सम्भल के सूबेदार हाकिम मिर्ज़ा का मकबरा

 कस्बा नहटोर के इस बदहाल मकबरे में मुगलकालीन सम्भल के सूबेदार हाकिम मिर्ज़ा

मुबारकुल्ला सो रहे हैं इन्‍होंने नहटोर में एक मस्जिद भी बनवाई थी. पढि़ए मिर्जा साहब के बदहाल मकबराा

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मुगल शासक अकबर के शासनकाल में संभल को सुबे का दर्जा प्राप्त हुआ करता था और मिर्ज़ा सुबे संभल के अधीन थे उस समय के सूबेदार, प्रान्तीय दीवान एवं चुंगी-अफसर कभी-कभी सरकार की आज्ञा के विरुद्ध काम किया करते थे और अधिकतर स्वार्थपूर्ण उद्देश्यों से ही ऐसा होता था। सूबे के प्रत्येक सूबेदार को एक मनसब मिला हुआ था। यह श्रेणी एवं लाभ से युक्त सरकारी नियुक्ति होती थी। अतएव सिद्धान्त रूप में प्रत्येक मनसब-प्राप्त सुबेदार को राज्य की सैनिक सेवा के लिए कुछ सिपाही भेजना आवश्यक होता था। इस प्रकार सुबे के अधिकतर सुबेदार थे तथा यह प्रबन्ध सेना, कुलीन वर्ग और असैनिक शासन सब-कुछ मिलकर एक था।मुगलो ने सम्भल के पदाधिका रियों को तेंतीस वगों में बाँटा, जिनमें दस सुबेदार से लेकर दस हजार के सेनापति तक थे।



उस समय के हकीम मिर्जा मुबारकुल्लाह का यह मकबरा तकरीबन 1556 में बना था यह ऊंचे टीले पर बना हुआ था इसके 4 दरवाजे हैं और दरवाजों पर आठ आठ ताक है जिनमे तिल के तेल से दिये जलाए जाते थे और एक विशाल गुम्बद बना हुआ है। यह मकबरा मुगलिया सरकार के दौर की शिल्पकारी का एक नायाब नमूना है इस मकबरे की तारीख की हैसियत इसलिए भी है कि सन 1805 में जब नवाब अमीर खां पिंडारी नहटोर में अंग्रेजों को यहां से भगाने के लिए आए थे तब हमने किए गये थे तो अंग्रेज शासकों ने अपने विरोधी जमीदारों को जागीर छीन कर उन पर अत्याचार करने आरंभ कर दिए थे उसी समय जागीरदार सैयद इमाम बख्श और उनकी गर्भवती पत्नी को इसी मकबरे में छिपाकर रखा गया था शरकशी ए बिजनौर में लिखा है कि उसी दौरान सैयद बुंदेल खाँ लेखिका कुर्तुल एन हैदर के परदादा हुआ करते थे इसी मकबरे में पैदा हुए किंतु आज यह तारीखी मकबरा अपनी बदहाली पर आंसू बहा रहा है कस्बा नहटोर में मौजूद यह गुंबद मकबरा यहां मुगलिया दोर की याद ताजा करता हैं वही पीर बाबा रहीमुद्दीन शाह की मजार हिंदू-मुस्लिम आस्था के केंद्र बनी हुई हैं
प्रस्तुति- तैय्यब अली

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