जन-जन के लाडले और स्वतंत्रता सेनानी अतीकुर्रहमान की याद में।

 शहादत, सियासत और वो अनसुलझा सवाल

*परवेज आदिल माही*

17 फरवरी  पुण्यतिथि पर विशेष।

 जन-जन के लाडले और स्वतंत्रता सेनानी अतीकुर्रहमान की याद में।


​"मौत उसकी है करे जिसका जमाना अफसोस - वरना दुनिया में सभी आये हैं मरने के लिये।

​आज से ठीक 55 वर्ष पूर्व, 17 फरवरी 1971 की वो सुबह भारतीय राजनीति के आकाश पर एक काला साया लेकर आई थी। रेडियो पर प्रसारित एक खबर ने पूरे देश को स्तब्ध कर दिया— “अतीकुर्रहमान अब इस दुनिया में नहीं रहे।” बिजनौर की मिट्टी का वो लाल, जो स्वतंत्रता आंदोलन की भट्टी में तपकर कुंदन बना था, जिसका भविष्य उत्तर प्रदेश की राजनीति में सूर्य की तरह चमक रहा था, उसकी जीवन लीला मात्र 44 वर्ष की आयु में समाप्त हो गई।

​अतीकुर्रहमान की लोकप्रियता का आलम यह था कि उनकी मृत्यु की खबर मिलते ही धर्म और जाति की दीवारें ढह गईं। उस दिन पूर्व प्रधानमंत्री चौधरी चरण सिंह बिजनौर में एक चुनावी सभा को संबोधित करने पहुंचे थे। जैसे ही उन्हें अपने पुराने साथी और दोस्त के पुत्र की मृत्यु की सूचना मिली, वे स्तब्ध रह गए। 'शोक की मूर्ति' बने चौधरी साहब ने जनसभा रद्द कर दी और सीधे अस्पताल पहुंचे। 1942 के भारत छोड़ो आंदोलन में अतीकुर्रहमान उनके साथ जेल की सलाखें काट चुके थे।

​ धुर राजनैतिक विरोधी लेकिन सच्चे दोस्त  'बिजनौर टाइम्स' के बाबू सिंह चौहान इस कद्र दहाड़े मार- मार कर रोए कि पूरा मजमा फफक पड़ा। उन्होंने निडर होकर कहा था "अतीक की मौत प्राकृतिक नहीं है!"

​18 फरवरी को जब अतीकुर्रहमान का पार्थिव शरीर नगीना की जामा मस्जिद लाया गया, तो छतों पर खड़ी महिलाओं की आंखों से आंसू रुकने का नाम नहीं ले रहे थे। इतिहास गवाह है कि नगीना ने कभी इतना बड़ा जनसमूह नहीं देखा था। उन्हें उनके बहादुर पिता, महान स्वतंत्रता सेनानी हाफिज मोहम्मद इब्राहिम की कब्र के पास अर्थात उनकी  गोद में  सुपुर्दे-खाक किया गया।


​अतीकुर्रहमान साहब की शख्सियत ऐसी थी कि कलमकारों ने अपने खून से उनके लिए मर्सिये (शोक गीत) लिखे। प्रसिद्ध शायर मोहम्मद यामीन खां 'शौक़' बिजनौरी ने अपनी व्यथा इन शब्दों में पिरोई थी ।

​"अतीक मौत का तेरी अजीब काम हुआ, अजल बचा गई दामन न उसका नाम हुआ। 

 अधूरा रह गया अफसोस तेरा अफसाना, हयात का तेरी किस्सा कहां तमाम हुआ॥


​शौक़ साहब ने उनकी मृत्यु के रहस्य पर चोट करते हुए आगे लिखा 

​"फसाना मौत का तेरी अजीब राज रहा,  न जाने कब से अजल से यह साजबाज रहा। 

 हयात में तो किसी से तू बैनियाज न था, अतीक शौक़ से क्यूं आज बैनियाज रहा॥


​अलीगढ़ के दिलगीर समर छतावरी ने भी उनके जाने को 'गुलशने मिल्लत' (कौम के बगीचे) का नुकसान बताते हुए लिखा


​"क्या गजब ढाया है तूने ऐ अजल,  गुलशने मिल्लत का छीना है कंवल।  लिख समर तारीख साले इरतहाल, 

बागे जन्नत में गया मर्दे अमल॥"


​अतीकुर्रहमान की मृत्यु आज भी एक गहरा राज है। 16/17 फरवरी की रात 11:30 बजे वे सोए थे, लेकिन सुबह उनका शव घर के पास के कुएं में मिला। पोस्टमार्टम रिपोर्ट ने कई सवाल खड़े किए 

​सिर पर चोट का निशान, जो मौत से पहले का था।

​पेट में 8 औंस पानी का मिलना, जो जीवित व्यक्ति के गिरने की पुष्टि करता है।

​मौत से पहले उन्हें मिली वो धमकी भरी चिट्ठी, जिसका जिक्र उन्होंने नगीना आने से पहले अपनी एक रिश्तेदार से किया था।

​बाबू जगजीवन राम से लेकर हयातुल्ला अंसारी जैसे दिग्गजों ने इसे 'राजनैतिक हत्या' करार दिया और केंद्रीय जांच की मांग की, लेकिन सच्चाई आज भी गहरे पानी के सन्नाटों में दफन है।

​1927 में जन्मे अतीकुर्रहमान ने अल्पायु में ही बड़ी उपलब्धियां हासिल कीं। वे 1958 और 1967 में विधायक रहे, कांग्रेस और चौधरी चरण सिंह के मंत्रिमंडल में कैबिनेट मंत्री के रूप में अपनी प्रशासनिक क्षमता का लोहा मनवाया। 

मौलाना अबुलकलाम आजाद की अधय्क्षता में जब कांग्रेस ने 8अगस्त 1942 को  ,,अंग्रेजो भारत छोड़ो का नारा दिया तब अतीकुर्रहमान मुस्लिम हाईस्कूल बिजनौर के छात्र थे , पिता (हाफिज इब्राहीम )मामा ( मौलाना हिफ्जुर्हमान)और फूपा(अबदुल लतीफ गांधी) की गिरफ्तारी के बावजूद वो भी आंदोलन में कूद पड़े। वो 13अगस्त 1942 को बिजनौर हाईस्कूल के छात्रों का नेतृत्व करते हुए निकले , पुलिस ने छात्रों को तितर बितर करने की भरपूर कोशिश की लेकिन अतीकुर्रहमान अंग्रेजो भातर छोडो का नारा बुलंद करते रहे । पुलिस ने उनको गिरफ्तार कर  जेल में डाल दिया ,  छात्रों को अंग्रेज सरकार के विरूद्ध भडकाने पर उन्हे कालेज से भी निकाल दिया गया ।  आज भी अल्प आयु में देश की खातिर गिरफ्तार होने वालों में अतीकुर्रहमान का नाम प्रमुखता और सम्मान से लिया जाता है ।

उस समय के अखबार मदीना ने खबर को प्रमुख्ता से इस प्रकार  छापा 

*13 अगस्त को बिजनौर में छात्रों का जुलूस। सुबह 10 बजे, मुस्लिम हाई स्कूल के छात्रों ने जुलूस निकाला और घंटा घर के पास तितर-बितर हो गए। पूर्व मंत्री हाफिज मोहम्मद इब्राहिम साहब के पुत्र, छात्र अतीकुर रहमान को गिरफ्तार किया गया। बाद में, सरकारी हाई स्कूल के सामने पुलिस को पहरा देते हुए देखा गया, लेकिन कोई घटना नहीं हुई। पुलिस स्टेशन और डाकघर की भी सुरक्षा की जा रही थी। 14 अगस्त को कोई घटना नहीं हुई। मुस्लिम स्कूल और सरकारी स्कूल दो दिनों के लिए बंद कर दिए गए हैं।*


उर्दू शायरी में 'ताबां' तखल्लुस रखने वाले अतीक साहब ने अपनी मजार के लिए शायद खुद ही लिखा था , 

​"यह किसकी तुरबते मासूम पर फूलों की बारिश है - कोई कहदे अतीक-ए-बेरिया का यह मजार आया । 

​हम अक्सर सुनते हैं कि 'शहीदों के मजारों पर लगेंगे हर बरस मेले', लेकिन हकीकत कड़वी है। 55 साल बीत जाने के बाद भी जिस कुएं ने उस महान नायक की आखिरी सांसें देखीं, उसे एक राष्ट्रीय स्मारक का दर्जा तक नहीं मिल सका। अतीकुर्रहमान का जाना केवल एक व्यक्ति का जाना नहीं था, बल्कि नगीना के स्वर्णिम युग को लगा वो ग्रहण था, जिससे यह क्षेत्र आज तक पूरी तरह उबर नहीं पाया है।

​आज उनकी पुण्यतिथि पर देश उन्हें नमन करता है, पर साथ ही वह न्याय और सम्मान भी मांगता है जिसका हकदार एक 'शहीदे-आजादी' होता है।






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