साहित्य का सितारा रिफ़अत सरोश

 जन्मशती पर विशेष

साहित्य का सितारा रिफ़अत सरोश 

डॉ. शेख़ नगीनवी 

उत्तर प्रदेश में जनपद बिजनौर की धरती ने अनेक ऐसी महान विभूतियों को जन्म दिया है जिन्होंने प्रदेश में ही नहीं बल्कि भारत और सीमा पार भी अपनी प्रतिभा से जनपद बिजनौर का नाम  रोशन किया है। साहित्य के क्षितिज पर रिफत सरोश ऐसा नाम है जिसने उर्दू हिंदी दोनों भाषाओं में साहित्य सृजन कर अपने क़लम का लोहा मनवाया । रिफअत सरोश ऐसे प्रतिभाशाली साहित्यकार थे कि उनके जीवन में भी और जीवन के बाद भी उनकी शख्सियत और उनके द्वारा किए गए काव्य व साहित्य सृजन पर शोध किया जा रहा है और पुस्तकें प्रकाशित हो रहीं हैं। रिफ़‌अत सरोश ने शायर, कवि, लेखक, उपन्यासकार, कहानीकार, नाटककार, ओपेरा लेखक, पत्रकार और प्रसारणकर्ता के रुप में नाम रोशन किया। 

  आज से सौ बरस पहले 2 जनवरी 1926 को जनपद बिजनौर के शहर नगीना में मुहल्ला लुहारी सराय के सय्यद मुहम्मद अली व कनीज़ फातिमा के यहां सय्यद शौकत अली का जन्म हुआ। प्रारम्भिक शिक्षा नगीना के जामा मस्जिद मदरसा, एम बी स्कूल, जार्ज हिन्दू पब्लिक स्कूल में हुई, उसके बाद बंबई से भाषा रत्न स्नातक के समकक्ष डिग्री हासिल की। 1943 में जनरल हेडक्वार्टर दिल्ली से नौकरी का सिलसिला शुरू किया और 1945 में आल इंडिया रेडियो बंबई से जुड़कर 1984 में  आकाशवाणी दिल्ली से सेवानिवृत्त हुए। उर्दू मजलिस और विविध भारती आकाशवाणी कार्यक्रम उनकी पहचान थे। सय्यद शौकत अली ने 1938 ई से शायरी का आगाज़ किया तो अपना तखल्लुस शौक़ नगीनवी रखा लेकिन बंबई पहुंच कर रिफअत सरोश के नाम से अदबी सफ़र शुरू किया । रिफ़अत सरोश का पहला काव्य संग्रह " वादिये गुल" 1963 में प्रकाशित हुआ। उसके बाद ज़िक्र उस परिवश का, नक़्शे सदा,  रोशनी का सफर, वादिये ग़ज़ल, मेरी सदा का ग़ुबार, कर्ब ए तन्हाई, शाखे़ गुल, शहरे ग़ज़ल, सरे शाम, गुम होता हुआ आसमान और साॅंग आफ लाईफ शेअरी मजमुए मंज़रे आम पर आए। गीति नाट्य और ओपेरा ( नाटकीय प्रस्तुति जिसमें पूरी कहानी संगीत और गायन के माध्यम से बताई जाती है) में बहुत कम लेखकों ने क़लम चलाया लेकिन रिफ़अत सरोश ने उरुजे आदम, जहां आरा, शाहजहां का ख़्वाब, फूलों की वादी, तारीख़ के आंचल में, उसी दीवार के साय में, शऊरे आगही, ख्वाब और ताबीरे ख्वाब, पानीपत, परवीन राय और दूसरे ड्रामे, ख़ानवादा ए नूर, जहाॅन ए रक़्सो नग़मा, ओपेरा व काव्य नाटकों की किताबें लिखीं। नस्र (गध) में डगर पनघट की, ज़िंदगी इक सफर (ड्रामें), रेत की दीवारें (नाॅविल), शहरे निगारां, अंधेरे उजाले के बीच (नावेल), धुंधलके की ज़ंजीर (अफ़साने) पत्ता पत्ता बूटा बूटा, बंबई की बज़्म आराइयां, और बस्ती नहीं यह दिल्ली है (आत्मकथा) तीन भाग में, ब्राडकास्टिंग (फने नशरयात) पुस्तकें हैं। जबकि उनके लेखों के संग्रह नक़ूशे रफ़्ता, क़लम के सफी़र, क़ाफ़िला, ज़ाविया ए नज़र, बिहार नौबहार, यादों के चंद सितारे (सफरनामा), कलामे इक़बाल का तनजि़या पहलू, इल्मो अदब के रोशन चिराग, थके ना मेरे पाओं (सफरनामा), आंसुओं के चिराग, प्रकाशित हुए। रंग मंच के पांच रंग (मंज़ूम ड्रामे) गजल के रंग, पत्ता पत्ता बूटा बूटा (आत्मकथा) रेत की दीवारें (नाविल) अंधेरे उजाले के बीच हिंदी में प्रकाशित पुस्तकें हैं। इसके अलावा अनुवाद पर आधारित मौलाना अब्दुल कलाम आज़ाद, दीमक, रानी लक्ष्मीबाई, जोश मुलसियानी, फूगाने दिल्ली पुस्तकें हैं। रिफ़अत सरोश को राष्ट्रीय व अंतरराष्ट्रीय स्तर के कौ़मी इक़बाल सम्मान, सोवियत लैंड नेहरू अवॉर्ड, हम सब गा़लिब अवॉर्ड, साहित्य अकादमी पुरस्कार, आगा़ हश्र कश्मीरी आलमी अवॉर्ड, फिराक़ गोरखपुरी आलमी अवॉर्ड, हज़रत अमीर खूसरो अवॉर्ड, मीर अकादमी अवॉर्ड, निशाने सज्जाद जहीर, मख़दूम मोहिउद्दीन अवॉर्ड, कुंवर महेंद्र सिंह बेदी सक़ाफती अवॉर्ड (हरियाणा उर्दू एकादमी), दिल्ली उर्दू अकैडमी फेलोशिप और बहुत से इदारों के दिगर इनामात के अलावा उत्तर प्रदेश, दिल्ली, मग़रिबी बंगाल और बिहार उर्दू अकादमी के 28 अवॉर्ड मुख्तालिफ किताबों पर रिफ़अत सरोश को मिले। रिफ़अत सरोश ने हिंदूस्तान के अलावा सोवियत यूनियन, इराक, इंग्लैंड, सऊदी अरब, पाकिस्तान, ईरान की यात्राएं की। उन पर आलोचनात्मक व शोध पुस्तकें प्रकाशित हुई जिनमें फिक्रो आगही का रिफअत सरोश नंबर, रिफ़अत सरोश फ़न और शख्सियत, रिफ़अत सरोश बहैसियत साहिबे तर्ज़ नस्र निगार (डॉक्टर राजिया हमीद), नज़रें रिफ़अत सरोश, असासा (डा शबाना नजी़र), रिफ़अत सरोश (डॉक्टर अतिया सुल्ताना का शोध पत्र), बिहारे नौबहार रिफ़अत सरोश :तजजि़याती मुताला( मुहम्मद सालिम) कुल्लियात ए सरोश, रजनीगंधा (शबाना नजी़र)। इनके अलावा बहुत से नामवर लेखकों व शोधकर्ताओं ने उन पर लेख व शोध पत्र लिखें हैं ।

 रिफ़अत सरोश का नाम बड़े  साहित्यकारों में शायद इसलिए  भी गिना जाता है कि  वह , आज के बारे  में , आज की बात करते थे। इतिहास पर बड़ी गहरी पकड़ थी उनकी। जो भी लिखते थे उसे इस लम्हे से जोड़ देते थे। उनकी कविताओं  में संगीतमयता है। उदाहरण  देखिये :

“नई हयात  के नक़्शे बना रहे हैं हम , 

नई बहार के पर्चम उड़ा रहे है हम।..... 

हमारा अज़्म है मोहकम् क़सम हिमाला की ,

हमारा दिल है गुलिस्तां  क़सम  अजन्ता की, 

हमारा ज़हन शगुफ़्ता क़सम एलोरा की , 

कमाल – ए -फन के  करिश्में दिखा रहे है हम”… 


 बहुत कम लोग इस सत्य से परिचित हैं कि रिफ़अत सरोश को चित्रकारी का बड़ा शौक़ था। विशेषकर बेलबूटे  बनाने  का।  उनकी कविताओं में से समाज जैसे झाँकता है।  शब्द  समाज  की  अक्कासी करते है।

“एक छप्पर का घर” 

एक छप्पर का घर, नीम के साये में; 

ऊँघता  है धुंधलके में लिपटा हुआ; 

शाम का वक़त है, और चुल्हा है सर्द I

सहन में एक बच्चा बरहना बदन;

बासी रोटी का टुकड़ा लिए हाथ में;

सर खुजाता है, जाने है किस सोच में I 

और उसारे में आटे की चक्की के पास;

एक औरत परेशान ख़ातिर, उदास;

अपने रुख़ पर लिए ज़िन्दगी की थकन;

सोचती है कि दिन भर की मेहनत के बाद— 

आज भी रुखी रोटी मिलेगी हमें I 

तुम हिक़ारत से क्यूँ देखते हो इसे 

दोस्त यह मेरे बचपन की तस्वीर है ॥


 मनुष्य से प्रेम, महिलाओं  तथा  बच्चों से सदभावना , समाज  की कुरीतियों  से घृणा  रिफ़अत सरोश के जीवन का उदेश्य  था। उनका एक शेर है –

“सर-ब-सर एक पैकर-ए-इख़लास है रिफ़अत सरोश 

 तुम कभी कुछ रोज़ उसके साथ रहकर देखना”। 

 समाज का एक बड़ा भाग होते है नवयुवक।  रिफ़अत सरोश को समाज के इस भाग को प्रोत्साहित करने का बड़ा शौक़ था। वो कहा करते थे की बच्चे ख़ुदरौ पौधे होते हैं। उन्हें ख़ूब हवा पानी दे कर छोड़ दो। हवा पानी से तात्पर्य था;अच्छे संस्कार।  अपने व्यक्तित्व तथा किरदार के बल पर उन्होंने कम अज़ कम तीन नस्लों पर अपनी छाप छोड़ दी। कोई काम कीजिए, ज़रा सी हिम्मत कीजिए और  रिफ़अत सरोश आप की होसला अफ़ज़ाई करने को तैयार रहते थे । ऐसा मार्गदर्शन करते थे कि स्वाभाविकता ही मेहनत करने को मन चाहता था। 

रिफअत सरोश की उम्र का आखिरी पड़ाव जब शुरू हुआ तो उन्होंने ये पंक्तियां लिखीं। 

रात ढ़लने लगी, नींद आने लगी, 

ऊंगालियों से क़लम छूट जाने को है

मौत आवाज देने लगी है मुझे 

कोई है, इस क़लम को जो गिरने ना दे? 

इस अमानत को


जो नस्ले आदम की मीरास है

मुझसे लेके नई नस्ल को सौंप दे। 

30 नवंबर 2008 की शाम 3:30 बजे नोएडा के मेट्रो हॉस्पिटल में क़लम के धनी इस साहित्यकार रिफ़अत सरोश ने अन्तिम सांस ली और 1 दिसंबर को दिल्ली के हज़रत निजा़मुद्दीन कब्रिस्तान में सुपुर्दे ख़ाक किया गया।

मैं लफ़्ज़ लफ़्ज़ हूं सरोश एक यकी़ने जिंदगी 

मैं हर्फ़ हर्फ़ अपना ऐतबार छोड़ जाऊंगा।

हमारी पीढ़ी तथा आने वाली पीढ़ियाँ रिफ़अत सरोश जैसे लेखकों का मार्गदर्शन ग्रहण कर के देश और समाज को उन्नति के पथ पर अग्रसर कर पाएँगी। स्वर्गीय  रिफ़अत सरोश के प्रति यही सच्ची श्रद्धांजलि है।



(लेखक दबिस्तान ए बिजनौर के संकलनकर्ता है) 

9412326875

Comments

Popular posts from this blog

हल्दौर रियासत

बिजनौर है जाहरवीर की ननसाल

नौलखा बाग' खो रहा है अपना मूलस्वरूप..