जितेन्द्र मोहन सिन्हा रहबर

 

 उर्दू ज़बान-ओ-अदब के मारूफ़ शायर *"जितेन्द्र मोहन सिन्हा रहबर"* बिजनौरी 

             *जितेन्द्र मोहन सिन्हा


* और तख़ल्लुस *रहबर* ।

24 सितम्बर 1911 को उत्तर प्रदेश के बिजनौर में जिया लाल जी के यहां पैदा हुए। बचपन एक पढ़े-लिखे और तरक़्क़ी पसंद मुतवस्सित तबक़े के घराने में गुज़रा। वो अपने चार भाइयों और एक बहन में सबसे बड़े थे। वो शुरू ही से एक ज़हीन तालिब-ए-इल्म थे और मुताले की तरफ़ माइल थे। बिजनौर से हाई स्कूल और डी.ए.वी. कॉलेज, देहरादून से इंटरमीडिएट का इम्तिहान पास किया। इलाहाबाद यूनिवर्सिटी से बी.ए. किया और बाद में एल.एल.बी. किया। इलाहाबाद में रहते हुए वो पंडित जवाहरलाल नेहरू और वहाँ के दानिश्वरों के साथ आज़ादी की जद्दोजहद में मसरूफ़ दीगर रहनुमाओं के नज़रिये से बहुत मुतास्सिर थे। उन्होंने खुद को गाँधी जी के फ़लसफ़े के मुताबिक ढालने की कोशिश की। एम.ए. की तालीम अधूरी छोड़ कर वो बिजनौर वापस आए और सिविल नाफ़रमानी तहरीक के पहले बैच की क़यादत करते हुए 1930 में जेल चले गए। शादी चंद साल बाद हुई। जद्दोजहद-ए-आज़ादी में जेल काटने के बाद चूँकि उस ज़माने में सरकारी मुलाज़मत हासिल करना मुमकिन नहीं था इसलिए उन्होंने एक-दो प्राइवेट फ़र्मों में मुलाज़मत इख़्तियार कर ली। उनकी अहलिया का इंतिक़ाल 1944 के अवाइल में हुआ। इलाहाबाद से एल.टी. करने के बाद उन्होंने कुछ साल पीलीभीत और सुल्तानपुर में पढ़ाया। 1948 में लखनऊ के नेशनल कॉलेज में पढ़ाना शुरू किया और 1973 में वहाँ से रिटायर हुए। इससे चंद साल पहले उन्हें मुजाहिद-ए-आज़ादी एज़ाज़ मिला।

          उन्हें हिंदी, अंग्रेज़ी, उर्दू और संस्कृत जैसी कई ज़बानों का अच्छा इल्म था। अपनी ज़िंदगी में उन्होंने अदब की काफ़ी ख़िदमत की जिसमें उर्दू ग़ज़लें, नज़्में, हिंदी और अंग्रेज़ी में लिखे गए मज़ामीन शामिल हैं। उन्होंने समाजी और सियासी मसाइल और अख़लाक़ी अक़दार की शिकस्त पर बहुत से मज़ामीन लिखे। कुछ तबाअत भी हुई। जितेन्द्र मोहन सिन्हा रहबर चंद हफ़्तों की बीमारी के बाद 12 अगस्त 1993 को लखनऊ में इंतिक़ाल कर गए। 'रहबर' को ग़ज़लें विशेष प्रिय थीं, क्योंकि उनमें जीवन के विविध रंग एवं गहन अनुभूतियां समाविष्ट हैं। 'रहबर' की इच्छा थी कि उनकी उर्दू शायरी का संग्रह छपे जो उनके देहांत के पश्चात उनके पुत्र शैलेन्द्र प्रताप सिन्हा व भूपेंद्र प्रताप सिन्हा ने 1995 में "पयामे रहबर" ' के नाम से प्रकाशित किया। इस संग्रह में 132 उर्दू गुज़लें व नज्में, आठ हिंदी कविताएं शामिल हैं। संग्रह में शामिल उनकी कुछ गुज़लें कानपुर से प्रकाशित साप्ताहिक सदाक़त व नया दौर लखनऊ में छपे। उनका प्रथम उर्दू पद था-


डर रहे थे जिससे वह मुशकिल समां आ ही गया

कातिले जां दुश्मनें अम्नों अमां आ ही गया


*मारूफ़ शायर जितेन्द्र मोहन सिन्हा रहबर के अशआर बतौर ख़िराज-ए-अक़ीदत...*

तू ने ही राह न दिखाई तो दिखाएगा कौन

हम तिरी राह में गुमराह हुए बैठे हैं


है फ़हम उस का जो हर इंसान के दिल की ज़बाँ समझे

सुख़न वो है जिसे हर शख़्स अपना ही बयाँ समझे


हर शय में हर बशर में नज़र आ रहा है तू

सज्दे में अपने सर को झुकाऊँ कहाँ कहाँ


मोहब्बत में नहीं है इब्तिदा या इंतिहा कोई

हम अपने इश्क़ को ही इश्क़ की मंज़िल समझते हैं


आँखों आँखों में पिला दी मिरे साक़ी ने मुझे

ख़ौफ़-ए-ज़िल्लत है न अंदेशा-ए-रुस्वाई है


क़ुदरत की बरकतें हैं ख़ज़ाना बसंत का

क्या ख़ूब क्या अजीब ज़माना बसंत का


दोज़ख़ से भी ख़राब कहूँ मैं बहिश्त को

दो चार अगर वहाँ पे भी सरमाया-दार हों


छुपे हैं सात पर्दों में ये सब कहने की बातें हैं

उन्हें मेरी निगाहों ने जहाँ ढूँढा वहाँ निकले


कैसी कशिश है इश्क़ के टूटे मज़ार में

मेला लगा हुआ है हमारे दयार में


सुख़न-साज़ी में लाज़िम है कमाल-ए-इल्म-ओ-फ़न होना

महज़ तुक-बंदियों से कोई शायर हो नहीं सकता


फ़रिश्ता हर बशर को हर ज़मीं को आसमाँ समझे

कि हम तो इश्क़ में दुनिया को ही जन्नत-निशाँ समझे


हम रू-ब-रू-ए-शमा हैं इस इंतिज़ार में

कुछ जाँ परों में आए तो उड़ कर निसार हों


ज़माना ये आ गया है रहबर कि अहल-ए-बीनिश को कौन पूछे

जमे हैं मक्कार कुर्सियों पर दिखा रहे हैं गंवार आँखें


मोहब्बत सी शय उस ने मुझ को अता की

कि ख़ुश ख़ुश चलूँ उम्र बरबाद कर के


दिल को बहुत अज़ीज़ है आना बसंत का

रहबर की ज़िंदगी में समाना बसंत का


शेख नगीनवी

 



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