सराय जीवन
बिजनौर-नजीबाबाद मार्ग पर जीवन सराय रोहिल्ल खण्ड की पहचान रखने वाला गांव है सरकारी अभिलेखों में इस गांव का नाम सराय जीवन दर्ज है
बीबो बेगम और नवाब जहांगीर ख़ान की एक भुला दी गई प्रेम-कथा...!
नजीबाबाद का इतिहास केवल नवाब नजीबुद्दौला, पत्थरगढ़ और रोहिला सत्ता तक सीमित नहीं है इतिहास में एक ऐसी स्त्री की कहानी छिपी है जिसने अपने पति की असमय मृत्यु के बाद उसकी स्मृति को पत्थरों में अमर कर बिजनौीबो बेगम को नवाब नजीबुद्दौला के नवासे नवाब जहांगीर ख़ाँ की बेगम थी नवाब जहांगीर ख़ाँ का विवाह किरतपुर के कोटला मोहल्ले में हुआ था
विवाह के लगभग दो वर्ष बाद जब नवाब जहांगीर ख़ाँलाव लश्कर के साथ गौने की रस्म के लिए अपनी बेगम को लेने गए थे वापसी के दौरान जीवन सराय के निकट उत्सव की आतिशबाजी में छोड़ा गया बारूद का गोला नवाब जहांगीर ख़ाँ को लग गया था इस हादसे में नवाब जहांगीर ख़ाँ की मृत्यु हो गयी थी उस घटना से बीबो बेगम के जीवन में ऐसी शोक की लहर लेकर आई जिसने उनके पूरे जीवन की दिशा बदल दी थी
नवाब जादी बीबो बेगम का एक योगदान बीबो बेगम को नजीबाबाद की शाही जामा मस्जिद के निर्माण से भी जोड़ा जाता है उन्होंने अपने मेहर की रकम से लगभग 1800₹ के आसपास मस्जिद बनवाई और उसके लिए विशेष रूप से इमाम की तलाश की गई विभिन्न स्रोते से नगीना के सैयद अब्दुल गफूर शाह को जामा मस्जिद का पहला इमाम बनाया गया था
आज का यह छोटा सा गांव सराय जीवन इतिहास की परंपरा में उस दुर्घटना से जुड़ा है जिसने एक नवाब की जान ले ली और उसकी बेगम को ऐसा स्मारक बनाने के लिए प्रेरित किया जिसकी चार मीनारें सदियों बाद भी कहानी कह रही हैं
एक तरफ जीवन सराय का वह रास्ता जहां एक बारूद के गोले ने एक जीवन समाप्त कर दिया दूसरी तरफ चार मीनार जहां एक बेगम ने उसी जीवन की स्मृति को पत्थरों में बचाने की कोशिश की यह इस कहानी को केवल नवाबी इतिहास नहीं बल्कि इंसानी प्रेम और विरह की कहानी बनाता है।
शोध की दृष्टि से जहांगीर ख़ाँ की मृत्यु का निश्चित वर्ष बीबो बेगम की जन्म मृत्यु तिथि उनका विस्तृत वंश-वृक्ष और चार मीनार के निर्माण की निश्चित तारीख प्रमाणित रूप से नहीं मिलती इसलिए इन विवरणों को खोजने के लिए बिजनौर गजेटियर रोहिलखंड के औपनिवेशिक अभिलेख फारसी उर्दू तवारीख तथा पुरातत्व विभाग के पुराने अभिलेख देख कर सबसे महत्वपूर्ण अगला चरण लिखा जाएगा नजीबाबाद स्वयं नजीबुद्दौला द्वारा स्थापित रोहिला नगर था नजीबुद्दौला काल के अनेक स्थापत्य अवशेषों का उल्लेख करती है।
जीवन सराय आज सिर्फ एक जगह का नाम नहीं है यह गांव उस आखिरी सफर की याद है जहां नवाब जहांगीर ख़ाँ कभी नजीबाबाद लौटकर नहीं आए और चार मीनारें शायद बीबो बेगम के उस इंतज़ार की निशानी हैं जो मौत के बाद भी खत्म नहीं हुई
~तैय्यब अली स्वतंत्र लेखक एवं इतिहास शोधकर्ता, बिजनौर

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