बिजनौर में है वेश्या का बनवाया मंदिर

बिजनौर में है वेश्या का  बनवाया मदिंर

आज की पीढ़ी को पता  नही कभीबिजनौर   जैसे छोटे शहर में कभी वेश्याओं   का पूरा मुहल्ला था।  इस  मुहल्ले में  एक वेश्या बनवाया मंदिर आज भी है।

शहर में पुरानी तहसील से आगे रामू हलवाई का  चौराहा है। कभी  यहां रम्मू हलवाई की दुकान थी ।  उसीके नाम पर चौराहे का नाम पड़ गया। रम्मू के चौराहे से पूरब की साइड में कभी सड़क के दोनों ओर वेश्याओं  की बस्ती थी ।  इस चौराहे  से अगले चौक  तक उनके ही घर थे ।  अधिकतर छोटी-छोटी कोठरियां  थीं। संपन्न वेश्यों के मकान कुछ बड़े थे। मुस्लिम काल तक ये मकान में रहकर गाना −बजाना कर ये लोगो का मनोरंजन करती थीं।  कुछ पेशा कर अपना जीवन यापन करते हैं।

यह यहां कब आकर बसी यह कोई नही जानता। प्राचीन ग्रंथों में 'गणिका' और 'नगरवधू' (जैसे वैशाली की आम्रपाली) का उल्लेख मिलता है। मुगल काल के दौरान यह 'तवायफ' संस्कृति और कोठों के रूप में अधिक संस्थागत हो गई। हालांकि शुरुआत में ये कला, संगीत और नृत्य के केंद्र थे, लेकिन धीरे-धीरे ये शारीरिक शोषण और वेश्यालयों में तब्दील हो गए। इस प्रथा में सबसे अधिक संगठित वृद्धि और इसका बाज़ारीकरण ब्रिटिश औपनिवेशिक काल  में हुआ। अंग्रेजों ने अपने सैनिकों की सुविधा के लिए सैन्य छावनियों (Cantonments) के पास 'चकला' (वेश्यालय) स्थापित किए।1864 के 'कैंटोनमेंट एक्ट' के तहत ब्रिटिश सरकार ने इसे बकायदा रेगुलेट किया।इसी दौर में राजघरानों का पतन होने के कारण संरक्षण खो चुकीं पारंपरिक नर्तकियों और 'देवदासियों' को मजबूरी में देह व्यापार की ओर धकेल दिया गया। इससे रेड-लाइट एरिया की अवधारणा का विस्तार हुआ।

लगता है  कि यह एरिया मुस्लिम काल में विकसित हुआ और अंग्रेजों के समय तक खूब फला −फूला। इस चौराहे से आगे चौराहे पार करते ही चौधरियों  का बनवाया हुआ मंदिर है।  बताते हैं कि  यह वेश्याएं पूजा −पाठ के लिए चौधरी के  मंदिर में जाती तो चौधरी उन्हें रोकते। चौधरी परिवार के  ही भाजपा  पदाधिकारी विनय  राणा कहते हैं कि  उनके परिवार के बुजुर्ग को पूजा के लिए वेश्याएं का अपने मंदिर में आना  पसंद नहीं था । वे विरोध करते थे।

ऐसे में सवाल था कि ये  पूजा के लिए कहां जाएं ।इन्हीं वेश्याओं में से एक  संपन्न वेश्या  ने अपने मुहल्ले  ने मंदिर बनाना तय किया । यह मंदिर इसी रोड पर तंबाकू वालों के घर से आगे बना । बताया जाता है कि इस मोहल्ले की प्रसिद्ध मोती रंडी ने ये मंदिर बनवाया ।  इस पर उसका नाम भी लिखा  था। 

यह  शिव मंदिर है मंदिर के आंगन में कुआं भी है। कुएं को जाल डालकर बंद करवा दिया गया। इस कुएं में पेड़ निकल जाए किंतु कुएं में चमकते छोटी ईंट यह बताती है की कुआं डेढ़ सौ से 200 साल पुराना है। मंदिर की दीवारे भी मोटीं हैं। मंदिर भी इसी दौर का होगा। इस मोहल्ले से वेश्याओं कब चली गई यह कोई नहीं बताता । बस सभी बताते हैं कि मोहल्ला वेश्याएं का था। वेश्याओं गई तो मंदिरों की देखरेख करने वाला भी कोई नहीं रहा । वेश्याओं के घर बिक गए। उनकी जगह और लोग आ गए । आज यहां बड़े-बड़े भव्य मकान बन गए ।कोठियां भी बनने लगी यहां रहने वालों ने खस्ता हो चुके मोती रंडी के बनवाए हुए मंदिर का सौंदर्यकरण  कराया। बनाने वाली मोती का नाम गायब हो गया। यहां पंडित जी के लिए भी कमरा बन गया है। कुछ नई मूर्तियां  लग गईं। काफी तरक्की हुई। मंदिर की दीवारें पुराने भवनों की जरह लगभग  एक गज मोटी हैं।

1956 (स्वतंत्रता के बाद): भारत सरकार ने सबसे बड़ा कानूनी कदम उठाते हुए 'अनैतिक व्यापार (निवारण) अधिनियम' (SITA) पारित किया (जिसे 1986 में ITPA नाम दिया गया)। इसके तहत वेश्यालय चलाना, दलाली करना और वेश्यावृत्ति के लिए मानव तस्करी को सख्त अपराध घोषित किया गया।लगता  कि इसके बाद सरकार  की सख्ती  और आर्य समाज के आंदोलन के कारण  ये बाजार बंद हुआ। 

इसी क्षेत्र के रहने वाले 93 वर्षीय पत्रकार वीपी गुप्ता स्वीकारते  हैं कि रम्मू के चौराहे से पूरब में कभी वेश्या रहती थीं। इनमें से एक वेश्या ने  पूजा पाठ के लिए मंदिर बनवाया था।  मंदिर पर उसका नाम भी  खुदा था। चौराहे के पास के रहने वाले संजय गुप्ता एडवोकेट भी बताते  है कि यहां कभी वेश्याओं का बाजार था। वे कहते हैं कि मंदिर के पास के सबसे बुजुर्ग राजेंद्र शर्मा के अनुसार मंदिर बनवाने वालीं  वेश्या का नाम मोती था।कभी इस क्षेत्र में रहे वरिष्ठ पत्रकार शिव कुमार शर्मा भी ऐसा  ही बताते हैं। वेश्याओं के रहने की बात सब स्वीकारते  हैं किंतु वे यहां  से कब गईं , कोई  नही बता पाता।नई बस्ती में भी  करबला के पास एक गली में  वेश्या का मकान था।  इसे एक शिक्षक ने बाद में  खरीद लिया था।     

अशोक मधुप 






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