रामजी वाला

 रामजीवाला 1857 की एक भूली-बिसरी कहानी


बिजनौर के मंडावर क्षेत्र का रामजीवाला गांव 1857 के विद्रोह के दौर की घटनाओं का साक्षी रहा है सर सैयद अहमद खान द्वारा प्रमाणित पुस्तक History of the Bijnor Rebellion के लेख में रामजीवाला का उल्लेख मिलता है 


1857 के गदर की चर्चा जब बिजनौर में होती है तो मेरठ बिजनौर शहर और नजीबाबाद रावली घाट जैसे बड़े नाम सामने आते हैं लेकिन रामजी वाला जैसे गांव भी उस उथल-पुथल के मूक गवाह रहे हैं मंडावर क्षेत्र का यह गांव उस दौर के सामाजिक तनाव और संघर्ष से जुड़ी घटनाओं का साक्षी बना 1857 मे गदर के दौरान इस गांव में फैली अशांति आपसी संघर्ष और सत्ता के कमजोर पड़ने ने पूरे इलाके की सामाजिक व्यवस्था को प्रभावित किया था।


रामजीवाला में लोगों का जुटना और उसके बाद आसपास के गांवों में हुए संघर्ष इस बात की याद दिलाते हैं कि 1857 केवल सैनिक विद्रोह नहीं था बल्कि क्रांति की लपटें गांवों और आम लोगों के जीवन तक भी पहुंची थीं आज रामजीवाला सामान्य गांव दिखाई देता है लेकिन इसकी मिट्टी में 1857 की उस उथल-पुथल की एक भूली-बिसरी कहानी दबी हुई है जिसे इतिहास के दस्तावेजों और पुरानी स्मृतियों के साथ फिर से सामने लाने की जरूरत है।


1857 में मेरठ की घटना की खबर बिजनौर पहुंचने के बाद जिले में प्रशासनिक व्यवस्था तेजी से कमजोर हुई और कई स्थानों पर लूटपाट तथा   संघर्ष शुरू हुई इसी अशांत दौर में मंडावर क्षेत्र के शाहबाजपुर और अबुल खैरपुर के आसपास घटनाक्रम बढ़ा ऐतिहासिक विवरण के अनुसार रामजीवाला की एक गूजर महिला से जुड़े विवाद  के बाद गूजर समुदाय के लोग रामजीवाला में  एकत्र हुए तो शाहबाजपुर की ओर हमला हुआ, जिसमें घरों को लूटा गया और कई मकानों में आग  लगा दी गयी इस संघर्ष में लोगों के मारे जाने और घायल होने का भी उल्लेख मिलता है। 


बरमपुर लूटकांड का विवरण कुछ इस प्रकार है बरमपुर रवा राजपुतो का एक समृद्ध और व्यापारिक गांव था 1857 मे गंगा पार से बड़ी संख्या में लोग यहां पहुंचे और गांव में कई दिनों  तक लूटपाट हुई मकानों की दीवारें तक खोदकर चांदी के रुपये और अशर्फियां निकाले जाने का  उल्लेख मिलता है राजपूतों के घरों को बाद में जला दिया गया सबसे रोचक बात यहां के खांड के  बड़े भंडार से जुड़ी है 


ऐतिहासिक विवरण में लगभग 30,000 मन खांड लूटे जाने और बची हुई खांड को गांव के पास एक तालाब में डाल दिए जाने की बात कही गई है इसी कारण स्थानीय परंपरा में उस तालाब को “खाड़वाली” नाम मिलने की कहानी प्रचलित है नकद धन अनाज खांड राब और शीरे सहित कुल नुकसान को उस समय  लगभग तीन लाख रुपये बताया गया है 


बरमपुर की कहानी मे 1857 का उथल-पुथल बिजनौर के बड़े शहरों से निकलकर गांवों की अर्थव्यवस्था, परिवारों और सामाजिक व्यवस्था तक कैसे पहुंचा।

यदि आप चाहते हैं तो बरमपुर लूटकांड” सर सैयद अहमद ख़ान की तारीख़-ए-सरकशी बिजनौर को‌ जरुर पढ़े सरकशी-ए-जिला-ए-बिजनौर सर सैयद अहमद ख़ान की 1857 के बिजनौर विद्रोह पर लिखी महत्वपूर्ण ऐतिहासिक कृति है इसका मूल लेखन 1858 में हुआ और बाद में इसका अंग्रेज़ी अनुवाद History of the Bijnor Rebellion  नाम से प्रकाशित हुआ था 


तैय्यब अली स्वतंत्र लेखक इतिहास शोधकर्ता  (बिजनौर)


Comments

Popular posts from this blog

हल्दौर रियासत

तारीख ए सरकशे जिला बिजनौर लेखक सर सैयद अहमद खां

बिजनौर है जाहरवीर की ननसाल