हरिप्रकाश त्यागी

हरिप्रकाश त्यागी चित्रकार,  कवि , लेखक

डा  उषा त्यागी

हरिप्रकाश त्यागी का जन्म 15 नवम्बर सन् 1949 को ग्राम हरेवली (बिजनौर) में हुआ। आपके पिता जी का नाम श्री जबर सिंह एवं माता का नाम श्रीमती ज्वालादेवी था। गाँव में जमींदारी थी, लेकिन पिता देवबन्द (सहारनपुर) में हैड कान्स्टेबिल थे। उन्हें 'दीवान जी' कहकर संबोधित किया जाता था। कुछ पारिवारिक परम्परा और कुछ पुलिस विभाग में नौकरी के कारण वह रोबदार व्यक्ति थे।  कहा जाता है कि  दीवान जी को देवबन्द में किसी ने शराब में पारा मिलाकर पिला दिया ।इलाज के सिलसिले में वह अपने गाँव हरेवली आ गये आज के प्रसिद्ध व्यंग्यकार रवीन्द्रनाथ त्यागी के पिता वैद्य मुरारीदत्त शर्मा 'कविराज' ने उनका इलाज किया, लेकिन उन्हें कोई फायदा होता दिखाई नहीं दिया। इस घटना के आघात से हरिप्रकाश त्यागी की माता जी अपने पति से पहले ही चल बसी और इसके एक माह पश्चात दीवान जी भी स्वर्गवासी हो गये। परिवार के साथ-साथ हरिप्रकाश का पालन पोषण भी बड़े भाई सोमप्रकाश जी ने किया। बड़े भाई गरम मिजाज आदमी थे। अपने तेज तर्रार वाक्यों में गाली −गलौच को समुचित स्थान देते थे। इंटरमीडिएट परीक्षा उत्तीर्ण करने के पश्चात, हरिप्रकाश त्यागी दिल्ली अपने जीजा श्री हरिपाल त्यागी के पास रहकर कला की बारिकियां समझने लगा। उनके अनुसार, उसे लेकर मेरे मन में कुछ डर भी बना रहता था, क्योंकि बातचीत में वह रफ था, कुछ उजड्डपन उसमें आखिर तक रहा।

 

मूलतः हरिप्रकाश त्यागी क्या था, शायद ही कोई ठीक से बता पाये। वह चित्रकार था कि कवि था। कथाकार कि उपन्यासकार ? बुक कवर डिजाइनर कि कला समीक्षक? टी.वी. सैट डिजाइनर की कला समीक्षक? वह हसोड़ था कि भावुक कि गप्पी कि क्रूर कि अराजक या कि आत्मघाती ? वह गंवई था कि नागर? सबसे घुला मिला था कि निपट अकेला, सांसारिक था कि ब्रह्माण्ड में विचरण करने वाला कोई एकाकी नक्षत्र?

'नाखून उखड़ने की रात' (कविता संग्रह) 'दूसरा आदमी लाओ' (उपन्यास) 'जीवन दोस्तों की कहानियां' के सम्पादक के रूप में, त्यागी साहित्य के क्षेत्र में अपना स्थान ही नहीं रखता, बल्कि 'विकासशील देशों की समकालीन स्थितियों' और 'विश्व राजनीति' जैसी पुस्तकों के रूप में भी जाना जाता है।अपनी पेंटिंग और कविता के विषय में हरिप्रकाश त्यागी ने कहा था-'.....हम कविता को पेंटिंग में नहीं उतार सकते, न ही पेंटिंग को कविता बना सकते हैं। शब्दों का अपना महत्व और अर्थ है और रंगों का अपना। शब्दों और रंगों के माध्यम से अपना महत्वपूर्ण स्थान बनाकर हरिप्रकाश त्यागी 22 अप्रैल 1998 को इस संसार से विदा ले, अनन्त की ओर प्रयाण कर गये। समूचा कला/साहित्य जगत मर्माहत हो उठा। '...... वह दरअसल धीरे-धीरे अकेला पड़ता जाने वाला हरफन मौला किस्म का कलाकार था। एक तरफ वह अपने आस-पास के लोगों से दूर होता जा रहा था, तो दूसरी तरफ नये-नये सम्बंधों की जोड़-तोड़ में भागदौड़ करता रहता था। वह एक चित्रकार, कवि-कथाकार, निर्देशक और कला समीक्षक के रूप में जाता है। उसने हिन्दी को अनेक महत्वपूर्ण पत्रिकाओं के माध्यम से देश के जाने माने कलाकरों का परिचय हिन्दी पाठकों से कराया, और इस तरह साहित्य और कला के बीच एक पुख्ता पुल की भूमिका निभाई.....।  हरिप्रकाश, प्रतिबद्ध और रचनात्मक दोनों थे। कला/कविता/दोस्ती हर स्तर पर एक आन्दोलन की तरह थे वह। 494 विलक्षण प्रतिभा थी उस आदमी में।  साहित्य/संस्कृति और कला रूपी तिमंजिले आदमी का नाम था, हरिप्रकाश। 496 वह, हमारे प्यारे चाचा श्री थे..... बचपन से उनके सानिध्य में रहने का सौभाग्य सहज मिला..... कला और साहित्य में उनकी गहरी पैठ थी....... उन्हीं संस्कारों के कारण आज साहित्यिक अभिरुचि परिष्कृत हुई है..... एक खालीपन सा आ गया लगता है... ।

 

 डा उषा त्यागी की पुस्तक बीसवीं सदी के हिन्दी साहित्य संवर्द्धन में बिजनौर जनपद का योगदान

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आज जिनका जन्मदिन है
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हरिपाल त्यागी का जन्म 20 अप्रैल 1934 को महुवा, बिजनौर, उत्तर प्रदेश , में हुआ था। वे दैनिक भास्कर के कार्टूनिस्ट और भारत के एक प्रसिद्ध जनवादी पेंटर थे। उनके बनाए चित्रों की दर्जनों प्रदर्शनियाँ देश भर में लगीं और देश-विदेश के अनेक निजी संग्रहालयों में उनकी कलाकृतियों का संचयन है। व्यंग्य लिखने के मामले में हरिपाल का कोई तोड़ नहीं था। उनका व्यंग्य 'आदमी से आदमी' तक खूब प्रसिद्ध हुआ था। साहित्यिक जगत की किताबों पर बने चित्रों के लिए अक्सर हरिपाल की चर्चा होती थी।
सादी कागद हो भले, सादी हो दीवाल,
रेखन सौ जादूँ भरै, कलाकार हरिपाल.
इत-उत दीखें गंगजल, नाहीं जहाँ अकाल,
धरा धन्य बिजनौर की, जंह प्रगटे हरिपाल.
कभी बाबा नागार्जुन ने ये पंक्तियां हरिपाल त्यागी के लिए लिखी थीं। वह कथाकार, कवि, चित्रकार, लेखक, व्यंग्यकार, कला समीक्षक और सबसे बढ़कर एक बेहतर इनसान थे। इसीलिए उन्हें 'जनता का कलाकार' भी कहा जाता था। उनके रहन-सहन में एक गंवईपन एवं विचारों में अलग तरह की फक्कड़ी थी। वह लंबे समय से दिल्ली के सादतपुर इलाके में रहते रहे। यह इलाका राजधानी में गंवई आबोहवा का लुत्फ उठाने की सोच रखने वाले लेखकों, पत्रकारों, कलाकारों का गढ़ है।
उनके पिता का नाम शेर सिंह त्यागी तथा माता का नाम दयावती देवी था। साल 2014 में जब वह अस्सी साल के हुए थे तो साहित्यकार भोला नाथ त्यागी ने हरिपाल त्यागी के जीवन, बचपन की ढेरों बातें उजागर की थीं। उन्होंने लिखा था महुवा गाँव के नाम में एक नशीली महक है। ऐसी ही महक गाँव के लोगों की जिन्दगी में भी है। छोटा किसान परिवार, घर में गरीबी, और उससे भी कहीं ज्यादा कंजूसी थी। इस तरसाव ने हरिपाल के मन में चीजों के प्रति गहरी ललक पैदा कर दी। इसने चीजों को सहज ढंग से पाने में जो रस है, उससे कहीं ज्यादा रस घोल दिया।
ब्लड कैंसर से लड़ते हुए 1 मई, 2019 को 85 वर्ष की आयु में दिल्ली में उनका निधन हो गया।

उनकी स्मृति को नमन −रजनीकांत शुक्ला

https://www.amarujala.com/uttar-pradesh/meerut/haripal-tyagi-died-who-made-pictures-of-poetry-collections-of-great-poet-harivansh-rai-bachchan



क्या हाल हैं, हरिपाल त्यागी!
अनिल अत्री व्यवहार में थोड़े अड़ियल, कड़ियल और जिद्दी, लेकिन भीतर से विनम्र, भोले, बेलौस, जिंदादिल और ख़ुशमिजाज। जितने बड़े चित्रकार, उतने ही बड़े कवि-लेखक भी। आज जो गिने-चुने नाम बाज़ारवाद की आँधी के खिलाफ वैचारिक धरातल पर मज़बूती से अपने पाँव जमाए खड़े हैं, उनमें उनका का नाम सम्मान के साथ है। चित्रकला हो अथवा लेखन- कला और भाषा का मुहावरा उन्होंने स्वयं गढ़ा है। मैं यहाॅं बात कर रहा हूँ रचनात्मक बेचैनी, ऊर्जा और संवेदनाओं से भरपूर, मानवीय पीड़ा के सशक्त एवं विलक्षण चित्रकार हरिपाल त्यागी (Haripal Tyagi) की। रंगों और रेखाओं ही नहीं, वह शब्दों के भी जादूगर हैं।
त्यागी जी दिल्ली के सादतपुर में रहते हैं, लेकिन उनके घर और मन दोनों में आज भी भरा-पूरा गाँव बसता है। ऐसे, जैसे उनका बिजनौर का गाँव 'महुआ' सादतपुर में समा गया हो। घर के एक छोटे हिस्से को उन्होंने आज भी कच्चा छोड़ रखा है। वह कहते हैं कि, ‘जिस घर में मिट्टी ही न हो वह घर कैसे हो सकता है!'
हरिपाल त्यागी पर लिखना कठिन काम है। चित्रकला एवं लेखन की तरह उनका पूर्ण जीवन विविधतापूर्ण है, इसलिए उनका सहज विश्लेषण संभव नहीं है। त्यागी जी से मेरा पहला परिचय 1995 के आसपास हुआ। यह मुलाकात कथाकार डॉ. माहेश्वर ने कराई थी। लेकिन त्यागी जी को ठीक से तब जाना जब 1998 में प्रकाश मनु जी, जो उस समय हिन्दुस्तान टाइम्स की पत्रिका नंदन में कार्यरत थे, ने उनके व्यक्तित्व एवं कृतित्व पर केंद्रित पुस्तक ‘सुजन सखा हरिपाल’ का संपादन किया। पुस्तक का शीर्षक बाबा नागार्जुन की कविता की एक पंक्ति से लिया गया है, जो बाबा ने त्यागी जी पर लिखी थी। उन दिनों मैं चंद्रशेखर जी (पूर्व प्रधानमंत्री) की साप्ताहिक पत्रिका ‘यंग इंडियन’ का कामकाज संभाला करता था। मनु जी ने पुस्तक की दो प्रतियां मुझे दीं और विशेषतौर पर कहा कि, ‘अनिल मुझे खुशी होगी यदि तुम खुद इसे पढ़कर इस पर अपनी टिप्पणी लिखो।‘ ‘सुजन सखा हरिपाल’ ने मुझे त्यागी जी को जानने-समझने में बड़ी मदद की। उसके बाद जब मैंने सादतपुर रहना शुरू किया तो, वहां की साहित्यिक मंडली के साथ ( जिसमें त्यागी जी भी शामिल थे) बात-मुलाक़ात का मौक़ा मिलने लगा। जोशी मठ (सुरेंद्र जोशी के घर को यह उपनाम दे दिया गया था) की नियमित बैठकी में, जिसमें त्यागी जी के अलावा विष्णु चंद्र शर्मा, सुरेश सलिल, रामकुमार कृषक, हीरालाल नागर, महेश दर्पण, वीरेंद्र जैन और कभी-कभी राधेश्याम तिवारी तथा कई अन्य नामचीन लेखक आते थे, मेरा भी आना-जाना शुरू हो गया। कई बार त्यागी जी, रामकुमार कृषक, सुरेश सलिल आदि टहलते हुए मेरे घर तक भी आ जाते थे।
बहरहाल, बीते एक दशक से मैं उन्हें 'पापा' कहता आ रहा हूँ- उनकी बेटी श्वेता मेरी संगिनी है। लेकिन इन सबसे ऊपर वह आज भी मेरे 'दोस्त' हैं। उनके व्यक्तित्व में अद्भुत सम्मोहन है। गाँव की सरलता और भोलेपन को वह आज भी अपने भीतर जीते हैं। देहातीपन से लबालब हैं, यह स्वीकार करने में वह संकोच भी नहीं करते। गाँव से गहरा नाता उनकी कई कहानियों में झलकता है, तो ‘मेरे गांव का लड़का’, ‘ग्रामसी’, ‘एक उदास किसान’, ‘दो बहनें’ और ‘सादतपुर की औरतें’ सरीखी पेंटिंग्स में भी।
1955 में उनके पिता काम की तलाश में सपरिवार दिल्ली आ गए। यहाँ उन्होंने एक प्रेस में नौकरी कर ली। उनके पिता अपनी प्रेस में चित्रकारी का जो थोड़ा-बहुत काम निकलता वह उनके लिए ले आते। यहां से ही त्यागी जी के कलाकर्म की शुरुआत होती है। कुछ अंतराल के बाद त्यागी जी भोपाल चले गए और वहाँ ‘दैनिक भास्कर’ और ‘लोकदर्पण’ के लिए कार्टून बनाने लगे। करीब एक साल भोपाल में काम करने के बाद वह दिल्ली वापस लौट आए और 'दिल्ली प्रेस' की पत्रिकाओं के लिए चित्र बनाने लगे। इसी समूह की पत्रिका ‘मुक्ता’ में जब शूद्रक के मोहन राकेश द्वारा अनुदित नाटक ‘मृच्छकटिकम’ को प्रकाशितकरने का निर्णय किया गया। इसके लिए त्यागी जी का चयन किया गया। इस नाटक के लिए उन्होंने जो चित्र बनाए, वह पत्रकारिता जगत में चर्चा का विषय बन गए। चित्र प्रभावपूर्ण तो थे ही कलात्मक भी थे।
काम के सिलसिले में त्यागी जी कमलेश्वर से मिले जो उस समय ‘नई कहानियां’ के संपादक थे। यह मुलाकात दोनों के बीच मित्रता में बदल गई जो अंत तक कायम रही। उसके बाद वह हिंदुस्तान टाइम्स की पत्रिका ‘नंदन’ से जुड़े। लेकिन वहाँ भी अधिक समय तक नहीं टिके। क्योंकि, वह इस नौकरी को अपनी ‘आजादी’ में खलल मानने लगे थे। 1964 में हिन्दुस्तान टाइम्स की नौकरी जो छोड़ी तो फिर किसी नौकरी के बंधन में नहीं बंधे।
अब वह छोटी-बड़ी पत्रिकाओं के लिए स्वतंत्र रहकर काम करने लगे। और फिर राजकमल के लिए किताबों के आवरण का जो सिलसिला शुरू हुआ, उसने उन्हें प्रकाशन और लेखक जगत में प्रसिद्धि के शिखर तक पहुँचा दिया। एक बार मोहन राकेश ने किसी पुस्तक के लिए बनाए उनके आवरण को देखकर कहा था कि, ‘हरिपाल, तुम आवरण चित्र नहीं बनाते, अपनी पेंटिंग को उठाकर आवरण पर रख देते हो।‘
त्यागी जी की पहली एकल प्रदर्शनी श्रीधराणी, नई दिल्ली में लगी। साल था 1969 और शीर्षक- ‘महानगर’। इसका उद्घाटन उनके अभिन्न मित्र मोहन राकेश ने किया था। इस श्रृंखला में प्रदर्शित उनकी पेंटिंग्स प्रयोगवादी नजरिए से तो अपना प्रभाव छोड़ने में सफल रही, साथ ही महानगरीय द्वंद्व, संत्रास, कुंठाएं, अकेलापन, बेबसी, संबंधों की सघनता के उभार में भी विलक्षण थीं। सच तो यह है कि इन पेंटिंग्स में खुद उनका कठिन संघर्ष और पीड़ा कैनवास पर उतर आए थे।
प्रगतिशील लेखकों के साथ का असर था या त्यागी जी की आत्मिक बेचैनी कि 1970-71 आते-आते वह मार्क्सवादी विचारधारा से जुड़ गए। कामरेड हरिपाल के जीवन का एक बड़ा हिस्सा मार्क्सवादी-लेनिनवादी जनांदोलन की भेंट चढ़ गया। वह पार्टी के फुलटाइमर वर्कर बन गए थे। आपातकाल में लंबे समय तक भूमिगत रहे। इस दौरान उन्होंने पटरी पर आ चुके अपने काम को भी तिलांजलि दे दी। राजनीतिक वर्कर बनने का ख़ामियाज़ा उन्हें और परिवार को कई मोर्चों पर चुकाना पड़ा।
लेकिन इससे उन्हेंं लाभ भी मिला। एक तो यह कि वह देश के महानगरों से लेकर दूर-दराज के गाँव-कस्बों की यात्रा कर सके। इसने उन्हेंं अनुभवसंपन्न तो बनाया ही, लोकमानस और लोकव्यवहार को करीब से देखने-समझने का अवसर भी दिया। दूसरे यह कि, मार्क्सवाद का गहन अध्ययन करने से, उनमें ग़ज़ब की सामाजार्थिक एवं राजनीतिक समझ विकसित हुई।
समय के साथ घुमक्कड़ी आदत ने भारतीय लोककलाओं और लोकसंस्कृति में हरिपाल की रुचि को और भी गहरा कर दिया। समाज के विभिन्न समुदायों और वर्गों के बीच रहकर हरिपाल ने गरीबी भूख, लाचारी, बेबसी, पीड़ा को करीब से देखा और उसे अपने कैनवस पर उतारा। उनके लेखन में भी समाज की इन विसंगतियों को देखा-समझा जा सकता है। हालांकि शहर-शहर गाँव-गाँव घूमकर लोकजीवन और कलाकृतियों के अध्ययन की उनकी यात्रा आज भी अनवरत जारी है।
वह बेकार किसी चीज को नहीं मानते चाहे वह वस्तुएं हों अथवा इंसान। सभी में कोई न कोई गुण वह तलाश ही लेते हैं। अपनी कई पेंटिंग्स में उन्होंने ऐसी बहुत-सी वस्तुओं का प्रयोग किया है, जिन्हें आप बेकार समझकर फेंक देते हैं।
चाय कैसे बनाई जाती है, यह मुझे त्यागी जी ने ही सिखाया। वैसे ख़ुद उन्हें भी चाय के अलावा कुछ और बनाना आता नहीं। उनके शब्दों में कहूं तो ‘खिचड़ी बना लेता हूँ, लेकिन इस बात की गारंटी कतई नहीं लूंगा कि वह आपको पसंद आए ही।‘ हाँ, रसोई में यदि दूध पर मलाई आई हो, तो इस बात की गारंटी जरूर है कि, त्यागी जी मौका मिलते ही उस पर हाथ साफ़ कर जाएँगे। खाने के बेहद शौकीन हैं। डाक्टर और दवाओं से परहेज है। अपना इलाज ख़ुद करते हैं। आयुर्वेद और प्राकृतिक चिकित्सा पर भरोसा है। बहुत मुश्किल से दवा लेने पर राज़ी होते हैं। कहते हैं कि यह दवाई नहीं बीमारी का दूसरा नाम है।
क्रिकेट और शास्त्रीय संगीत का बेहद शौक है और गाते भी अच्छा हैं। रात को दस बजे तक सो जाना पसंद है। लेकिन यदि क्रिकेट का मैच आ रहा हो तो उनकी यह दिनचर्या भंग हो जाती है। फिर देर रात तक भी जागकर मैच देख सकते हैं। लेकिन सुबह वही पांच बजे उठ जाते हैं।
उनका मित्र कोई भी हो सकता है। एक आईएएस से लेकर रिक्शाचालक तक और 8 साल के बच्चे से 80 साल के वृद्ध तक। हालांकि वह स्वयँ को वृद्ध कहलाना कभी पसंद नहीं करते।
काम के वक्त वह किसी दूसरी ही दुनिया के प्राणी हो जाते हैं। घर में कौन आ रहा है, कौन नहीं। पंखा चल भी रहा है कि नहीं। यह सब बातें गौण हो जाती हैं। उस वक़्त एकांत पसंद करते हैं। आज भी सुबह तीन से पाँच किमी पैदल चलते हैं। व्यस्त इतने मानो उनके पास समय कुछ कम ही है। आँखें छोटी हैं, लेकिन उनमें ग़ज़ब का पैनापन है। अपने आसपास सामाजिक विसंगतियों ही नहीं, आदमी को भी बहुत सूक्ष्मता से परखने की क्षमता है। खाली न बैठते हैं, न किसी का बैठा रहना पसंद करते हैं। या तो पेंटिंग करेंगे या पढ़ेंगे-लिखेंगे। सिद्धान्त और मूल्यों के मामले में त्यागी जी ने अपने मित्रों ही नहीं, बल्कि प्रकाशकों और संपादकों की भी खबर लेने में गुरेज नहीं किया। वक़्त पड़ने पर कई बड़े नामों को उनका कद दिखाया। उनके बारे में कई किस्से मशहूर हैं। साहित्य और कला के प्रति इस हद तक कमिटमेंट मैंने अपने जीवन में नहीं देखा। हाजिर जवाब हैं। लेकिन थोड़े मुँहफट भी। लेकिन दिल प्रेम से भरा हुआ है। दरअसल, वह वैसे ही हैं, जैसा उन्हें होना चाहिए।
उनका लेखन बौद्धिक हदबंदी की विद्रूपताओं से परे है। उनकी कविताओं में नए किस्म के काव्यास्वाद का अनुभव होता है। ‘डस्टबिन से उठती आवाज’ पढ़िए इतनी ग़ज़ब की व्यंग्यात्मक चोट त्यागी जी ही कर सकते हैं। बाबा नागार्जुन और त्रिलोचन के साथ उनकी गहरी और आत्मीय ऊठ-बैठ रही है। शायद यही कारण है कि भाषा के स्तर पर भी वह उनके साथ तालमेल करते दिख जाते हैं।
अपनी पुस्तक ‘महापुरुष’ में जो व्यंग्य उन्होंने लिखे हैं, मुझे लगता है कि उसकी उस तरह से लोगों ने चर्चा की नहीं जैसी होनी चाहिए थी। इस पुस्तक में त्रिलोचन, कमलेश्वर, राजेन्द्र यादव, विद्यानिवास मिश्र, अशोक बाजपेयी, नामवर सिंह, निर्मल वर्मा, रवीन्द्रनाथ त्यागी के अलावा उन्होंने खुद पर भी व्यंग्य-चित्र लिखा है। ‘महापुरुष’ में उनकी भाषा-शिल्प की धार और लय ने व्यंग्य की एक नई परिभाषा गढ़ने का काम किया।
त्यागी जी ने एक कहानी संग्रह के अलावा व्यंग्य की एक पुस्तक, कुछ कविताएं, संस्मरण और एक आत्मकथात्मक उपन्यास के अलावा कला पर पुस्तक ‘भारतीय कला: उद्भव और विकास’ हाल में पूरी की है, जो प्रकाशन विभाग से आ रही है। ‘डाइनिंग टेबल’, ‘खुशी’, ‘छुट्टी का दिन’ और ‘बास्सा कल्लूगिर का चोगा’ जैसी कहानियाँ अपने विषय एवं भाषा-शिल्प के मामले में बेजोड़ हैं। ‘डाइनिंग टेबल’ एक चित्रकार की अंतर्वेदना और छटपटाहट की लंबी कहानी है। ‘खुशी’ एक छोटी लेकिन बड़ी प्रभावपूर्ण कहानी है। ऐसी संवेदनशील भाषा का इस्तेमाल कोई समर्थ लेखक ही कर सकता है। अपनी आत्मकथा ‘अधूरी इबारत’ में उन्होंने काल परिवेश को शब्दों में पिरोया है। त्यागी जी की भाषा पर पकड़ और शब्द सामर्थ्य की उनके समकालीन तमाम बड़े लेखकों ने समय-समय पर प्रशंसा की है। चार दशक पूर्व मुंबई प्रवास के दौरान मछुआरों की बस्ती में रहकर न केवल उसके भावपूर्ण स्कैच बनाए बल्कि ‘मत्स्यगंधाओं की नगरी में’ काव्यात्मक गद्य भी लिखा। भाऊ समर्थ पर लिखा उनका संस्मरण हर दृष्टि से बेजोड़ है।
त्यागी जी ने चित्रकला की विधिवत शिक्षा नहीं ली। न ही कभी अकादमिक झगड़े-झंझटों में ही फँसे। न कभी उन चालाकियों को आत्मसात किया जिनके सहारे वह पैसा और पुरस्कार पा सकते थे। लेकिन, चूँकि बहुत धनवान होना उन्हें ‘वल्गर’ लगता है। सो, जो कुछ किया कला के लिए किया। वह कहते भी हैं कि, ‘मैं पेंटिंग्स बाजार के लिए नहीं बनाता। मैं कलाकार हूँ और कला रचता हूँ।.... एक आम आदमी के जीवन-स्तर का चुनाव मैंने स्वयं किया है। यह मेरी जीवनशैली और कला के लिए जरूरी है।‘
उनके चित्रों में स्पेस का अलग महत्व है.....टैक्सचर और कंपोजीशन भी लाजवाब है, यहाँ लयात्मकता और रागात्मकता देखते ही बनती है। उनके चित्र जीवन के नए सौंदर्यबोध को दर्शाते हैं। रंगों से अधिक रेखाओं पर पकड़ है। उनकी पेंटिंग्स में नीला और लाल रंग है। इसका इस्तेमाल ज्यादा है। जो धीरे-धीरे उजास में बदलता दीखता है। वह कहते हैं कि, ‘मेरे लिए चित्रकला सतत् खोज की एक प्रक्रिया है, जिसमें तुष्टि और असंतुष्टि- दोनों अनुभव गुंथे हुए हैं और दोनों का आपसी रिश्ता अविभाज्य रूप से सूक्ष्म है।‘
त्यागी जी संघर्षों को पीठ दिखाकर भागे नहीं बल्कि उन्हें अपने भीतर जीया और अपनी ताकत बनाया। ऐसा भी नहीं कि इन संघर्षों में वह अकेले ही भागीदार रहे। इनके परिवार ने भी उनकी जिद का बड़ा मूल्य चुकाया है। वह कहते हैं कि, ‘कलागत मूल्यों से ही जीवन-मूल्यों की प्रेरणा ग्रहण करते हुए मैं मानवीय करुणा का चित्रकार हूँ ....।‘ शायद इसीलिए उनके चित्रों में आप जड़ता की बजाए बेचैनी, आक्रोश और उद्वेलन को महसूस करेंगे। त्यागी जी की कृतियाँ वर्तमान लोकजीवन के राग-रंग ही नहीं, भविष्य के लिए हो रहे संघर्ष को भी बखूबी स्पेस देते हुए आख्यानधर्मी हो उठती हैं। रंग और शब्द हरिपाल के लिए बने हैं तो हरिपाल रंग और शब्दों के लिए बना है।
यह सचमुच हैरान कर देने वाली बात है कि बेहद प्रयोगधर्मी और संयोजन में अर्थमयता के बावजूद उनकी पेंटिग्स पर कला-आलोचकों ने बहुत कम ध्यान दिया। और, एक तरह से इस वरिष्ठ कलाकार की लगातार उपेक्षा की, उनके बहुमूल्य अवदान को कम करके आँका। चाहे चित्रकला हो अथवा लेखन हरिपाल का उचित मूल्यांकन अभी बाक़ी है।
उनके बनाए चित्रों को आप घंटों निहार सकते हैं। आप उनके चित्र देखिए। देखते रहिए। ...और यकीन मानिए, वह बोलने लगेंगे। बरबस खींच लेंगे, अपने भीतर, जहाँ आप उनके रंगों और रेखाओं के साथ चहलक़दमी कर सकते हैं। संवाद स्थापित कर सकते हैं। वह कहते हैं कि कला में बँधनमुक्त होने का सिलसिला बराबर बना रहता है और वह एक स्वतंत्र विधा है। अत: उसे किसी खास किस्म के खाँचे में नहीं बाँधा जा सकता। और त्यागी जी कभी खुद भी लकीर से बंधे नहीं, जड़ता के बंधनों को ध्वस्त करते आगे बढ़ते रहने की अनवरत यात्रा जो उन्होंने शुरू की वह आज भी निरंतर जारी है।
जब भी कोई त्यागी जी से मिलता है, वह चाहे जिस स्थिति या मनोदशा से गुजर रहे हों, चेहरे पर निश्छल मुस्कान लिए अपने दोनों हाथ आगंतुक के सामने फैलाकर कहते हैं- आइए! क्या हाल हैं! आज जब वह 80 वसंत पार कर गए हैं हम उनसे पूछना चाहते हैं- आइए! क्या हाल हैं, त्यागी जी!
▪️अनिल अत्री


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