स्योहारा कविता

कोई मुझसे पूछे
मुझे अपने शहर से
इतनी मोहब्बत क्यों है—
तो मैं कहूँगा,
स्योहारा
सिर्फ़ नक़्शे पर बना
एक शहर नहीं,
यह उस मिट्टी का नाम है
जिसमें इल्म ने आँख खोली,
अदब ने करवट ली
और तहज़ीब ने
अपना घर बनाया।
यह वही सरज़मीं है
जहाँ मौलाना हिफ़्ज़ुर्रहमान स्योहारवी
की इल्मी रोशनी है,
हिलाल स्योहारवी
की फ़िक्र और शायरी है।
बैरिस्टर आसिफ़ अली
की जुरअत-ए-फ़िक्र है,
डॉ. ज्ञान चंद जैन
का अदबी ज़ौक़ है।
डॉ. अब्दुर्रहमान बिजनौरी
की इल्मी पहचान है,
और सिद्दीक़ा बेगम स्योहारवी
की अदबी आवाज़—
ये सब मिलकर
स्योहारा की उस तस्वीर को बनाते हैं
जिस पर हमें नाज़ है।
यहाँ किसी एक नाम की बात नहीं,
यहाँ तो
कितने ही नामों की रौशनी
एक ही शहर के माथे पर
सजती है।
कहीं किताब खुलती है,
कहीं शेर जन्म लेता है,
कहीं सवाल उठता है,
कहीं जवाब तलाश किया जाता है—
और इन सबके बीच
स्योहारा
चुपचाप
अपनी पहचान लिखता रहता है।
मैं इसी मिट्टी का हूँ।
मेरे लिए
स्योहारा सिर्फ़ मेरा शहर नहीं—
मेरी यादों का पहला पन्ना,
मेरी ज़बान की मिठास,
मेरी तहज़ीब की जड़
और मेरी पहचान का
सबसे ख़ूबसूरत नाम है।
और अगर कभी
मुझसे मेरी पहचान पूछी जाए,
तो मैं
अपना नाम नहीं बताऊँगा—
बस अपनी मिट्टी की ओर इशारा करके कहूँगा—
“मैं स्योहारा का हूँ।”
क्योंकि मेरे लिए
स्योहारा कोई शहर नहीं,
एक एहसास है—
जो मेरी रगों में बहता है,
मेरी ज़बान में बोलता है,
मेरी यादों में महकता है
और मेरी रूह में बसता है।
मैं जहाँ भी जाऊँ,
जिस शहर में भी रहूँ,
मेरे अंदर एक शहर
हमेशा आबाद रहेगा—
वो शहर,
जिसकी मिट्टी ने मुझे पहचान दी,
जिसकी फ़िज़ा ने मुझे तहज़ीब दी,
और जिसकी इल्मी विरासत ने
मुझे सिर उठाकर जीना सिखाया।
मेरा शहर स्योहारा—मेरी पहचान।
−उबैदुर्रहमान उर्फ़ फ़ैसल हिलाल।

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