स्व•सुबोध चंद शर्मा नूतन

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स्व० सुबोधचंद्र शर्मा 'नूतन'

एक उपेक्षित साहित्यकार

डा. महेश दिवाकर

जनपद बिजनौर की पावन भूमि को, अपनी गोद से अनेक लालों को जन्म देकर, भारत के विविध क्षेत्रों में उन्हें प्रतिनिधित्व के लिए भेजने का गौरव प्राप्त है।

विश्वप्रसिद्ध माँ भागीरथी ने जहाँ अपने कल-कल निनादित जल से इसका आंचल पावन करते हुए इसकी सीमाओं का अंकन किया है, वहीं भारत का मुकुट हिमालय इसे अपनी गोद में बिठाए मुस्कुरा रहा है। चक्रवर्ती सम्राट भरत की यह क्रीड़ा-स्थली, महर्षि कण्व का विद्यामयी आश्रम, महाराज विदुर की कुटी और गुरु द्रोणाचार्य का आश्रम, आदि भारतीय संस्कृति के महान दिग्गजों और पुरोधाओं को जन्म देने का गौरव और उनका पालन-पोषण करने का श्रेय इसी धरती को प्राप्त है। सामाजिक, राजनीतिक, धार्मिक, सांस्कृतिक, साहित्यिक ऐसा कौन-सा क्षेत्र है, जिसमें इसकी अनन्य सहभागिता नहीं रही है। मैं यहाँ साहित्यिक पक्ष को ले रहा हूँ। साहित्यिक दृष्टि से इस धरती ने असंख्य प्रख्यात एवं अज्ञात साहित्यकारों को जन्म दिया। स्व. दुष्यंत कुमार, स्व. पदमसिंह शर्मा, प्रकृति की विश्वप्रसिद्ध साहित्यिक मेधा और हिंदी साहित्य के लिए किए गए अविस्मरणीय योगदान को कौन भुला सकता है? इसी प्रकार श्री रामचंद्र जी 'वाचक' (रतनगढ़), श्री भगवंत शर्मा 'दर्द' (रतनगढ़), श्री भगवंतसहाय (नवादा), श्री सुबोधचंद्र शर्मा 'नूतन' (सिसीना), श्री दिग्विजय 'तसलीम', श्री शंभुनाथसिंह 'दानिश', श्री रामअवतार शर्मा 'उम्मेद', श्री मक्खनसिंह 'माखन', श्री काशीनाथ शर्मा, श्री जयकृष्ण शर्मा 'कृष्ण', श्री रामअवतार शास्त्री आदि-आदि के नाम उल्लेखनीय हैं। ये सभी साहित्यकार माँ भारती की सतत् सेवा करते हुए चिरनिद्रा में विलीन हो गए हैं। अपने जीवन में जीवन-पर्यंत सृजन में रत रहे, पर प्रचार से विरत भी रहे। ऐसे ही साहित्यकारों में स्व. सुबोधचंद्र शर्मा 'नूतन' का नाम उल्लेखनीय है।

श्री सुबोधचंद्र शर्मा 'नूतन' हिंदीभाषा और साहित्य के उदीयमान लेखकों और कवियों में अग्रणी रहे। हिंदी साहित्य के इस मार्तंड का जन्म 29 मई 1906 को सोमवार को जनपद बिजनौर के ग्राम सिसीना में चौधरी सूरजसिंह के सुपुत्र चौधरी हीरासिंह के यहाँ हुआ। आर्थिक दृष्टि से यह मध्यमवर्गीय परिवार था। किंतु 'त्यागी' परिवारों में इस परिवार का नाम बड़े ही आदर एवं सम्मान के साथ लिया जाता है। 'नूतन' जी अपने पिता चौ. हीरासिंह के सबसे छोटे पुत्र थे, जो पाँच भाई थे। क्रमशः सभी संतानों की मृत्यु होती चली गई और ईश्वर की कृपा से केवल श्री सुबोधचंद्र शर्मा 'नूतन' ही जीवित रह पाए।

श्री सुबोधचंद्र शर्मा 'नूतन' आरंभ से ही कुशाग्र बुद्धि के रहे। कवि ने पिता के सभी गुणों को जैसे स्वयं ही आत्मसात कर लिया था। ज्ञातव्य है कि कवि के पिता श्री चौ०हीरासिंह जी 'हीरा' भी स्वयं में एक समर्थ साहित्यकार थे।

'नूतन' जी बचपन से विनीत, विनम्र, मृदुभाषी, कठोर परिश्रमी, स्वाभिमानी, निर्भीक व्यक्तित्व के धनी रहे। आपकी प्रारंभिक शिक्षा कक्षा 1 से 4 तक उनके ग्राम सिसीना में ही हुई। उसी समय आपके परिवार में कुछ अज्ञात कारणों से कलह रहने लगी। स्वाभिमानप्रिय व्यक्तित्व को जब अपने घर का वातावरण रास नहीं आया तो वे अपना घरबार छोड़कर अपनी शेष शिक्षा के लिए ज्वालापुर (हरिद्वार के गुरुकुल) में चले गए और, वहीं से आपने अपनी उच्च शिक्षा पूर्ण की। आपने, संस्कृत, हिंदी और गणित में विशेष योग्यताएँ प्राप्त कीं। हिंदीभाषा एवं साहित्य की उस समय की सर्वोच्च परीक्षाएँ, 'साहित्यभूषण' और 'प्रभाकर' इत्यादि को आपने ससम्मान उत्तीर्ण किया। आपने अनूठी प्रतिभा थी। तत्कालीन प्रख्यात 'त्यागी' पत्रिका के तो आप प्रचारक, उद्धारक और लेखक भी रहे।

गुरुकुल हरिद्वार से उच्चशिक्षा ग्रहण करने के पश्चात् आप डीडवाना (मारवाड़) चले गए। वहाँ आपने टीचर्स ट्रेनिंग स्कूल से शिक्षण की उपाधि प्राप्त करते हुए हिंदी व गणित में विशेष योग्यता प्राप्त की। टीचर्स ट्रेनिंग प्राप्त करने के पश्चात् 1936 में आप पाली (राजस्थान) चले गए और वहाँ कई वर्ष तक शिक्षणकार्य किया। इसके बाद आप डीडवाना आए और वहाँ भी कुछ वर्षों तक शिक्षणकार्य किया। डीडवाना से आप सुमेरपुर (राजस्थान) आ गए और अंत तक यहाँ कार्य करके अपने निवास-स्थान सिसौना आकर रहने लगे।

श्री 'नूतन' ने जीवन-भर कठोर परिश्रम किया और अपने स्वाभिमान को कहीं भी आँच नहीं आने दी। वे कहते थे- "स्वाभिमान से विचलित हो जीवन व्यतीत करना, यह जीवन की मजाक उड़ना समझिए।" और, इसी मान्यता के अनुरूप ही उनका जीवन व्यतीत हुआ।

श्री 'नूतन' जीवन-पर्यन्त अपने शिक्षणकार्य के साथ साहित्य-सेवा में लीन रहे। आप एक अच्छे आलोचक, लेखक, संपादक और कवि थे। वे ज्योतिष के भी अच्छे ज्ञाता थे। आप भारतीय वेशभूषा, सभ्यता और निश्छलता के बड़े पक्षपाती रहे।

'नूतन' जी ने ज्योतिष, व्याकरण शिक्षा-पद्धति, को लेकर अनेक मौलिक पुस्तकों का सृजन किया। व्याकरण पर उनकी एक पुस्तक आनंद बुक डिपो, हल्दौर से भी प्रकाशित हुई। यह संक्षिप्त हिंदी व्याकरण की पुस्तक है। 'नूतन' जी के जीवन के अधिकांश वर्ष राजस्थान के सुमेरपुर, डीडवाना, बाली नामक स्थानों पर व्यतीत हुए यही कारण है कि उनका अधिकांश प्रकाशित साहित्य वहाँ प्राप्त होता है।

उनके पुत्र से प्राप्त 'नूतन' जी द्वारा लिखित 'नेताशतक' की हस्तलिखित पांडुलिपि मुझे देखने को मिली। इसमें भारतीय राजनीति के उतार-चढ़ावों को बड़े ही सुंदर ढंग से प्रस्तुत किया गया है। इसमें 'नूतन' जी के एक सौ से अधिक दोहे उपलब्ध हैं। उनकी दृष्टि में आज के नेता की बानगी देखिए—

नेता में गुण चार हैं, कौशल, अवसरवाद

वचन-तुष्टि 'नूतन' तथा सभा-मंच पर नाद

और—

दल-बदलू नेता घने, भारत में हैं आज

इस दल-बदली के लिए, आती इन्हें न लाज

इसके विपरीत एक अच्छे नेता के गुण भी देखिए—

सत्य-निष्ठ, निष्पक्ष जन, सनत स्वार्थ-विहीन

जनप्रिय नेता कठिन है, सुमति, सुदृढ़, स्वाधीन

'नेता शतक' में भारतीय राजनीति, नेताओं की कुर्सी आदि विषयों पर अधिकार लिखा गया है। उनका यह सृजन बड़ा ही सुंदर है, पैना व्यंग्य है और साहित्यिक हिंदी का प्रयोग आद्योपंत दर्शनीय है।

'नूतन सतसई' नाम से भी उनकी एक अन्य पांडुलिपि मुझे देखने को मिली, जिसमें धर्म, अध्यात्म, गीता, जीवन-मरण, उपदेश, भाग्य, कर्म, दुर्जन, स्त्री, माँ-महत्ता, कृषक, राष्ट्र आदि विषयों पर उनके एक हजार से अधिक दोहे संगृहीत हैं। अतः मैं तो इसे 'नूतन हजारा' ही कहना अधिक संगत मानूँगा, क्योंकि इस पांडुलिपि के मुखपृष्ठ पर कृति का नाम नहीं दिया गया है। लगता है कृति का आवरण पृष्ठ अपने मूल रूप में नहीं है। वस्तुतः इस पांडुलिपि के दोहे भी बड़े प्रभावशाली हैं।

आइए, इनकी भी बानगी लीजिए—

गीता-रामायण पढ़ी, ज्ञान हुआ नहि, खेद

मानव-मानव में किए, ऊँच-नीच के भेद

और—

देश-जाति-हित जो हुए, हँस-हँसकर बलिदान

उनके गौरव-गान की, बनूँ, मधुरतम तान

मानव-मानव से घृणा, करता धन से प्रीति

नीच-नराघम-नारकी, क्यों यह उल्टी रीति

माँ की महत्ता देखिए—

माता सम कोई नहीं, देव जगत् में जान

'नूतन' सबको छोड़कर, माँ का धर तू ध्यान

अस्तु, मानव-जीवन और समाज का एक भी ऐसा पक्ष नहीं है, जिसका अभीष्ट चित्र नूतन जी ने अपने दोहों में प्रस्तुत न किया हो। उनकी शैली गांभीर्य लिए हुए है। वह कहाँ-कहाँ दुरूह भी हो जाती है, किंतु साहित्यिक दृष्टि से उसकी उपादेयता असंदिग्ध है। उसके साहित्य का भावपक्ष एवं कलापक्ष उनके नाम के अनुरूप सर्वत्र 'नूतन' और सशक्त है। इस पर पृथक् शोध की आवश्यकता है। दुर्भाग्य है कि जनपद के किसी भी साहित्य-प्राध्यापक एवं अनुसंधित्सु का ध्यान 'नूतन' जी पर नहीं गया। उनका साहित्य अभी अप्रकाशित है। उसे संगृहीत कर प्रकाशित कराने की भी आवश्यकता है। साथ ही ऐसे जुझारू शोधार्थियों एवं शोध-प्राध्यापकों की भी आवश्यकता होगी, जो अपने निर्देशन में शोध कराकर नूतन-साहित्य को प्रकाश में ला सकें।

'नूतन' जी अपने जीवन के अंतिम दिनों में अपने पैतृक निवास सिसौना (बिजनौर) उ.प्र. आ गए और वहीं साहित्य-साधना करते हुए अंततः 25 जुलाई 1974 को चिरनिद्रा में विलीन हो गए। ऐसे उस महान् साहित्यकार को मेरी भाव-भीनी श्रद्धांजलि अर्पित है।

रीडर, हिंदी विभाग

गुलाबसिंह हिंदू कॉलेज, चांदपुर (बिजनौर)




 वर्धमान कालेज के बिजनौर अंक से साभार

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