1967 में राष्ट्रपति पुरस्कार से नवाजे गये मुमताज अहमद

नजीबाबाद राजकीय इंटर काँलेज  में मुझे कुछ माह पढ़ने का अवसर मिला।  मेरे  क्लास टीचर मुमताज साहब होते थे।  मेरे जीवन के सीखने के दौरान यदि कोई आदर्श  शिक्षक रहा तो वह मुमताज साहब रहे।  वे गजब के गुरू थे।   उस समय दुपहर में कालेज की ओर से मिड डे मिल  मिलता था । सफैद रूमाल उन्हे बहुत पसंद था। मैं  सदैव सफैद रूमाल रखता।  अधिकतर छात्र अपनी शर्ट के आगे के हिस्से में मिड डे मिल लेते  और मैं रूमाल में । सफैद रूमाल होने के  कारण  मुमताज साहब अन्य छात्रों से  दुगना खाने का सामान मुझे देते।

मुमताज साहब कभी गुस्सा नही होते थे। बड़ी – से बडी गलती पर सिर्फ छात्र को फूल कहते  और क्लास में सन्नाटा छा जाता। छात्र मुमताज साहब का बहुत सम्मान करते थे। छात्र किसी मांग को लेकर कभी  जुलूस निकाल रहे होते , तो खड़े प्रधानाचार्य को भी नजर अंदाज कर आगे बढ़ जाते। किंतु मुमताज साहब के साथ  ऐसा नही था। जुलूस जा रहा है, और सामने से मुमताज सहब आ जाए तो जुलूस पीछे मुड़ जाता था।

मुमताज साहब अंग्रेजी के प्रवक्ता थे, किंतु हिंदी भी  शानदार थी, उनकी। दुबले – पतले।  गोरे।  उनके एक पांव में नासूर था।  वे हाकी के बड़े खिलाडी थे। मसूरी में खेलते समय अंग्रेज टीम के एक सदस्य ने हाकीमार कर उनका पांव घायल कर दिया। उनका खेल खराब करने के  लिए सही से उपचार नही कराया गया  और उनके पांव में  नासूर हो गया। इसी के कारण  वे सदा छड़ी के सहारे चलते थे।

हमारे समय में कलास टीचर ही फीस लेते थे। अन्य टीचर फीस लेते ये करते थे कि फीस नौ रूपये  सत्तर पैसे है, तो छात्र के पूरे दस रूपये रख लेते थे , किंतु मुमताज साहब के साथ ऐसा नही था। वे तीस पैसे लौटाने की जगह एक या दो रूपया जो  उनके पास होता, लौटा देते।  कई बार तो पांच रूपये तक वापिस कर देते। उन्होंने कभी किसी छात्र का पैसा नही रखा। बल्कि कई  छात्रों की फीस  भी   वह अपने पास से देते थे।

मेरे पिताजी चकबंदी में थे।  बिजनौर से चकबंदी जौनपुर  चली गई। दादाजी ने पिताजी को नही जाने दिया।  इधर पिता जी की नौकरी छूटी, उधर मेरी पढ़ाई।  बाद में एक बार मुमताज साहब मिले। पढ़ाई  छोड़ने के बारे में पूछा। मैंन बताया। वह बहुत नाराज हुए। बोले−  एक बार बता तो देता। ऐसे अपने आदर्श गुरू मुमताज साहब पर लेख करने का  बहुत मन था, किंतु कुछ मिल नही रहा था। श्री मुकेश सिंहा ने उन पर लेख कर एक बड़ा काम किया है। लेख में अगर उनकाजन्म दिन और निधन भी  आ जाता तो ज्यादा बेहतर रहता ।मुकेश को साधुवाद

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शिक्षा, शिक्षार्थी व समाज को समर्पित किया जीवन      -आजीवन अविवाहित रहकर शिष्यों को संवारते रहे   -1967 में राष्ट्रपति पुरस्कार से नवाजे गये मुमताज अहमद -------------------------------------



शिखर तक ले जाने,क्षमा का भाव रखने, कमजोरी दूर करने वाले व्यक्ति को शिक्षक कहा जाता है। शिक्षक को समाज व राष्ट्र निर्माता कहा जाता है। इसलिए शिक्षक को समाज में सम्मान की दृष्टि से देखा व समझा जाता है। नजीबाबाद नगर में एक ऐसे शिक्षक रहे हैं जिन्होंने अपना समस्त जीवन शिक्षा, शिक्षार्थियों व समाज को दिया। जीवन भर अविवाहित रहकर शिक्षा के लिए समर्पित रहे। उनके शैक्षिक क्रियाकलाप, सेवाकाल, गुरु शिष्य के संवाहक व सामाजिक कार्यों के लिए राष्ट्रपति पुरस्कार से नवाजा गया। वह ऐसे बिरला शिक्षक रहे जिन्हें भारत सरकार से शिक्षा का सर्वोच्च राष्ट्रपति पुरस्कार मिलने के बाद नजीबाबाद में उनका भव्य नागरिक सम्मान दिया गया।        पीलीभीत के सराय खान निवासी मुमताज अहमद खान‌ 1942 में राजकीय इंटर कालेज नजीबाबाद में सहायक पद पर नियुक्त होकर आएं थे। अविवाहित रहकर उन्होंने अपना सारा जीवन शिक्षा, शिक्षार्थी व समाज के लिए समर्पित कर दिया। बताते हैं वह विद्यालय समय के बाद भी कालेज के आर्थिक रूप से कमजोर विद्यार्थियों को अतिरिक्त समय देकर उनको पाठ्यक्रम के साथ नैतिक,सामाजिक , राष्ट्र प्रेम की शिक्षा देकर एक आदर्श नागरिक बनाने में योगदान देते रहे हैं। वह अपने सीनियर शिक्षक, अभिभावक को सम्मान देते हुए कनिष्ठ शिक्षकों का उचित मार्ग दर्शन करते रहे हैं। यहां तक वह कालेज में अध्ययनरत आर्थिक रूप से कमजोर विद्यार्थियों के साथ गरीब, विधवा ज़रूरत मंद महिलाओं को बिना किसी प्रचार के आर्थिक मदद करते रहे हैं। बताते हैं वह कभी पुरूस्कार पाने के पक्षधर नहीं थे लेकिन उनके एक साथी शिक्षक रणवीर सिंह चौहान ने राष्ट्रपति पुरस्कार के लिए फाईल तैयार कर उस पर उनके जबरन हस्ताक्षर करा कर पत्रावली  प्रधानाचार्य बुद्धि बल्लभ थपलियाल की संस्तुति के साथ भेज दी। सभी मानक पूरे पाए जाने पर विभाग की संस्तुति के बाद 1967 में मुमताज अहमद खान को भारत सरकार का सबसे प्रतिष्ठित शिक्षक पुरस्कार राष्ट्रपति पुरस्कार दिल्ली में उस समय के राष्ट्रपति डा. जाकिर हुसैन ने दिया। शिक्षक मुमताज अहमद खान को मिले राष्ट्रपति पुरस्कार से बिजनौर जनपद के शिक्षकों व शिक्षा विभाग का सीना चौड़ा हो गया।                           -------------------------------------राष्ट्रपति पुरस्कार पर नगर में हुआ सार्वजनिक अभिनन्दन ------------------------------------- शिक्षक मुमताज अहमद खान को राष्ट्रपति पुरस्कार मिलने पर कालेज प्रशासन, पूर्व छात्रों व अभिभावकों ने जाति धर्म से ऊपर उठकर पुरस्कृत शिक्षक का भव्य नागरिक अभिनंदन किया था।  वरिष्ठ अधिवक्ता राम अवतार माहेश्वरी के संयोजन  में शिक्षक मुमताज अहमद खान को खुली जीप पर बैठाकर नगर के प्रमुख मार्गों से अभिनंदन जलूस निकाला गया । रास्ते में हजारों नगरवासियों ने उनका फूल माला पहनाकर माल्यार्पण किया। अग्रवाल धर्मशाला में अभिनंदन समारोह में मुमताज अहमद खान को नगर व बिजनौर जिले का गौरव बताते हुए उनकी प्रतिभा,शैक्षिक उपलब्धियों का बखान किया गया।                               -------------------------------------  मुमताज अहमद खान अविवाहित रह ,अभिभावक बने रहे                             ------------------------------------- राष्ट्रपति पुरस्कार से सम्मानित शिक्षक मुमताज अहमद खान जीवनभर अविवाहित रहे लेकिन जीवन भर अभिभावक बने  रहे । उन्होंने अपने तीन भतीजों को अपने पास रखकर पढ़ाया। उनका एक भतीजा मुश्ताक अहमद  उच्च शिक्षित होकर भारत व प्रदेश सरकार में  उच्च पद पर रहे। आदर्श शिक्षक, संरक्षक, साम्प्रदायिक सौहार्द के प्रतीक व गुरु शिष्य परम्परा के वाहक मुमताज अहमद खान ने 80 वर्ष की आयु में दुनिया को अलविदा कहां । वह आज दुनिया में नहीं है लेकिन उनके प्रशंसक व शिष्य आज भी देश में विभिन्न क्षेत्र में सेवाएं देकर उनका नाम रोशन कर रहे  हैं। -------------------------------------वेतन का अधिकांश भाग जरूरत मंदों पर व्यय किया ------------------------------------- सहयोगी शिक्षक व रूम मेट शिक्षक 90 वर्षीय ईशार अहमद खान आज भी उनकी यादों में खोकर बताते हैं ऐसा शिक्षक पैदा होना मुश्किल है। कालेज में वह आल इन वन थे। अंग्रेजी के शिक्षक रहकर हर विषय को पढ़ाने की दक्षता थी साथ शिक्षक होने पर भी प्रशासनिक कार्य करने में सक्षम थे।  उन्होंने कालेज के उदयीमान व गरीब बच्चों के अलावा जानकारी मिलने पर गरीब महिलाओं,व परिवारों की आर्थिक मदद की है। यहां तक अपने प्रिय छात्रों को उच्च शिक्षा के लिए भी धन से मदद की है। उन्होंने बताया वह अपने वेतन का 60-80 प्रतिशत पैसा जरूरतमंद पर व्यय कर देते थे। सेवा के दौरान  उनके प्रशंसक व शिष्य , अभिभावक उन्हें अपने यहां  भोजन व सत्कार कराकर  स्वयं को धन्य मानते थे । वह बताते हैं कालेज में  उनकी स्मृति में एक छात्रवृत्ति चलाने की योजना बनाई गई लेकिन विभाग से उसकी अनुमति नहीं मिली। -----------------------------------जीआईसी नजीबाबाद को इंटर बनाने का किया प्रयास  ------------------------------------ राष्ट्रपति पुरस्कार प्राप्त शिक्षक मुमताज अहमद खान शिक्षक के साथ कालेज के लिए समर्पित थे। जीआईसी में इंटर की कक्षा संचालित करने के लिए नजीबाबाद आएं तत्कालीन केन्द्रीय  मंत्री भक्त दर्शन से विशेष अनुरोध किया। उनके सहयोग से इंटर की मान्यता  पत्रावली को पास कराकर क्षेत्र की शिक्षा के लिए इंटर कक्षाओं का संचालन कराया। -----------------------------------  हाकी के अच्छे खिलाड़ी थे मुमताज अहमद खान ------------------------------------- शिक्षक मुमताज अहमद खान एक समर्पित शिक्षक के साथ उम्दा हाकी खिलाड़ी भी थे। उन्होंने सदा छात्रों को शिक्षा के साथ खेलोंं में प्रतिभाग के लिए प्रोत्साहित किया। एक विदेशी टीम के साथ हाकी मैच खेलते समय एक दुर्घटना में उनकी पैर टूट गया था। उसके बाद वह बैसाखी के सहारे ही अपने जीवन कै चलाने लगे। जीवन के अंतिम समय में उन्हें अपने अकेलेपन का एहसास होने लगा था। अंतिम समय में उन्हें विवाह ना करने का पछतावा भी रहा।                              ------------------------------------ दो शिक्षण संस्थाओं की नींव रख शिक्षा को बढ़ावा दिया -------------------------------------राष्ट्रपति पुरस्कार प्राप्त शिक्षक मुमताज अहमद खान ने शिक्षा के प्रति समर्पण की भावना के तहत अपने प्रिय शिष्य राम अवतार एडवोकेट द्वारा 1973 में कृष्णा प्यारी विद्यालय व 1975 में चिकित्सक डा मुशर्रफ के साथ कासमिया विद्यालय की नींव रखीं। उनका स्पष्ट  मानना था समाज के हर वर्ग को शिक्षा व हर नौजवान के साथ कलम व रोजगार होना चाहिए। वह जहां  भी बैठने शिक्षा के प्रसार पर ही जोर देते रहे हैं। -------------------------------------सेवानिवृत्त पर पेंशन नहीं बनी तो उनका शिष्य बना सहारा ----------------------------------- राष्ट्रपति पुरस्कार प्राप्त शिक्षक मुमताज अहमद खान 32  वर्ष की सेवा के बाद1974 में जब सेवानिवृत्त हुए तो भ्रष्टाचार के चलते उनकी पेंशन नहीं बनी। उनका एक शिष्य लखनऊ सचिवालय में उच्च पद पर तैनात था। मुलाकात में जब शिष्य को पेंशन ना बनने की जानकारी मिली तो शिष्य ने शिक्षा निदेशक को अवगत कराया और पेंशन स्वीकृत करा दी। दो‌ वर्ष के बाद उन्हें पेंशन नसीब हो सकी। सेवानिवृत्त होने के बाद भी मुमताज अहमद खान ने नजीबाबाद नगर को ही अपना ठिकाना बनाएं रखा और 80 वर्ष की उम्र में दुनिया से  विदा ली। उनको उनके  पैतृक नगर में  रखवाया गया।  -------------------------------------  दर्जनों शिष्य को दिलाया रोजगार,संवारा भविष्य   ------------------------------------- शिक्षक मुमताज अहमद खान के खास शिष्य रहे राम अवतार माहेश्वरी चार वर्ष पहले ही स्वर्ग सिधार गए हैं। उनकी डायरी में लिखे पन्नों पर अपने गुरु को भगवान का दर्जा दिए जाने का उल्लेख है। उनके अनुसार राष्ट्रपति पुरस्कार मिलने के बाद उनके अभिनन्दन समारोह में उन्हें सम्मान स्वरूप 1000/ शाल, चांदी की पान की डिबिया भेंट की। तब उन्होंने सम्मान को ही बडा बताते हुए शालीनता के साथ चांदी की डिबिया सहयोगी शिक्षक भगीरथ सिंह लाहौरी को,शाल एक विधवा महिला के बच्चे को व 1000/ से कालेज के हाई स्कूल व इंटर के प्रतिभाशाली बच्चों को टेबिल लैम्प के लिए दे दिए। उन्होंने लिखा वह गलती पर बच्चों को दंडित भी ऐसे करते वह गलती की पुनरावृत्ति नहीं करेगा। सादा जीवन व उच्च विचार के साथ उन्होंने बच्चों को गुरू जनों,माता पिता का सम्मान करने व‌ समाज व राष्ट्र की सेवा के प्रेरित किया। वह बताते हैं उन्होंने अनेक गरीब व प्रतिभाशाली बच्चों को उनकी शैक्षिक योग्यता के आधार पर देश भर में नौकरी दिलाई। उनके अनुसार एक दलित मजदूर के होशियार बच्चे को उसके घर से बुलाकर पढ़ाया उच्च शिक्षित किया वह लड़का आज अमेरिका में सैटल है।वह अफसोस से लिखते हैं राजकीय इंटर कालेज नजीबाबाद के सामने के मार्ग का नाम मुमताज साहब के नाम से  रखने का प्रयास किया लेकिन  सफलता नहीं मिली जिसका हमेशा खेद रहेगा।           -------------------------------------राष्ट्रपति पुरस्कृत शिक्षक का कालेज में नहीं कोई उल्लेख ------------------------------------- जिस राजकीय कालेज का शैक्षिक वातावरण व अनुशासन बनाने व आदर्श शिक्षक का मान बढ़ाते हुए राष्ट्रपति पुरस्कार प्राप्त कर प्रदेश व देश में नाम बढ़ाया आज उस शिक्षक मुमताज अहमद खान के बारे में कालेज के शिक्षक व विद्यार्थी जानते नहीं हैं। कालेज में राष्ट्रपति पुरस्कार प्राप्त शिक्षक मुमताज अहमद खान का ना तो कोई फोटो दीवार पर लगा है ना कोई कक्ष उनके नाम पर है। न ही कालेज की किसी दीवार पर उनकी शैक्षिक उपलब्धियों का कोई उल्लेख है। ऐसे में कोई शिक्षक व छात्र राष्ट्रीय सम्मान प्राप्त शिक्षक मुमताज अहमद खान से कैसे प्रेरणा ले सकता है।                                      * मुकेश सिन्हा




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