डा. अजय जनमेजय

 डा. अजय जनमेजय का जन्म 28 नवम्बर 1955 को हस्तिनापुर, मेरठ, उत्तर प्रदेश में हुआ। वे प्रसिद्ध  बाल साहित्यकार, ग़ज़लकार, व्यंग्यकार, कहानीकार निश्तर खानकाही के शिष्य और पेशे से बिजनौर में बालरोग विशेषज्ञ हैं। 


डा. अजय जनमेजय की साहित्य यात्रा ग़ज़लों से शुरू होकर दोहों से होती हुई शनै:-शनै: बाल साहित्य की ओर अग्रसर हुई है। इसका श्रेय उनकी बालसुलभ प्रवृत्ति, उनकी बाल मनोविज्ञान एवं बाल समस्याओं पर गहरी समझ ही है, आज उन्होंने बाल साहित्य की हर विधा- कहानी, दोहे, गीत, शिशुगीत, नाटक, बाल-ग़ज़ल, लोरियाँ, प्रभाती गीत, के साथ- साथ मुक्तक, कुण्डली से लेकर नवगीत, यात्रा संस्मरण आदि सभी में अपना सार्थक योगदान दिया है। 


यूं तो डा.जनमेजय सामाजिक सरोकारों कन्या भ्रूण हत्या, पर्यावरण, बेटियाँ, नदियाँ आदि पर लगातार लिखते रहे हैं, किन्तु हिन्दी साहित्य में बेटियों पर लिखा एवं प्रकाशित मुक्तक संग्रह ‘बेटियाँ नदी-पीड़ा पर केन्द्रित नदी-गीत ‘नदी के जलते हुए सवाल एक अलग ही पहचान रखते हैं। इनकी पुस्तकों का अंग्रेजी, सिंधी, उड़िया, उर्दू , मराठी, पंजाबी एँव तमिल में भी अनुवाद हो चुका है तथा अनेक रचनाएँ पाठ्यपुस्तकों में संकलित कर विद्यालयों में पढ़ाई जा रही हैं।


उनकी कुछ प्रमुख पुस्तकें-हरा समुंदर गोपी चंदर, अक्कड़ बक्कड़ हो हो हो आदि हैं।


डा.अजय जनमेजय की पहली ही पुस्तक 'अक्कड़ बक्कड़ हो हो हो' बच्चों में लोकप्रिय हो गई थी।  उनकी दूसरी पुस्तक 'हरा समन्दर गोपी चन्दर' भी बच्चों को भाई। इधर उनकी कुछ और पुस्तकें नयी  सजधज के साथ आई हैं।


मेरी उनसे कभी भेंट तो नहीं हुई पर हाँ फोन पर बात जरूर हुई है।


उनको जन्मदिन की बहुत-बहुत बधाई और हार्दिक शुभकामनाएँ उनकी एक बाल कविता के साथ-

रेल चली छुक-छुक,

रेल चली छुक-छुक!


रेल में थे नाना,

साथ लिए खाना।

खाना खाया चुप-चुप,

रेल चली छुक-छुक!


रेल में थी दादी,

बिल्कुल सीधी-सादी।

देख रही टुक-टुक,

रेल चली छुक-छुक!


रेल में थी मुनिया,

देखने को दुनिया।

दिल करे धुक-धुक,

रेल चली छुक-छुक!

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