मुईन शादाब :
मुईन शादाब : छोटी सी बस्ती से वैश्विक क्षितिज तक का सफ़र।
डॉक्टर शेख़ नगीनवी
उर्दू साहित्य के इतिहास में कुछ नाम ऐसे होते हैं जो अपने आप में एक आंदोलन होते हैं। वे किसी बड़े शहर, किसी बड़ी यूनिवर्सिटी या किसी बड़े संस्थान के मोहताज नहीं होते, बल्कि अपनी मेहनत, लगन और ईश्वर-प्रदत्त प्रतिभा से अपना रास्ता खुद बनाते हैं। जिला बिजनौर की उपजाऊ धरती के ऐसे ही एक सपूत का नाम *मुईन शादाब* है।
10 अक्टूबर को जिला बिजनौर के गाँव रवाना के एक प्रतिष्ठित और शिक्षित परिवार में जन्मे मुईन शादाब का आज जन्मदिन है। यह सिर्फ एक शायर का जन्मदिन नहीं है, बल्कि बिजनौर से दिल्ली और दिल्ली से दुबई तक की एक सफल साहित्यिक और पत्रकारिता की यात्रा का उत्सव है। आज जब हम उनका यौम-ए-विलादत मना रहे हैं तो ये सिर्फ़ एक शायर की सालगिरह नहीं, बल्कि बिजनौर से दिल्ली, दिल्ली से दुबई तक की एक कामयाब अदबी और सहाफ़ती जद्दोजहद का जश्न है।
मोईन शादाब का बचपन उसी गंगा-जमुनी तहज़ीब में गुज़रा जिसकी मिट्टी में अदब की ख़ुशबू बसी है। इब्तिदाई तालीम घर पर हुई, उसके बाद मक़ामी मकातिब व मदारिस में तालीम हासिल की। क़स्बा राजा का ताजपुर से हाई स्कूल और तारीख़ी बस्ती स्योहारह के मशहूर-ए-ज़माना *एम.क्यू. (मुस्लिम क़ुदरत) इंटर कॉलेज* से इंटरमीडिएट किया। उनकी प्यास सिर्फ़ स्कूली तालीम तक महदूद न रही। रुहेलखंड यूनिवर्सिटी बरेली से वाबस्ता महाराजा हरीश चंद्र डिग्री कॉलेज मुरादाबाद से ग्रेजुएशन और पोस्ट-ग्रेजुएशन की डिग्रियाँ हासिल कीं। दिल्ली यूनिवर्सिटी से बी.एड., राजस्थान यूनिवर्सिटी से एम.फिल. (उर्दू) और जामिया मिल्लिया इस्लामिया नई दिल्ली से पीएच.डी.। इसके अलावा अदीब-ए-माहिर, अदीब-ए-कामिल, मोअल्लिम और आई.जी.डी. (बॉम्बे) जैसे कोर्स भी मुकम्मल किए। ये तालीमी तनों ही उनकी शायरी और सहाफ़त में नज़र आता है।
मोईन शादाब आज सिर्फ़ हिन्दुस्तान ही नहीं बल्कि आलमी सतह पर मुशायरों की जान हैं। लहजे का इन्फ़िराद, तरन्नुम की शीरीनी और मोअस्सर अंदाज़-ए-बयाँ की बुनियाद पर उनकी निज़ामत और शायरी बेहद पसंद की जाती है। हिन्दुस्तान के तक़रीबन तमाम बड़े शहरों के अलावा वो *मुत्तहिदा अरब इमारात, सऊदी अरब, दुबई, शारजाह, अबू धाबी, जद्दाह, क़तर, बहरीन* समेत दीगर ख़लीजी रियासतों में अपने फ़न की दाद हासिल कर चुके हैं। वो उन शुअरा में से हैं जिन्होंने परदेस में उर्दू को ज़िंदा रखा।
उनकी शायरी पर तब्सिरा करते हुए मारूफ़ नक़्क़ाद *नूरुल हसनैन* ने लिखा है:
"मोईन शादाब ने अपनी शायरी का आप ही एक जज़ीरा दरियाफ़्त कर लिया है, जिसमें उसकी अपनी तश्बीहात हैं, अपने इस्तिआरे हैं। किसी बात को पेश करने का उसका अपना अंदाज़ है। लहजे में एक नुदरत है। एक अनोखा बांकपन है।"
सीनियर शायर *फ़सीह अकमल* कहते हैं:
"मोईन शादाब ने किसी की पैरवी या ततब्बो किए बग़ैर अपनी राह ख़ुद निकाली और एक तवाना लहजे से उर्दू शायरी की बसात को मुज़य्यन करने का बीड़ा उठाया।"
और *डॉ. उमैर मंज़र* के बक़ौल:
"मोईन शादाब की शायरी की एक बड़ी ख़ूबी ये भी है कि वो सामईन के हाफ़िज़े का बहुत जल्द हिस्सा बन जाती है। चूँकि उनके शेरों में बर्जस्तगी, सफ़ाई और रवानी बहुत है, इसलिए ये अशआर जल्द हाफ़िज़े का हिस्सा बनने की सलाहियत रखते हैं। इस तरह की शायरी को हम सहल-ए-मुम्तनअ की हामिल भी कह सकते हैं।"
मोईन शादाब सिर्फ़ शायर नहीं, एक बाख़बर सहाफ़ी भी हैं। सहारा न्यूज़ नेटवर्क के उर्दू न्यूज़ चैनल में सीनियर एंकर और प्रोड्यूसर* की हैसियत से ख़िदमात अंजाम दे चुके हैं । इससे पहले वो *दूरदर्शन न्यूज़, दूरदर्शन उर्दू, ऑल इंडिया रेडियो और रेडियो की मॉनिटरिंग सर्विस* में न्यूज़रीडर और अनाउंसर के तौर पर काम कर चुके हैं। प्रिंट मीडिया में उनका तजुर्बा और भी वसीअ है। रोज़नामा राष्ट्रीय सहारा, रोज़नामा अख़बार-ए-मशरिक़, रोज़नामा फ़ैसल-ए-जदीद, रोज़नामा जदीद इन दिनों, रोज़नामा आईना-ए-आलम (मुरादाबाद), हिंदी शामनामा युग बंधु, हिंदी रोज़नामा बिजनौर टाइम्स, हिंदी शामनामा चिंगारी समेत कई रसाइल व जराइद में मुख़्तलिफ़ हैसियतों से काम किया है। मोईन शादाब की नस्री तख़्लीक़ात भी शायरी की तरह अहम हैं। उनके मज़ामीन के दो मजमूए *'अफ़्कार व इज़्हार'* और *'ताबीर व तफ़्सीर'* शाए हो चुके हैं। मुरत्तबा (संकलित) किताबों में
*'आईना-ए-हालात'*(हफ़्तरोज़ा आईना-ए-हालात के मुदीर इक़बाल राजा के इदारियों की तरतीब) *'गौहर-ए-नायाब'* (गौहर नूरपुरी की शायरी का कुल्लियात), *'बला-ए-जाँ'* (मोअम्मर सहाफ़ी व नई ग़ज़ल के शायर सलीम शिराज़ी का शेरी मजमूआ), बुज़ुर्ग शायर पी.पी. श्रीवास्तव 'रिंद' की शायरी का देवनागरी इंतिख़ाब *'सदियों के पर'* मंज़र-ए-आम पर आ चुके हैं। अनक़रीब उनका अपना शेरी मजमूआ *'अगर मैं सोचने बैठूँ'* मंज़र-ए-आम पर आने वाला है।
रुहेलखंड यूनिवर्सिटी की सिल्वर जुबली पर उन्हें उस वक़्त के गवर्नर *सूरजभान* के हाथों *'बेस्ट टैलेंट ऑफ़ कॉलेज अवार्ड'* मिला। 2014 में हुकूमत-ए-उत्तर प्रदेश की जानिब से *यू.पी. उर्दू अकादमी अवार्ड बराए इलेक्ट्रॉनिक मीडिया* और 2015 में हुकूमत-ए-दिल्ली की जानिब से उन्हें *उर्दू अकादमी दिल्ली की गवर्निंग काउंसिल और एग्ज़ीक्यूटिव काउंसिल* का रुक्न नामज़द किया गया इस के अलावा विभिन्न इदारों व तंज़ीमों की जानिब से उन्हें सम्मानित किया गया ।
मुईन शादाब ने अपनी कविता में नए विषयों और समकालीन मुद्दों को बड़ी कुशलता से उठाया है। उनके समकालीन कवियों में इसका उदाहरण मिल सकता है, लेकिन उनके समकालीन कवियों में यह दुर्लभ है। उनकी कथा शैली और अभिव्यक्ति की विधि बदलते समय की आवश्यकताओं के अनुरूप है। यही कारण है कि उनकी कविता लोगों को ताजगी का एहसास कराती है। नए प्रतीकों और नए रूपकों का प्रयोग उनकी कविता को एक नए प्रगतिशील विचार की घोषणा बना देता है। मोइन शादाब की कविता नई ग़ज़ल की एक ऐसी आवाज़ है जो परंपरा से जुड़े रहने के लिए एक नए परिवेश की तलाश में है। उन्होंने समय की नब्ज़ को विशेष ढंग से समझा है और ग़ज़ल की शास्त्रीयता का भी सम्मान किया है।
*चंद मुन्तख़ब अशआर - जो ज़बान-ज़द-ए-आम हैं:*
> किसी के साथ गुज़ारा हुआ वो इक लम्हा
> अगर मैं सोचने बैठूँ तो ज़िंदगी कम है
> ज़रा सी देर को तुम अपनी आँखें दे दो मुझे
> ये देखना है कि मैं तुम को कैसा लगता हूँ
> बहुत से दर्द तो हम बाँट भी नहीं सकते
> बहुत से बोझ अकेले उठाने पड़ते हैं
> मौजों से लड़ते वक़्त तो मैं उसके साथ था
> साहिल पे उसके हाथ में कोई और हाथ था
> कहाँ से लाओगे तुम इस क़दर जबीन-ए-नियाज़
> क़दम क़दम पे यहाँ आस्ताने पड़ते हैं
मुसन्निफ़ और मोहक़्क़िक़ *डॉ. शेख़ नगीनवी* ने उनके बारे में उनकी किताब "अफ़्कार ओ इज़हार" में लिखा है:
"मुईन शादाब ने छोटी सी बस्ती में रहते हुए अपनी तरक़्क़ी के रास्ते तलाश किए और अपनी शख़्सियत की इस अंदाज़ से तामीर व तश्कील की कि आज उनका नाम सिर्फ़ अपने या अपनी बस्ती या ज़िले के लिए ही नहीं बल्कि पूरे मुल्क के लिए इफ़्तिख़ार का बाइस बन गया है।"
बिलाशुबह मोईन शादाब बिजनौर का फ़ख़्र हैं, उर्दू सहाफ़त का मोतबर नाम हैं और नई ग़ज़ल का वो तवाना लहजा हैं जिसने रिवायत से जुड़े रहते हुए जदीद हिस्सियत को भी अपनाया है। अल्लाह तआला उन्हें सेहत व सलामती के साथ मज़ीद अदबी व सहाफ़ती ख़िदमात की तौफ़ीक़ दे। यौम-ए-विलादत बहुत बहुत मुबारक हो।

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