयोग आन्दोलन की मशाल जलाए रखने का काम किया। बिजनौर में रहने वाले अपने दोस्तों के साथ बिजनौर, नजीबाबाद में बिजनौर ज़िले के स्वतंत्रता सेनानियों को एकजुट किया। ज़िला कांग्रेस कमेटी के अध्यक्ष ज़िला कांग्रेस कमेटी को मज़बूत करने के लिए हर संभव प्रयास किए। उन्होंने स्वतंत्रता संग्राम में भाग लेने वाले अब्दुल लतीफ़ को अंग्रेज़ों ने तौर-तरीक़ा बना दिया था। अब्दुल लतीफ़ को पुलिसवालों ने नौकरी से हटाने के निर्देश दिए थे, लेकिन वे नहीं डरे और आज़ादी के आन्दोलन में पूरी शिद्दत के साथ कूद पड़े। उन्होंने ज़िला स्तर पर कांग्रेस संगठन को खड़ा किया।

मस्जिद में भी दिया अंग्रेज़ों के ख़िलाफ़ भाषण

अब्दुल लतीफ़ को कई बार जेल भेजा गया। उनके ऊपर कई बार मुक़दमे चलाए गए। नज़रबंदी के दौरान उन्हें परिवार से मिलने तक की इजाज़त नहीं थी। उन्होंने मस्जिद से भी अंग्रेज़ों के ख़िलाफ़ भाषण दिया था, जिस पर कई गिरफ़्तारी वारंट निकला था। 12 जुलाई 1922 को उन्हें भारतीय जेल भेज दिया गया। अब्दुल लतीफ़ मूल रूप से बिजनौर के रहने वाले थे, लेकिन उन्हें मुरादाबाद, मेरठ, सहारनपुर जेल भेजा गया। देहरादून जेल में वे प्रसिद्ध स्वतंत्रता सेनानी ख़ान के साथ रहे। यही नहीं वे ज़िला स्वतंत्रता संग्राम सेनानी संघ के ज़िलाध्यक्ष भी रहे। वर्ष 1928 में ज़िला कमेटी बिजनौर के चेयरमैन चुने गए। स्वतंत्रता संग्राम सेनानी संघ के अध्यक्ष पद पर वर्ष 1947 में स्वतंत्रता के बाद भी पुनर्निर्वाचित किए गए।

वे ज़िला एवं देश आज़ाद होने के बाद अब्दुल लतीफ़ गांधी के रूप में विख्यात हुए। उन्होंने एक नया रास्ता चुना था, अब्दुल लतीफ़ गांधी का संगठन बिजनौर के मोहल्ले काज़ीपाड़ा का था और वे उनके विचार कभी भुलाए नहीं जा सकते।

बिजनौर में कांग्रेस के वरिष्ठ कार्यकर्ताओं में लाला अमृत लाल, पंडित सुखलाल, सेठ बनारसीदास, बाबू शिवप्रसाद गुप्त, मानसिंह शर्मा, लाला राम सरन आदि शामिल थे। अब्दुल लतीफ़ के संदेश प्रसार करने में बाबू शिवप्रसाद गुप्त भी उनके साथ बेखौफ़ होकर बिजनौर में घूमते थे। मस्जिद गली में मुशायरे के माध्यम से स्वतंत्रता आन्दोलन के गीतों का गायन करते थे। ज़िला स्वतंत्रता संग्राम संघ के पूर्व सचिव अब्दुल लतीफ़ 1921-1922 में बिजनौर ज़िले के स्वतंत्रता सेनानी के रूप में उभर कर सामने आए थे। बिजनौर के कलेक्टर ए.सी. वाकर द्वारा अब्दुल लतीफ़ को ज़िले से निष्कासित कर बिजनौर में आने पर रोक लगा दी गई थी। बिजनौर के कलेक्टर ए.सी. वाकर ने इस प्रकार का प्रतिबंध लगाया था, लेकिन वे रुकने वाले नहीं थे। 30 अप्रैल 1922 को अब्दुल लतीफ़ को गिरफ़्तार कर लिया गया। 1922 में 100 रुपये का जुर्माना और 250 रुपये का मुचलका हुआ। इस गिरफ़्तारी की ज़मानत ज़िला मजिस्ट्रेट बिजनौर ने रद्द कर दी थी। ज़िला मजिस्ट्रेट ने अब्दुल लतीफ़ को ज़मानत देने से मना कर दिया और वे जेल में ही रहे।

पूर्व चेयरमैन अतीक़ अहमद के दादा थे अब्दुल लतीफ़

पूर्व नगर पालिका अध्यक्ष अतीक़ अहमद ने बताया कि 1921-1922 में उनके दादा स्वतंत्रता संग्राम के समय दो बार 1-1 वर्ष के लिए ज़िलाबदर रहे थे। अब्दुल लतीफ़ गांधी को बिजनौर से निकाल दिया गया था। ज़िला मजिस्ट्रेट बिजनौर ने ज़िलाबदर किया था। उन्होंने ज़िला प्रशासन के सामने सरेंडर कर दिया था। पूर्व नगर पालिका अध्यक्ष अतीक़ अहमद ने बताया कि उनके दादा अब्दुल लतीफ़ का मुख्य कार्य स्वतंत्रता संग्राम में लोगों को जोड़ना था। उन्होंने कहा कि उनके दादा पर कई मुक़दमे दर्ज हुए थे, लेकिन स्वतंत्रता आन्दोलन का रास्ता उन्होंने कभी नहीं छोड़ा। उन्होंने कहा कि हमें गर्व है कि हम ऐसे स्वतंत्रता संग्राम सेनानी के पौत्र हैं जिन्होंने देश की आज़ादी के लिए स्वतंत्रता संग्राम में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी।

Comments

Popular posts from this blog

हल्दौर रियासत

तारीख ए सरकशे जिला बिजनौर लेखक सर सैयद अहमद खां

बिजनौर है जाहरवीर की ननसाल