मधुमक्खियों के हमले से झालू नही बना जिला
राजस्थान के झालावाड़ जनपद में
मार्क ड्रिल
के दौरान
मधुमक्खियों ने हमलाकर दिया।
मधुमक्खियों के हमले से बचने के लिए अधिकारी भागते
नजर आए1उत्तर
प्रदेश के ललितपुर में 25
मई को सीडीओ और एडीएम को भी
मधुमक्खियों ने हमलाकर घायल कर दिया।
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बिजनौर जनपद में भी मधुमक्खियों के दो हमले इतिहास में दर्ज हो गया। इनमें से एक की वजह से झालू जिला मुख्यालय बनने से रह गया।
1817 में बिजनौर जनपद की स्थापना हुई। सर्वप्रथम इसका
मुख्यालय नगीना बनाया गया। फिर कमीशन ने मुख्यालय के लिए भूमि तलाश शुरू की। फिर
झालू में मुख्यालय स्थापना की कोशिश की गई,
लेकिन यह रणनीति परवान नहीं चढ़
डिस्ट्रिक्ट गजेटियर के मुताबिक इससे
पहले बिजनौर मुरादाबाद का हिस्सा था। 1817
में यह मुरादाबाद से अलग हुआ। नाम मिला
नार्थ प्रोविस ऑफ मुरादाबाद। मुख्यालय बना नगीना। इसके पहले कलक्टर
बने मिस्टर बोसाकवेट।
नगीना के बाद जनपद मुख्यालय की
पहली पसंद अंग्रेजी हुकूमत के लिए कस्बा झालू था। झालू में जहां राजकीय बालिका
इंटर कॉलेज है, वहां से कुछ दूरी पर सहकारी समिति कार्यालय के पास अंग्रेज
कमिश्नर का कैंप लगा था।
कैंप के दौरान
अंग्रेज कमिश्नर की पत्नी को आराम के लिए झालू मुफीद लगा। उन्होंने अपने पति से
झालू को जिला बनाने की वकालत की। कमिश्नर इसके लिए तैयार हो गए थे। कमिश्नर की
पत्नी एक पेड़ के नीचे आराम कर रही थीं। पेड़ पर मधुमक्खी का छत्ता लगा था।
अंग्रेज की पत्नी को (डिंगारा ) मधुमक्खी चिपट गईं। कमिश्नर कर की पत्नी मधुमक्खी से बचने को वहां से भागीं।
मधुमक्खियों ने उनका पीछा नहीं छोड़ा। इस दौरान कमिश्नर पति और उनके
सिपहसालार भी उनकी मदद के लिए पहुंचे। थोड़ी देर बाद अंग्रेज कमिश्नर के पत्नी की
मौत हो गई। राजकीय बालिका इंटर कॉलेज के कैंपस में अंग्रेज कमिश्नर के पत्नी की याद में समाधि बनी। समाधि
आज भी मौजूद है। अंग्रेज कमिश्नर की पत्नी की मौत के बाद उनका झालू को जिला बनाने
का इरादा बदल दिया। इसके बाद अंग्रेज कमिश्नर ने बिजनौर को जिला बनाने पर अपनी
मोहर लगा दी। उन्होंने अपना कार्यभार एनजे हैलहेड को सौंपा। हैलहेड ने
नगीना से हटाकर बिजनौर को मुख्यालय बनाया।
1994 में उत्तराखंड (
तत्कालीन उत्तर प्रदेश का हिस्सा में) अरक्षण विरोधी आंदोलन तेज हुआ। अमर उजाला और
जागरण ने इस आंदोलन के समर्थन में खबरे प्रकाशित कीं। तत्कालीन मुख्यमंत्री उत्तर
प्रदेश मुलायम सिंह यादव इन अखबारों से नाराज हो गए।उन्होंने 12 अक्तूबर
1994 को सार्वजनिक रूप से इन अखबारों के खिलाफ हल्ला बोल आंदोलन शुरू किया।उन्होंने
समर्थकों से इन अखबार को पढ़ने और खरीदने का विरोध किया।सपा समर्थकों ने अखबार के
वितरण में बाधा डाली। इन अखबारों के कर्मचारियों पर हमले किए। इसी दौरान मुलायम
सिंह नगीना आए। नगीना के हिंदू इंटर काँलेज के मैदान में मुलायम सिंह की सभा
थी।
हल्ला बोल आंदोलन चल रहा था। ये पत्रकार इस आंदोलन के बावजूद कार्यक्रम में मीडिया गैलरी में मौजूद
था।मुलायम सिंह के हैलिकोप्टर उतरने के स्थल के पास किसी पेड़ पर मधुमक्खी का छत्ता
लगा था।हैलिकाष्टर की हवा से मधुमक्खी
उड़ने लंगी। उन्होंने हैलिकाप्टर स्थल पर एक सपा नेत्री पर हमला किया।उन नेत्री ने
भाग कर जान बचाई।मुलायम सिंह मंच पर बैठे थे। उन्होंने डीएम अशोक कुमार को मंच पर
बुलाया। अशोक कुमार मंच पर पंहुचे तो उन्हें देखकर लगा कि उनके सिर पर कुछ मकखिया उड़ रही है। मंच के अन्य नेताओं ने मुलायम सिंह को मधुमक्खी दिखाईं। मुलायम
सिंह ने डीएम से कहा यहां से जल्दी भागो। मंच के नेताओं को लगा कि कहीं ये मधुमक्खी
उनपर भी हमला न कर दें।
अशोक कुमार मंच से नीचे आ गए किंतु मधुमक्खियों का हमला उनपर जारी
रहा। वे अपनी कार में घुंस गए किंतु दो मधुमक्खी कार में भी पंहुच गईं।कार में
घुंसी मधुमक्खी मार कर डीएम का पीछा छुडाया गया। डीएम अशोक कुमार को चिकित्सकों ने
इंजैक्शन लगाए। सभा के बाद जब मैं उनसे
मिला।तो उन्होंने बताया कि उन्हें मधुमक्खियों ने कई
जगह काटा है।
सन् 1801 के आस-पास की बात है, नजीबुद्दौला
नजीबाबाद में आकर बस गया था। कुछ समय बाद उसने साहनपुर के जाट राजा को मारकर उस क्षेत्र
पर अपना कब्जा कर लिया था। इसलिए वह अपने आसपास की रियासतों की तुलना में अपने आप
को अधिक शक्तिशाली मानने लगा था। हल्दौर रियासत के रिकार्ड के अनुसार उसने क्षेत्र के हिन्दुओं को अनेक प्रकार से तंग करना
शुरू कर दिया। उन पर धर्म परिवर्तन का दबाव बना रहा था। उसने हल्दौर रियासत के पास
नजराना (टैक्स) वसूल करने का प्रस्ताव भेजा, इसको
हल्दौर के महाराज बुद्ध सिंह ने स्वीकार
नहीं किया।
महाराज बुद्ध सिंह ने दूरदृष्टि रखते हुए एक
कार्य योजना बनायी। हल्दौर रियासत के इतिहास के अनुसार इस योजना के पहले चरण में उन्होंने अपने सम्पर्क
के सभी क्षत्रियों को घोड़े सहित हल्दौर एकत्र होने का निमन्त्रण दिया। हल्दौर में
क्षत्रियों के एकत्र होने की सूचना नजीबुद्दौला को मिली, इसलिए उसने अपना दूत क्षत्रिय घुड़सवारों के एकत्र होने की जानकारी
के लिए हल्दौर रियासत में भेज दिया। नजीबुद्दौला के दूत को महाराज बुद्ध सिंह ने समझाया
कि घोड़ों के मेले लगा है। ये बात समझाकर उसे
सन्तुष्ट कर दिया। हल्दौर रियासत से दूत के वापस लौटने पर, महाराज बुद्ध सिंह की निश्चित योजना के
अनुसार सभी क्षत्रिय घुड़सवार युद्ध के लिए तैयार हुए। हल्दौर से गंगा नदी की ओर
चल दिये और वर्तमान बिजनौर के सामने रावली घाट पर गंगा नदी पार की तथा गंगा के
पश्चिम किनारे होते हुए चंडीघाट हरिद्वार पहुंच गये। इस योजना को नजीबुद्दौला समझ
नहीं पाया। घटना सन् 1810 के आस-पास की है जब नजीबुद्दौला की पांच हजार
घुड़सवार सेना नजीबाबाद व हरिद्वार के बीच आमसोत नामक स्थान पर डेरा डाले हुए थी।
इस छावनी की जासूसी गढ़वाल का रहने वाला एक भंडारी राजपूत कर रहा था। यह राजपूत
महाराज बुद्ध सिंह की कार्य योजना का खास नायक था। इस राजपूत ने चंडीघाट पर ही
महाराज बुद्ध सिंह को सूचना दी कि आमसोत के बनों में मधुमक्खियों के छत्ते बहुत
अधिक संख्या में लगे हैं। इसके अतिरिक्त उस क्षेत्र की विस्तृत जानकारी दी, जहां पर नजीबुद्दौला की फौज ने अपना डेरा डाल रखा था। इस जानकारी से महाराज
बुद्धसिंह ने अपने जवानों के मधुमक्खियों से बचाने का प्रबन्ध किया और फिर पेड़ों
पर लगे मधुमक्खियों के छत्तों को छिड़वा दिया। ऐसा
करने से नजीबुद्दौला की छावनी में भगदड़ मच गयी। इस मौके पर महाराज बुद्ध सिंह की
सेना तथा उनके सहयोगी राजपूतों ने फायदा
उठाकर नजीबुद्दौला की फौज पर आक्रमण कर दिया। यह लड़ाई तीन दिन तक चली। इसमें
महाराज बुद्ध सिंह के हाथों में तलवार धंस गयी और नजीबुद्दौला के कई सेनानायक इस
युद्ध में मारे गये।
अशाेक मधुप
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