गुर्टू फॅमिली हिस्ट्री


आदरणीय श्री प्रद्युम्न कृष्ण गुर्टू मेरे पिता थे जो 85 वर्ष की आयु तक बिजनौर के अपने पैत्रिक निवास में ही रहे | उनका हृदय एक चित्रकार का था इसीलिए उन्होंने अपने जीवन यापन का साधन फोटोग्राफी  अपनाया और जीवन पर्यंत वह उसी में लगे रहे | शहर के अन्य कलात्मक कार्यक्रमों जैसे कवि सम्मेलनों , मुशायरो और ड्रामें आदि के प्रति उनकी रुचियाँ थी जिन्हें वह बिजनौर में संपन्न करवाया करते थे | इसका मैं प्रत्यक्ष गवाह रहा हूँ | हॉकी उनका प्रिय खेल था , उसके टूर्नामेंट बिजनौर में वही आयोजित करवाया करते थे | प्रसिद्ध खिलाड़ी बाबू को उन्होंने बिजनौर आने का नियंत्रण दिया था और वह बिजनौर आए भी थे जिनकी मेजबानी गुर्टू साहब ने ही की थी और वे गुर्टू साहब के द्वारा चुने  हाकी टीम में से झम्मन लाल शर्मा को जो उस समय बिजनौर में अपने खेल का अच्छा प्रदर्शन कर रहे थे अपने साथ ले गए और भारतीय हॉकी टीम में शामिल किया जिन्होंने बाद में भारत की तरफ से ओलम्पिक में भी भाग लिया था ,| गुर्टू साहब हॉकी में एक कुशल रेफ़री के रूप में जाने जाते रहे थे | मुझे याद है जब 1962 में पहलीबार श्रीलंका की लड़कियों की टीम भारत आई थी  तो  गुर्टू साहब ने उस टीम को बिजनौर आने का निमंत्रण दिया था और वह टीम बिजनौर खेलने आई भी थी |

गुर्टू साहब एक कश्मीरी परिवार से सम्बन्ध रखते थे | उनका जन्म 1916 में एक छोटे से कसबे बिजनौर में ‘ पंडित आनंद कृष्ण गुर्टू के परिवार में हुआ था | गुर्टू परिवार की कहानी रैना परिवार से शुरू होती है इस  फॅमिली का इतिहास 400 साल से भी अधिक पुराना है जब भारत में औरंगज़ेब के शासनकाल में हिन्द -  कश्मीरियों को कश्मीर छोड़कर भागना पड़ा था | उत्तर में ऊँचे पहाड़ थे तो इनका पलायन दक्षिण की ओर हुआ | इस परिवार ने भी दक्षिण पूर्व की ओर , वर्तमान रूहेलखंड के जंगलों में भागकर शरण ली | यह परिवार कहाँ रहा कैसे रहा इसका कुछ ज्ञान आज नहीं है |

बिजनौर के अस्तित्व में आने के बाद यह रैना परिवार बिजनौर में आकर बस गया , चार पांच पीढ़ियाँ बीत गई | रैना फॅमिली के अंतिम व्यक्ति जो बिजनौर में रहे वह चांदम जी रैना थे जो तहसील दार थे | उनके ही सम्मलित कुटुंब की एक लड़की जो दिल्ली के गुर्टू परिवार में व्याही थी परन्तु दुर्भाग्य से बह जल्दी ही विधवा हो गई उस समय तक उनके बच्चे भी नहीं हुए थे , माता पिता ने उसे अपने पास बिजनौर बुला लिया ,  वह भी अपने पिता के घर वापस लौट आईं | पुत्र , पुत्री विहीन होने के कारण रैना परिवार के ही किसी रिश्तेदार ने एक लड़का उनकी गोद में दे दिया  और कहा गया तुम इसे अपने बेटे की तरह पालो | यही मेरे पड़दादा  पंडित महाराज कृष्ण गुर्टू थे | इनका चित्र आज भी हमारे घर में मौजूद है | वह पढ़े लिखे जानकार व्यक्ति थे | उनकी शिक्षा दीक्षा किस प्रकार और कैसे , कहाँ हुई  इसका हमें कोई ज्ञान नहीं है | कलात्मक वस्तुओं का उन्हें बहुत ज्ञान था कुछ को हमने देखा भी है जैसे आबनूस की लकड़ी का कटवर्क का छोटा संदूक | इसके अतिरिक्त उनको आयुर्वैदिक दवाओं का भी बहुत अच्छा ज्ञान था उनकी कई आयुर्वैदिक दवाइयों की शीशियाँ उसी संदूक में रखी रहती थी | जेवर रखने की संदूकची भी नक्काशीदार और बड़ी सी थी | उनके पुत्र थे पंडित आनंद कृष्ण गुर्टू और दो पुत्रियाँ ( ) उन्होंने अपने बेटे आनंद कृष्ण को उनकी कला में रूचि देखकर वृन्दावन भेज दिया , वहाँ उन्होंने सिरेमिक की टाइल्स बनाने का काम और चित्रकारी का काम सीखा |पड़दादा स्वयं ही घर चलते थे , और हमारी पड़दादी भी बहुत समझदार थीं तो घर सुचारू रूप से चलता था |एक धयान देनेवाली बात यह भी थी कि विस्थापित कश्मीरियों में कभी पर्दा प्रथा नहीं रही इसलिए वह भी घर के मामलों में उतना ही दखल रखती थी जितना उस घर का पुरुष वर्ग |

पंडित महाराज कृष्ण गुर्टू की दो बेटियां और एक बेटा था | एक बेटी का विवाह हुआ पर वह जल्दी ही इस फनी दुनिया से बिदा हो गई | उस समय लड़कियों की शादी बहुत जल्दी लगभग 9 या 10 साल तक हो जाया करती थी | दूसरी बेटी जिसका नाम जान किशोरी था उसका विवाह लाहौर ( अब पाकिस्तान में है ) के बकाया खान दान में हुआ था | जान किशोरी जी को मेरे पड़दादा ने घर पर शिक्षक रख कर हिंदी और उर्दू की शिक्षा दिलवाई | वह काफ़ी हौसले वाली महिला थीं | साधारण शक्ल सूरत वाली महिला थी यही उनका दुर्भाग्य साबित हुआ | उनका विवाह 9 साल की उम्र में कर दिया गया | उनकी सास को उनकी शक्ल पसंद नहीं आती थी जबतक वह छोटी थी इस बात को ठीक से समझ नहीं पाई पर 14 ,15 वर्ष की होते होते उनको असलियत समझ आने लगी और फिर उनका वहां रहने उनके लिए असह्य हो गया और एक दिन वह पडौस के किसी परिचित के साथ बिजनौर अपने पिता के घर लौट आईं | माता पिता तो फिर माता पिता ही होते है उन्होंने उन्हें सहारा दिया | उसके बाद जब उनके भाई का विवाह हुआ तो उनकी पत्नी ने भी अपनी ननद को बड़े सम्मान से रखा | 

बारह वर्ष की उम्र में हमारे  ( पंडित आनंद कृष्ण गुर्टू ) दादा जी का विवाह दरभंगा निवासी कश्मीरी शायद रैना फैमिली के परिवार की लड़की से कर दिया गया | मेरे पडदादा की मृत्यु लगभग 60 के आसपास रही होगी जब उनकी मृत्यु हुई | कहते हैं उनको किसी ने मूठ मार दी थी ( मूठ – मुठ एक तांत्रिक क्रिया होती है जिसका प्रयोग करके लोग अपने दुश्मनों की जान लेते हैं | यह तंत्र – मन्त्र आज भी भारत में प्रचलित है | हमारे पडदादा बहुत ईमानदार व्यक्ति थे उन्होंने कई रियासतों में काम किया था , शायद उनमें एक साहनपुर रियासत भी थी | अंत में वह किस रियासत में काम कर रहे थे इसकी भी कोई जानकारी हमें नहीं है | यह एक खोज का विषय हो सकता है |

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

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