लालढांग क्षेत्र की कहानी
लालढांग रोहिल्लों से अंग्रेजों तक इतिहास के एक पुराने दरवाज़े की कहानी
नजीबाबाद-हरिद्वार मार्ग से कोटद्वार की ओर जाते हुए जिस लालढांग को हम एक सामान्य गांव बाजार और जंगल के रास्ते के रूप में देखते हैं वो कभी बिजनौर के मैदान और गढ़वाल की पहाड़ियों के बीच एक महत्वपूर्ण रणनीतिक पड़ाव हुआ करता था।
लालढांग का इतिहास केवल सड़क जंगल सुलताना डाकू के आवागमन का क्षेत्र और आज की प्रशासनिक सीमाओं का इतिहास नहीं है इसके पीछे प्राचीन पुरातात्विक अवशेष रोहिल्ला सत्ता नजीबुद्दौला मराठों के साथ संघर्ष अवध का प्रभाव ब्रिटिश शासन और पुराने पहाड़ी मार्गों की एक लंबी कहानी छिपी हुई है।
लालढांग के आसपास का इतिहास मध्यकाल से भी कहीं पुराना दिखाई देता है इसके निकट स्थित पांडुवाला एक महत्वपूर्ण पुरातात्विक स्थल माना जाता है जहां प्राचीन मंदिरों के अवशेष और मिट्टी के बर्तनों से संबंधित पुरावशेष मिलने का उल्लेख मिलता है स्थानीय परंपराओं में लालढांग के शिव मंदिर और पांडुवाला से जुड़े शिवलिंग का भी उल्लेख मिलता है।
इससे संकेत मिलता है कि यह भूभाग केवल बाद के राजनीतिक संघर्षों के कारण महत्वपूर्ण नहीं हुआ होगा बल्कि यहां मानव गतिविधियों की परंपरा काफी पुरानी रही है18वीं शताब्दी में नजीबाबाद के रोहिल्ला शासक नजीबुद्दौला के प्रभाव के समय लालढांग का सामरिक महत्व सहारनपुर देहरादून आवागम का पडाव भी था
ऐतिहासिक विवरणों में यह उल्लेख मिलता है। रोहिल्लों और अवध की सत्ता के बीच संघर्ष के दौर में यह क्षेत्र एक सुरक्षित स्थान और रणनीतिक चौकी के रूप में उपयोग किए जाने की परंपरा से जुड़ा रहा।
कल्पना कीजिए एक ओर बिजनौर का विस्तृत मैदानी क्षेत्र और दूसरी ओर गढ़वाल की पहाड़ियां इनके बीच जंगलों से होकर गुजरता यह रास्ता स्वाभाविक रूप से सैनिकों यात्रियों और व्यापारियों के लिए महत्वपूर्ण था।
उपलब्ध ऐतिहासिक विवरणों में मराठों द्वारा लालढांग की घेराबंदी और रोहिल्लों के साथ संघर्ष का उल्लेख मिलता है संघर्ष के बाद समझौते अथवा बंधपत्र के माध्यम से रोहिल्लों की रिहाई का विवरण भी मिलता है यह प्रसंग बताता है कि उस समय लालढांग महज कोई ग्रामीण बस्ती नहीं था बल्कि सैन्य दृष्टि से महत्वपूर्ण स्थान था।
18वीं शताब्दी के उत्तरार्ध में रोहिल्ला शक्ति और अवध के बीच संघर्ष निर्णायक दौर में पहुंचा 1774 के रोहिल्ला युद्ध में रोहिल्लों की हार के बाद इस क्षेत्र में अवध का प्रभाव स्थापित हुआ।
लालढांग और आसपास का भूभाग भी इसी बड़े राजनीतिक परिवर्तन से प्रभावित हुआ कुछ ऐतिहासिक विवरण लालढांग क्षेत्र में हुए समझौते और रोहिल्ला सत्ता के अंतिम दौर की घटनाओं से इसे जोड़ते हैं इस प्रकार लालढांग ने कुछ ही दशकों में सत्ता के बड़े परिवर्तन देखे रोहिल्ला शक्ति से अवध की सत्ता तक यहां एक ऐतिहासिक तथ्य स्पष्ट करना जरूरी है 1801 में नवाब सआदत अली खान द्वितीय ने ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी के साथ संधि के तहत बड़े भूभाग कंपनी को सौंपे थे उसके बाद बिजनौर और आसपास के क्षेत्रों पर ब्रिटिश प्रशासन का प्रभाव स्थापित हुआ और लालढांग भी धीरे-धीरे ब्रिटिश प्रशासनिक एवं वन व्यवस्था का हिस्सा बनने लगा यानी लालढांग ने एक अपेक्षाकृत छोटे भूभाग में सत्ता के कई दौर देखे हैं लालढांग के इतिहास को समझने के लिए ब्रिटिश काल के दस्तावेज विशेष महत्व रखते हैं। H. G. Walton के 1910 में प्रकाशित British Garhwal: A Gazetteer में इस क्षेत्र का उल्लेख मिलता है।
गजेटियर में लालढांग को रवासन नदी के मुहाने के पास स्थित वन क्षेत्र फॉरेस्ट स्टेशन के संदर्भ में वर्णित किया गया है इसमें कोटद्वार की ओर जाने वाले पुराने मार्ग का भी उल्लेख मिलता है जो श्रीनगर हरिद्वार मार्ग से अलग होकर रावासन नदी के पास लालढांग की ओर जाता था इस विवरण का एक महत्वपूर्ण पहलू यह है कि ब्रिटिश अभिलेखों में लालढांग गांव और वन क्षेत्र की प्रशासनिक स्थिति अलग-अलग संदर्भों में दिखाई देती है गजेटियर में लालढांग गांव को बिजनौर जिले से संबंधित बताया गया है जबकि आसपास का वन क्षेत्र तत्कालीन गढ़वाल प्रशासनिक व्यवस्था से जुड़ा था लालढांग को पहाड़ का प्रवेश-द्वार भी बताया गया है लालढांग की भौगोलिक स्थिति ही उसके ऐतिहासिक महत्व की सबसे बड़ी वजह रही एक ओर बिजनौर और गंगा का मैदानी इलाका दूसरी ओर कोटद्वार और गढ़वाल की पहाड़ियां और इनके बीच जंगलों से होकर गुजरने वाला पुराना मार्ग इसी रास्ते से कभी सैनिक गुजरते होंगे व्यापारी गुजरते होंगे पहाड़ों की ओर जाने वाले यात्री गुजरते होंगे और सत्ता की बदलती हुई परछाइयां भी गुजरती होंगी आज लालढांग राजाजी राष्ट्रीय उद्यान के निकट स्थित एक महत्वपूर्ण क्षेत्र है लेकिन इसकी पहचान केवल आधुनिक पर्यटन या वन क्षेत्र तक सीमित नहीं है इसके पीछे सदियों पुरानी भौगोलिक और ऐतिहासिक भूमिका छिपी है जैसे पांडुवाला के प्राचीन पुरातात्विक अवशेष 18वीं शताब्दी में रोहिल्ला प्रभाव नजीबुद्दौला और लालढांग का सामरिक महत्व 1752 के आसपास मराठा–रोहिल्ला संघर्ष 1774 के बाद अवध का प्रभाव 1801 में ब्रिटिश सत्ता का विस्तार ब्रिटिश काल में वन क्षेत्र और पहाड़ी मार्ग का महत्व
लालढांग को केवल हरिद्वार के पास बसा एक कस्बा समझना उसके इतिहास को बहुत छोटा कर देना होगा यह वही भूभाग है जहां मैदान और पहाड़ मिलते हैं जहां पुराने रास्ते इतिहास के पन्नों से जुड़ते हैं और जहां जंगलों के बीच आज भी बीते समय की कई कहानियां दबे पांव चलती हुई महसूस होती हैं लालढांग केवल एक तरह से बिजनौर के मैदान और गढ़वाल की पहाड़ियों के बीच इतिहास का एक पुराना दरवाज़ा है
तैय्यब अली स्वतंत्र लेखक एवं इतिहास शोधकर्ता (बिजनौर)
प्रमुख संदर्भ H G Walton, British Garhwal: A Gazetteer (1910) लालढांग एवं पांडुवाला से संबंधित उपलब्ध ऐतिहासिक और पुरातात्विक विवरण।

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