असद रजा़

 


श्रद्धांजलि 

आह । असद रजा़ 
बिजनौर की एक शख्सियत का यूं चले जाने।
पत्रकारिता और साहित्य का चमकता सितारा टूट गया।
डॉक्टर शेख़ नगीनवी
1 फरवरी 2026 रविवार की सुबह, गुन गुनी धूप के साथ, एक बुरी खबर लेकर आई कि प्रसिद्ध पत्रकार, साहित्य अकादमी सहित दर्जनों पुरस्कारों और सम्मानों से नवाजे गए , व्यंग्य और हास्य लेखक, निबंधकार, अनुवादक, संकलनकर्ता , नामी शायर, विश्लेषक،  समीक्षक उर्दू साहित्य का चमकता और दमकता सितारा सैयद असद रज़ा नक़वी,  दिल का दौरा पड़ने से नई दिल्ली के फोर्टिस अस्पताल में इस फ़ानी दुनिया को हमेशा के लिए छोड़ कर चले गये। दो दिन पहले तबियत में अचानक नासाज़ी के कारण उन्हें फोर्टिस अस्पताल, नई दिल्ली में दाखिल कराया गया, जहां उन्होंने आखिरी सांस ली।उनकी तदफ़ीन पैतृक वतन पेदी सादात,बिजनौर में अमल में आई।  
सैयद असद रज़ा नक़वी, तख़ल्लुस "असद रज़ा" , 2 जनवरी 1952 को  पेदी सादात, जिला बिजनौर में पैदा हुए थे। असद रज़ा के दादा सैयद मज़हर अली नक़वी असगराबाद राज्य के जनरल मैनेजर थे। उनके पिता सैयद ज़फ़र अली नक़वी डिप्टी इन्स्पेक्टर ऑफ स्कूल्स थे। उनकी माता सैयदा क़मर बानो थी। घर में शिक्षा का दौर-दौरा था, इसलिए असद रज़ा को शुरू से ही पढ़ने-लिखने का शौक था। उन्होंने अंग्रेजी और उर्दू में एमए किया। टीचिंग के शौक ने उन्हें बीएड भी करा दिया। जिला मुज़फ़्फ़रनगर के एक इंटर कॉलेज में अंग्रेजी के लेक्चरर रहे। आठ साल तक लेक्चरर रहने के बाद, पत्रकारिता के कीमिया किसी तरह उनके शरीर में प्रवेश कर गए और वे संयुक्त रूस, के दिल्ली में उसके प्रकाशन "सोवियत जायज़ा"  से एडिटर के रूप में जुड़ गए।रूस के टुकड़े होने के बाद, प्रकाशन बंद हो गया और असद रज़ा नियमित पत्रकारिता में सक्रिय हो गए। कुछ समय तक उर्दू वीकली 'नई दुनिया' से जुड़े रहे और उसके बाद सहारा परिवार का हिस्सा बन गए और संपादक के पद तक पहुंचे। 25 साल तक सहारा परिवार के साथ रहे। इस दौरान उर्दू दैनिक 'राष्ट्रीय सहारा', हफ्तावार 'आलमी सहारा' और मासिक 'बज़्म ए सहारा' के माध्यम से पत्रकारिता और साहित्यिक सेवाएं दीं। फिलहाल असद रज़ा दिल्ली में अपने बेटे समर नक़वी के साथ रहते थे और लेखन में व्यस्त थे। असद रज़ा ने राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय राजनीति और हालात पर बहुत सारे लेख लिखे हैं, लेकिन उनके अंदर व्यंग्य और हास्य की एक अद्भुत क्षमता है, जिसने उनसे हास्य साहित्य का निर्माण करवाया। यह भी कम ही देखा गया है कि कोई व्यंग्य और हास्य लेखक बच्चों का साहित्य भी लिखे। असद रज़ा में ये दोनों गुण मौजूद रहे। उनकी लेखनी ने बच्चों के लिए हास्य लेख भी लिखे, कविताएं भी लिखीं और कहानियां भी लिखीं। उनका बनाया हुआ बच्चों का साहित्य इतना मानक है कि साहित्य अकादमी ने उन्हें इसके लिए पुरस्कार दिया और बच्चों के लिए लिखी गई कहानी 'चांद नगर की सैर' को पश्चिम बंगाल सरकार ने छठी कक्षा के पाठ्यक्रम में शामिल किया है। असद रज़ा ने 2011 से 2015 तक राष्ट्रीय सहारा में हालात-ए-हाज़रा पर कविताएं भी लिखीं और 1991 से 2011 तक अख़बार में व्यंग्यात्मक कॉलम 'तल्ख़ियां' लिखा। असद रज़ा की विभिन्न विषयों पर दर्जन से अधिक किताबें प्रकाशित हो चुकी हैं, जिनमें से अधिकांश किसी न किसी राज्य अकादमी के पुरस्कार के लिए चुनी गई हैं। शायरी आपको अपने पिता सैयद जफ़र अली नक़वी और मामू सैयद रईस हैदर रिजवी रईस बिजनौरी से विरासत में मिली, आपने शायरी में प्रोफेसर उनवान चिश्ती को अपना उस्ताद चुना ।कविता संग्रह 'आइने एहसास के', कविता संग्रह 'शहर ए एहसास', व्यंग्यात्मक और हास्य लेखों का संग्रह 'शोख़ी ए क़लम', बच्चों के लिए हास्य लेखों का संग्रह 'चांद नगर की सैर', व्यंग्यात्मक और हास्य लेखों का संग्रह 'अदबी अस्पताल', बच्चों के लिए हास्य कहानियों का संग्रह 'नन्हें मुन्नो की सरकार', व्यंग्यात्मक और हास्य लेखों का संग्रह 'शोशे', बच्चों के लिए कविताओं और कहानियों का संग्रह 'क्रिकेटी मुशायरा', हास्य उपन्यास 'नुमाईश खाना', उत्तर प्रदेश में उर्दू मीडिया, मुख्तसर हास्य अफसाने का संग्रह 'तन्ज़ान्चे', उर्दू पत्रकारिता (इतिहास), 'सच की समझ' (बच्चों के लिए) 'नन्हें मुन्नो की सरकार' (हिंदी) प्रकाशित हो चुकी हैं। जबकि कविता संग्रह 'आइना', हास्य उपन्यास 'उल्लू नामा' और उर्दू शायरों और लेखकों के 'स्केच' भी हैं। असद रज़ा ने हिंदी उपन्यास 'विनायक' का उर्दू में अनुवाद भी किया है। उत्तर प्रदेश उर्दू अकादमी की शख्सियत सीरीज में 'निश्तर खानकाही' पर एक किताब संकलित  कर चुके हैं। उनका लिखा हुआ हास्य सीरियल 'फाइव स्टार नर्सिंग होम' डीडी उर्दू पर प्रसारित हुआ है। असद रज़ा एक अनुभवी पत्रकार और लेखक रहे। 
इतने ऊंचे स्तर पर पहुंच ने के बाद भी उनका व्यवहार बहुत सरल व सादा था। उनकी बोली ठेट बिजनौरी थी। मसरूफ़ जिंदगी के बावजूद भी वह लगातार सब से सम्पर्क में रहते भी थे और रखते भी थे। मेरे प्रथम लेख संग्रह ' फैज़ान ए राकि़म ' का विमोचन दिल्ली में पद्मश्री अख्तरूल वासे के साथ उन्होंने किया था। दबिस्तान ए बिजनौर के लिए उन्होंने एक विशेष लेख तहरीर किया और दोनों अंकों मैं असद रजा़ का विस्तृत परिचय शामिल है।आखिरी बार वह अज़ीज़ नहटौरी के काव्य संग्रह के विमोचन कार्यक्रम में मंडावर (बिजनौर) आए थे। टेक्नोलॉजी के उभार से पहले का दौर भी देखे हुए हैं और टेक्नोलॉजी के उभार को खुद ने इस्तेमाल किया। वह जानते थे कि आज का ई - मानव शॉर्टकट पसंद हो गया है। कम से कम समय में वह बहुत कुछ हासिल कर लेने का इच्छुक है। उसकी इस शॉर्टकट सोच को ध्यान में रखते हुए, असद रज़ा ने "अफसान्चे " की तर्ज पर संक्षिप्त व्यंग्यात्मक और हास्य लेख लिखना शुरू किए और इसे नाम दिया "तन्ज़ान्चा"। इस तरह असद रज़ा ही तन्ज़ान्चे के बानी और आविष्कारक हैं। असद रज़ा को तन्ज़ान्चे का आविष्कारक होने की सनद भी उन उस्तादों ने दी है, जो 'मुस्तनद है मेरा फ़रमाया हुआ' वाले अहल क़लम की पंक्ति में शामिल हैं। प्रोफेसर शहपर रसूल और प्रोफेसर ख्वाजा इकराम की सनद के बाद, असद रज़ा तन्ज़ान्चे के आविष्कारक हैं। संक्षिप्त लिखते-लिखते असद रज़ा कुछ पंक्तियों के व्यंग्यात्मक और हास्य लेख तक पहुंच गए। उनके कुछ लेख दस या दस से भी कम पंक्तियों में समेटे हुए हैं। आसपास को देखने का उनका अंदाज़ आम लोगों से अलग है। उन्होंने हालात, वाक़ियात, सामाजिक, राजनीतिक, धार्मिक और आर्थिक परिवर्तनों का गहराई और विस्तार से जाइज़ा लिया हैं। उन्होंने उन विषयों पर लिखा, जिन्हें आम तौर पर लोग महत्वहीन समझते हैं। असद रज़ा ने सामाजिक बुराइयों पर भी लिखा। विभिन्न घटनाओं और परिवर्तनों पर भी लिखा। नैतिक मूल्यों के पतन पर भी उनकी कलम चली। व्यंग्यात्मक और हास्य लेख लिखना वैसे भी मुश्किल होता है और वह भी संक्षिप्त में लिखना निहायत ही मुश्किल है और असद रज़ा इस मुश्किल को आसानी से पार कर जाते । असद रज़ा को कई सम्मान प्राप्त हैं। जो उनके साहित्यिक कद को और भी ऊंचाई देते हैं। मेरठ की चौधरी चरण सिंह विश्वविद्यालय की एक स्कॉलर फ़राह नाज़ ने असद रज़ा की व्यंग्यात्मक लेखनी पर एम० फिल०  की थीसिस लिखी । जामिया उर्दू अलीगढ़ ने उन्हें डीलिट की मानद उपाधि से नवाज़ा है। उत्तर प्रदेश उर्दू अकादमी उन्हें 'लाइफटाइम अचीवमेंट अवार्ड' दे चुकी है। नजीबाबाद में 'ताजवर नजीबाबादी अवार्ड ' से सम्मानित असद रज़ा की साहित्यिक और पत्रकारिता सेवाओं को विभिन्न अवसरों पर विभिन्न संस्थाओं, अकादमियों और संगठनों ने स्वीकार किया है और उन्हें पुरस्कारों और सम्मानों से नवाज़ा है। उर्दू साहित्य और पत्रकारिता के विकास के लिये असद रज़ा को मिलने वाले पुरस्कारों और सम्मानों की संख्या पचास से अधिक है। जिनमें सबसे महत्वपूर्ण साहित्य अकादमी पुरस्कार है, जो उन्हें बच्चों का साहित्य बनाने के लिए दिया गया।
असद रज़ा नक़वी ने पत्रकारिता व साहित्य के मैदान में कई दशकों  सेवाएं अंजाम दीं।  असद रज़ा नक़वी की निधन से उर्दू पत्रकारिता और अदब एक ऐसी क़ीमती आवाज़ से महरूम हो गया है जिसकी गूंज देर तक महसूस की जाती रहेगी। पत्रकार बिरादरी, अदबी हल्के और उनके शागिर्द व साथियों ने दिवंगत के प्रति खिराज ए अकीदत पेश की।
उनका कलाम:-
बेच कर उसने खुदी, दौलत ओ शोहरत पाली,
तुम ने क्या पाया असद तुम तो अना रखते थे।
साफ बचते रहे दुनिया के हवादिस से वही,
अपने माँ बाप की जो साथ दुआ रखते थे,
नफ़रत भरा ज़माने का गरचे चलन रहा,
लेकिन खुलूस बांटना अपना मिशन रहा।
 (दबिस्तान ए बिजनौर)
(लेखक उर्दू साहित्यकार है)
9412326875





 
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असद रज़ा: उर्दू पत्रकारिता का 'नगीना' और 'तन्ज़ांचा' के अमर सर्जक
*परवेज आदिल माही* 
महाराजा भरत और महारानी शकुंतला की  अमर प्रेम कहानी की भांती यहां का साहित्य भी अमर अजर और अनमोल है ।  साहित्य जगत में जनपद बिजनौर का जो मान डिप्टी नजीर अहमद , अब्दुल रहमान बिनौरी , सज्जाद हैदर यलदरम, रूस्तम बिजनौरी अकबर शाह नजीबाबादी ,कुर्रतुल ऐन हैदर, रिफत सरोश  आदि ने  बढ़ाया उसकी मिसाल ढूंड लाना लगभग ना मुम्किन है ।वर्तमान परिपेक्ष में इस विरासतन को जिन चंद कलमकारों ने पूरी शिद्दत से आगे बढ़ाया, उनमें असद रज़ा का नाम सबसे नुमाया है। इनका जन्म  2 जनवरी 1952  में बिजनौर के निकट एक छोटे से गांव में हुआ था , इन्हें किसी एक दायरे में बांधना मुमकिन नहीं। वे एक साथ पत्रकार, शायर, व्यंग्यकार, अनुवादक और संपादक थे। उनका  (कल)01 फरवरी 2026 को 74 वर्ष की आयु में इंतकाल हो गया यह उर्दू जगत और बिजनौरी साहित्य  के लिए एक अपूरणीय क्षति है।

​असद रज़ा साहब के साथ मेरी यादें लगभग बीस वर्ष पुरानी हैं। वह दौर था जब 'उर्दू दैनिक राष्ट्रीय सहारा' में स्ट्रिंगर की आवश्यकता का विज्ञापन प्रकाशित हुआ था। मुझ जैसे कई उत्साही युवाओं ने प्रार्थना पत्र दिए और हमें साक्षात्कार के लिए सहारा के नोएडा स्थित कार्यालय बुलाया गया। मुझे आज भी वह दृश्य स्पष्ट याद है—साक्षात्कार कक्ष से बाहर निकलने वाले उम्मीदवारों के चेहरों पर मायूसी थी। अंदर चयनकर्ताओं की मेज पर राष्ट्रीय सहारा के ग्रुप एडिटर अज़ीज़ बर्नी साहब और असद रज़ा साहब बैठे थे।
​जब मेरी बारी आई और मैं साक्षात्कार की टेबल पर बैठा, तो असद रज़ा साहब ने अपनी पारखी नजरों से मुझे देखा। उनका पहला प्रश्न मेरी जन्मभूमि और कर्मभूमि से जुड़ा था। उन्होंने पूछा, "उस महान व्यक्तित्व का नाम बताइए जिसने स्वतंत्रता आंदोलन में नगीना का नाम सर्वाधिक रोशन किया?" खुदा का शुक्र था कि मुझे जवाब मालूम था। मेरे सटीक उत्तर से वे संतुष्ट हुए और मुस्कुराते हुए अज़ीज़ बर्नी साहब की तरफ इशारा कर बोले, "हम इन्हें नगीना से काम करने का मौका दे सकते हैं।" वह मेरी उनसे पहली मुलाकात थी, जिसमें उन्होंने अपनी सहजता और पारखी सोच से मुझे अपना बना लिया। यह सिलसिला अंत तक जारी रहा बिजनौरी पत्रकारों के लिये वह राष्ट्रीय सहारा में सबसे बड़े संरक्षक  और पैरोकार थे , बिजनौर के मौहल्ला चाहशीरीं निवासी  शकील बिजनौरी  से उनकी गहरी मित्रता थी।
​असद रज़ा साहब की पत्रकारिता का सफर बेहद दिलचस्प रहा। अंग्रेजी और उर्दू में एम .ए और फिर बी-एड करने के बाद उन्होंने कुछ समय अध्यापन किया, लेकिन भीतर का पत्रकार उन्हें बेचैन रखता था। उन्होंने अपने करियर की शुरुआत तत्कालीन सोवियत संघ (USSR) के प्रेस सेक्शन में बतौर संपादक की। 'सोवियत जायजा' से शुरू हुआ यह सफर आगे चलकर दिल्ली के प्रसिद्ध साप्ताहिक 'नई दुनिया' तक पहुँचा।
​1991 में वे 'राष्ट्रीय सहारा' परिवार का हिस्सा बने और यहाँ से  मानों उनकी प्रतिभा को एक खुला आसमान  मिला। अज़ीज़ बर्नी का  उन पर अटूट विश्वास  था वे  उन्हें अपना  भाई मानते थे। जब बर्नी साहब संस्थान से अलग हुए, तो अखबार के स्तर को बनाए रखने की बड़ी चुनौती असद साहब के कंधों पर आई। उन्होंने 'राष्ट्रीय सहारा' (दैनिक), 'आलमी सहारा' (साप्ताहिक) और 'बज़्म-ए-सहारा' (मासिक) के माध्यम से उर्दू पत्रकारिता को नई ऊंचाइयां दीं। उनका नियमित कॉलम 'तलखियां' सत्ता के गलियारों से लेकर समाज की कुरीतियों तक पर करारा प्रहार करता था।
​साहित्य के क्षेत्र में असद रज़ा का सबसे बड़ा योगदान 'तन्ज़ांचा' का आविष्कार है। जिस तरह अफसाने से 'अफसांचा' (लघु कथा) बना, उसी तरह असद साहब ने आधुनिक युग की व्यस्तता को देखते हुए व्यंग्य के बेहद संक्षिप्त रूप 'तन्ज़ांचा' को जन्म दिया। प्रोफेसर शहपर रसूल और प्रोफेसर ख्वाजा इकराम जैसे विद्वानों ने उन्हें आधिकारिक तौर पर इस विधा का 'मौअज्जिद' (आविष्कारक) स्वीकार किया।
​उनका लेखन केवल बड़ों तक सीमित नहीं था। वे उन विरले साहित्यकारों में से थे जिन्होंने बाल साहित्य को उतनी ही गंभीरता से लिया। उनकी कहानी 'चांद नगर की सैर' को पश्चिम बंगाल सरकार ने छठी कक्षा के पाठ्यक्रम में शामिल किया। उन्हें बच्चों के साहित्य के लिए ही देश का प्रतिष्ठित 'साहित्य अकादमी पुरस्कार' प्रदान किया ।
​असद रज़ा  साहब की लेखनी से दर्जनों किताबें निकलीं। जिनमें
​'आइने एहसास के'शहर-ए-एहसास,
शोखी-ए-कलम, अदबी अस्पताल', शोषे ​,नन्हे मुन्नों की सरकार, करकटी मुशायरा, हैं 
​ ,नुमाइश खाना',उल्लू नामा,उनके अप्रकाशित अफसानों का संग्रह है ।
​उन्हें 50 से अधिक राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय पुरस्कारों से नवाजा गया, जिनमें यूपी उर्दू अकादमी का 'लाइफ टाइम अचीवमेंट अवार्ड' और गालिब अवार्ड प्रमुख हैं। मेरठ की चौधरी चरण सिंह यूनिवर्सिटी में उनकी व्यंग्य कला पर एम.फिल का शोध हो चुका है।
​असद साहब की शायरी में एक पत्रकार का अनुभव और एक संवेदनशील इंसान का दर्द झलकता था। वे नफरत की राजनीति और समाज की दोहरी मानसिकता के सख्त खिलाफ थे। उनका एक शेर उनके पूरे नजरिए को बयां करता है
​"दिल में हिर्स-ओ-हवस और सजदे में सर,
इस नए दौर की बंदगी दो-रुखी।"

​या फिर साम्प्रदायिकता पर उनका यह कड़ा प्रहार:
​"नफरत की तास्सुब की यूँ रखी गईं ईंटें,
पैदा हुई ज़ेहनों में दीवार की गुंजाइश।"

​हाल ही में उम्राह  की सआदत हासिल कर लौटने के बाद, दिल्ली के फोर्टिस अस्पताल में उन्होंने अपनी अंतिम सांसें लीं। जनपद बिजनौर का वह 'रौशन चिराग' जो दिल्ली की पत्रकारिता के आकाश पर ध्रुव तारे की तरह चमकता था, हमेशा के लिए खामोश हो गया। उनका निधन न केवल उनके परिवार (पुत्र और दो पुत्रियों) के लिए, बल्कि समूचे उर्दू जगत और उन तमाम पत्रकारों के लिए व्यक्तिगत क्षति है जिन्हें उन्होंने उंगली पकड़ कर चलना सिखाया।
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​असद रज़ा साहब आज हमारे बीच नहीं हैं, लेकिन उनके 'तन्ज़ांचे', उनकी 'तलखियां' और उनके द्वारा गढ़ा गया स्वस्थ साहित्य आने वाली पीढ़ियों को आईना दिखाता रहेगा। बिजनौर से लेकर नोएडा तक का उनका सफर संघर्ष, ईमानदारी और रचनात्मकता की एक मिसाल है।
उनकी यह मशहूर गजल आज के दौर की कड़वी सच्चाई को बयान करती है:
​उनको नफरत से मोहब्बत है खुदा खैर करे
बस मोहब्बत से ही नफरत है खुदा खैर करे
​खोले बैठे हैं वो मसलक की दुकानें हर सू
हाय मजहब में खयानत है खुदा खैर करे
​वो इलेक्शन में भी इन्वेस्ट किया करते हैं
लीडरी उनकी तिजारत है खुदा खैर करे
​जिनको अक्सर में दिया करता हूँ दावत घर पर
उनको ही मुझसे अदावत है खुदा खैर करे
​चमचागीरी किसी अफसर की मिनिस्टर की 'असद'
आज कल ऐन सआदत है खुदा खैर करे
____
खूब खाया है खूब खाएंगे,
जलने वाला जला करे कोई।
फिरका-वाराना इन फसादों में,
मरने वाला मरा करे कोई।"




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